आखिर क्यों CBSE बोर्ड की लाखों कापियों पर सीधे लागू कर दिया गया OSM? जानें क्या है पूरा विवाद

CBSE OSM Dispute सीबीएसई के नए ओएसएम सिस्टम को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, सवाल उठ रहे हैं कि 12वीं बोर्ड की लाखों कॉपियों की जांच से पहले 11वीं कक्षा में इसका ट्रायल क्यों नहीं किया गया और क्या इससे छात्रों के भविष्य पर असर पड़ सकता है।

Aditya Kumar Verma
Published on: 3 Jun 2026 12:14 PM IST (Updated on: 3 Jun 2026 12:17 PM IST)
CBSE OSM Dispute
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CBSE OSM Dispute: अगर आपके मोबाइल में कोई नया फीचर आता है तो टेक कंपनियां उसे पहले सीमित यूजर्स के बीच बीटा टेस्ट करती हैं, अगर कोई नई कार बाजार में आती है तो उसे पहले हजारों किलोमीटर तक खराब और उबड़ खाबड़ रास्तों पर दौड़ाकर परखा जाता है, और बड़े से बड़ा सॉफ्टवेयर भी सीधे जनता के बीच नहीं बल्कि पहले एक छोटे समूह में ही टेस्ट किया जाता है। इसी सामान्य तकनीकी नियम के बीच अब देश की सबसे बड़ी परीक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं, जहां बात सीधा लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी है।

CBSE के नए सिस्टम पर क्यों उठा विवाद?

दरअसल पूरा विवाद केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई द्वारा 12वीं बोर्ड परीक्षा की कॉपियों की जांच में लागू किए गए नए ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लेकर है। सवाल यह है कि क्या इतना बड़ा बदलाव बिना छोटे स्तर पर परीक्षण किए सीधे पूरे देश में लागू कर देना सही था, और क्या इसे पहले सीमित स्तर पर आजमाकर कमियां नहीं पकड़ी जा सकती थीं।

आखिर क्या है OSM सिस्टम?

असल में ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी OSM एक डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली (Evaluation System) है जिसमें अब तक की पारंपरिक कॉपी जांच व्यवस्था बदल दी गई है। पहले परीक्षकों के पास छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं के बंडल भेजे जाते थे और शिक्षक पेन से कॉपियों की जांच करते थे। लेकिन इस नई व्यवस्था में पहले उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन किया जाता है और फिर शिक्षक कंप्यूटर या डिजिटल स्क्रीन पर बैठकर उनका मूल्यांकन करते हैं।

CBSE का पक्ष क्या है?

इस बाबत सीबीएसई का कहना है कि इस सिस्टम से कॉपियों की जांच ज्यादा तेज, ज्यादा पारदर्शी और अधिक मानकीकृत हो जाती है। बोर्ड के अनुसार डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है और मॉडरेशन की प्रक्रिया पर बेहतर निगरानी संभव होती है। इसी सोच के तहत वर्ष 2026 में 12वीं बोर्ड की कॉपियों के मूल्यांकन में ओएसएम को बड़े स्तर पर लागू किया गया।

तकनीक पर नहीं, लागू करने के तरीके पर सवाल

वहीं शिक्षा विशेषज्ञ और शिक्षक यह स्पष्ट कर रहे हैं कि समस्या तकनीक की नहीं है। दुनिया के कई बड़े परीक्षा बोर्ड पहले से ही डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे हैं। असली सवाल इस बात पर है कि इसे लागू करने की रणनीति क्या सही थी या नहीं। क्या देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा व्यवस्था में सीधे इतना बड़ा बदलाव बिना चरणबद्ध परीक्षण के लागू कर देना उचित था।

बारहवीं के अंकों का महत्व और जोखिम

आपको बाबाते चलें कि, भारत में बारहवीं बोर्ड के अंक केवल एक अंकपत्र नहीं होते बल्कि यही अंक आगे की पढ़ाई, विश्वविद्यालय में प्रवेश, छात्रवृत्ति और करियर की दिशा तय करते हैं। ऐसे में यहां किसी भी तकनीकी गलती या सिस्टम की खामी का असर सीधे छात्रों के भविष्य पर पड़ सकता है। इसलिए इस स्तर पर गलती की गुंजाइश लगभग शून्य मानी जाती है।

क्या पहले से मिले थे संकेत या रेड फ्लैग?

दरअसल कुछ मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि, इस सिस्टम के शुरुआती परीक्षण के दौरान ही तकनीकी और संचालन से जुड़ी कई समस्याएं सामने आई थीं। इन्हें वह शुरुआती संकेत या रेड फ्लैग माना जा रहा है जिन पर बोर्ड को और सावधानी बरतनी चाहिए थी। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ शिक्षकों और संबंधित पक्षों ने सुझाव दिया था कि इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए। हालांकि सीबीएसई का कहना है कि सिस्टम लागू करने से पहले शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया और पूरी तैयारी की गई थी, लेकिन इसके बावजूद परिणामों के बाद सवाल और असमंजस क्यों पैदा हुआ, यह बहस का हिस्सा बन गया है।

क्यों उठ रही है 11वीं में ट्रायल की बात?

वहीं शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी बड़े शैक्षिक बदलाव को परखने के लिए ग्यारहवीं कक्षा सबसे सुरक्षित स्तर मानी जाती है। इसका कारण यह है कि ग्यारहवीं के परिणाम सीधे राष्ट्रीय स्तर की रैंकिंग या विश्वविद्यालय प्रवेश को प्रभावित नहीं करते। इसलिए अगर इस स्तर पर सिस्टम को आजमाया जाता तो उसकी कमियां पहले ही सामने आ सकती थीं और बड़े नुकसान से बचा जा सकता था।

हालांकि यह भी स्पष्ट किया जा रहा है कि ऐसा ट्रायल करने से सभी समस्याएं पूरी तरह खत्म हो जातीं, इसका कोई पक्का प्रमाण नहीं है, लेकिन इससे जोखिम निश्चित रूप से कम किया जा सकता था।

संसद तक पहुंचा मामला, छिड़ी नई बहस

वहीं यह मुद्दा अब केवल स्कूलों या सोशल मीडिया की चर्चा तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि संसद तक पहुंच चुका है। इस पूरे मामले में सत्रह वर्षीय छात्र सार्थक सिद्धांत ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने इस सिस्टम से जुड़े टेंडर दस्तावेजों और संचालन प्रक्रिया का अध्ययन किया और अपनी रिपोर्ट संसद की एक स्थायी समिति के सामने प्रस्तुत की।

इसके बाद अब बहस केवल तकनीक के फायदे और नुकसान तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि इसकी पारदर्शिता और लागू करने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

उठ रहे बड़े सवाल

तो ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को एक आधुनिक और सुधारात्मक कदम माना जा सकता है और इसका अंतिम मूल्यांकन भविष्य में इसके परिणाम तय करेंगे। लेकिन इस पूरी बहस के केंद्र में एक सवाल लगातार बना हुआ है कि जब मामला देश के लाखों छात्रों के भविष्य और करियर से जुड़ा हो तो क्या इतने बड़े बदलाव को सीधे लागू कर देना चाहिए था या पहले छोटे स्तर पर सुरक्षित परीक्षण करना ज्यादा समझदारी भरा कदम होता।

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आदित्य कुमार वर्मा उत्तर प्रदेश के पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने भारतीय राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और मानवीय सरोकारों से जुड़ी खबरों की व्यापक रिपोर्टिंग की है। उनके पास मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री है और वे रिपोर्टर, एंकर तथा सब-एडिटर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। साथ ही वो उत्तर प्रदेश की राजनीति, शासन-प्रशासन और नौकरशाही व्यवस्था की गहरी समझ रखते हैं। पत्रकारिता के अलावा उन्हें पुस्तकों का अध्ययन, लेखन, कविता-लेखन और पाठ और यात्राएं करना विशेष रूप से पसंद है। विभिन्न संस्कृतियों और समाजों को करीब से जानने-समझने की उनकी रुचि ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है, जिसका सकारात्मक प्रभाव उनकी लेखन शैली और रिपोर्टिंग में भी देखने को मिलता है।

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