TRENDING TAGS :
आशा भोसले, एक नाम मधुरता से मस्ती तक का
आशा भोंसले: संघर्ष, सुर और सफलता की अमर कहानी, जिसने संघर्ष से सफलता तक का सफर तय कर भारतीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया
भारतीय सिनेमा के संगीत इतिहास में आशा भोसले का नाम एक ऐसे स्वर के रूप में दर्ज रहेगा, जिसने समय के साथ स्वयं को निरंतर बदलते हुए भी अपनी पहचान को हमेशा मजबूत किया। उनकी आवाज़ केवल मधुरता का प्रतीक नहीं, बल्कि संघर्ष, प्रयोग और अदम्य जिजीविषा की कहानी भी रही। वे केवल एक गायिका नहीं, बल्कि जीवन के हर रंग को जीने वाली एक सशक्त व्यक्तित्व थीं।
एक समय ऐसा था जब फिल्म संगीत पर गीता दत्त, शमशाद बेगम और लता मंगेशकर जैसी स्थापित गायिकाओं का वर्चस्व था। उस दौर में आशा भोंसले को मुख्यधारा की फिल्मों में अवसर मिलना अत्यंत कठिन था। उन्हें प्रायः कम बजट की फिल्मों के लिए ही गाना पड़ता था। सज्जाद हुसैन और गुलाम मोहम्मद जैसे संगीतकारों के साथ काम करते हुए उन्होंने अपने सुरों को साधा, भले ही उस समय उन्हें व्यापक सफलता न मिली हो।
कम उम्र में ही उन्होंने अपने परिवार की इच्छा के विरुद्ध गणपतराव भोंसले से विवाह कर लिया। यह निर्णय उनके जीवन का कठिन मोड़ साबित हुआ। यह विवाह सफल नहीं रहा और उन्हें अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ जीवन की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उस समय उनके पास सीमित अवसर थे और संगीत जगत में उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर का वर्चस्व था। स्वयं आशा जी ने स्वीकार किया था कि उन्हें जो भी गीत मिलते, वे उन्हें पूरी निष्ठा से गाती थीं।
संघर्षों के बीच भी उन्होंने हार नहीं मानी। उनके जीवन में परिवर्तन का दौर तब आया जब दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म ‘संगदिल’ से उन्हें पहचान मिली। इसके पश्चात विमल राय ने अपनी फिल्म ‘परिणीता’ में उन्हें अवसर दिया। फिल्म ‘बूट पॉलिश’ में राज कपूर के साथ काम करते हुए और मोहम्मद रफी के साथ गाया गया गीत “नन्हे मुन्ने बच्चे…” उनकी लोकप्रियता का आधार बना।
संगीतकार ओपी नैयर ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। ‘सी. आई. डी.’ और ‘नया दौर’ जैसी फिल्मों में मिले अवसर ने उन्हें अग्रणी गायिकाओं की श्रेणी में स्थापित कर दिया। ‘नया दौर’ के गीतों ने उन्हें जन-जन की आवाज़ बना दिया। इसके बाद सचिन देव बर्मन रवि और आरडी बर्मन जैसे प्रतिष्ठित संगीतकारों ने भी उन्हें अपने संगीत में स्थान दिया।
बाद में आरडी बर्मन के साथ उनका संबंध उनके जीवन और करियर दोनों में एक नया अध्याय लेकर आया। यह साथ उनके लिए व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों स्तरों पर अत्यंत सफल रहा। फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ के गीतों ने यह सिद्ध कर दिया कि वे हर प्रकार के संगीत में स्वयं को ढाल सकती हैं।
वे प्रसिद्ध नृत्यांगना हेलन की आवाज़ बन गईं। “पिया तू अब तो आजा…”, “ओ हसीना ज़ुल्फों वाली…” और “ये मेरा दिल…” जैसे गीतों में उनकी गायकी और अभिनय का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
इसके विपरीत, उन्होंने गंभीर और शास्त्रीय शैली में भी अपनी क्षमता का परिचय दिया। फिल्म ‘उमराव जान’ में गाई गई ग़ज़लों—“दिल चीज़ क्या है…”, “इन आँखों की मस्ती…”—ने यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल चंचल गीतों तक सीमित नहीं हैं। इस उपलब्धि के लिए उन्हें राष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुआ।
समय के साथ भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। उन्होंने नई पीढ़ी के संगीत के साथ स्वयं को जोड़ा और फिल्म ‘रंगीला’ में गाए गए गीतों के माध्यम से पुनः श्रोताओं को आकर्षित किया। आशा ने अपने करियर में लगभग 16000 गीत गाए।
संगीत के अलावा उन्हें खाना बनाने का भी बेहद शौक था। वे अपने मित्रों और परिचितों के लिए स्वयं भोजन बनाती थीं। उनका मानना था कि गाना और खाना—ये दोनों ही उन्हें ईश्वर का दिया हुआ सबसे बड़ा उपहार हैं।
अपार सफलता और प्रसिद्धि के बावजूद वे बेहद सरल स्वभाव की थीं। वे अपने आसपास के हर व्यक्ति से आत्मीयता से बात करती थीं—चाहे वह उनके घर का चौकीदार हो या कोई अन्य कर्मचारी। उनका मानना था कि प्रसिद्धि इंसानियत से बड़ी नहीं होती।
आशा भोंसले ने अपने जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन उन्होंने कभी नकारात्मकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे स्वयं को एक ऐसे सैनिक की तरह मानती थीं, जिसने जीवन के घावों को गर्व के साथ स्वीकार किया हो।


