Comedy Movie Golmaal: वह फ़िल्म जिसमें हँसी के पीछे एक पूरा समाज छिपा था

Golmaal Full Movie Story: 'गोलमाल' (1979) की पर्दे के पीछे की विस्तृत कहानी, जिसमें हृषिकेश मुखर्जी का निर्देशन, अमोल पालेकर का अभिनय, उत्पल दत्त की यादगार भूमिका, संगीत, प्रोडक्शन डिजाइन और फिल्म की स्थायी सांस्कृतिक विरासत शामिल है।

Yogesh Mishra
Published on: 27 May 2026 6:09 PM IST
Bollywood Old Comedy Movie Golmaal Full Story
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Bollywood Old Comedy Movie Golmaal Full Story

Bollywood Old Comedy Movie Golmaal: 1970 के दशक का अंतिम दौर भारतीय समाज के लिए अजीब विरोधाभासों का समय था। देश राजनीतिक उथल-पुथल, बेरोज़गारी, महँगाई और प्रशासनिक अस्थिरता से गुजर चुका था। आपातकाल की स्मृतियाँ अभी ताज़ा थीं। लेकिन इसी समय भारतीय शहरों में एक बड़ा मध्यवर्ग भी आकार ले रहा था ऐसा वर्ग जो बहुत अमीर नहीं था, लेकिन सम्मानजनक नौकरी, सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक स्थिरता को जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य मानता था। यह वही भारत था जहाँ नौकरी केवल रोज़गार नहीं, सामाजिक पहचान होती थी। बॉस केवल अधिकारी नहीं, लगभग घर के बड़े की तरह प्रभाव रखते थे। और व्यक्ति अपनी वास्तविक इच्छाओं और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच लगातार संतुलन बनाकर जीता था। इसी सामाजिक वातावरण से ‘गोलमाल’ पैदा हुई।

ऋषिकेश मुखर्जी : वह निर्देशक जो साधारण में असाधारण देखता था


ऋषिकेश मुखर्जी हिंदी सिनेमा के उन विरले फ़िल्मकारों में थे जो बड़े विस्फोटों में नहीं, छोटी-छोटी मानवीय हरकतों में कहानी खोजते थे।

'आनंद' में उन्होंने मृत्यु को हँसाते हुए देखा था। 'बावर्ची' में परिवार की टूटन को रसोई से जोड़ा था। 'चुपके चुपके' में भाषा को खेल बना दिया था।

'गोलमाल' में उन्होंने कुछ और खोजा वह झूठ जो कोई बुरा आदमी नहीं बोलता। जो एक डरा हुआ, साधारण, नौकरीपेशा युवक बोलता है। सिर्फ़ इसलिए कि उसे अपना सम्मान बचाना है। यही वह सामाजिक सत्य था जिसे वे परदे पर लाना चाहते थे। हँसाते हुए।

अमोल पालेकर : वह नायक जो "स्टार" नहीं था

उस दौर में हिंदी सिनेमा का नायक आत्मविश्वास से भरा, आकर्षक और बड़े व्यक्तित्व वाला होता था। पर, अमोल पालेकर बिल्कुल अलग थे। उनके चेहरे पर "स्टार" वाली दूरी नहीं थी। वे पड़ोस के लड़के जैसे लगते थे। जिसे देखकर दर्शक सोचे "अरे, यह तो हमारे जैसा है।" ऋषिकेश मुखर्जी को यही चाहिए था।


'रामप्रसाद' कोई सिनेमाई नायक नहीं था। वह एक साधारण युवक था, जो झूठ बोलता है, घबराता है, पकड़े जाने से डरता है। और उसी झूठ के जाल में धीरे-धीरे उलझता चला जाता है।

अमोल पालेकर ने इस किरदार में अभिनय नहीं किया। उन्होंने उसे जिया। उनकी आँखों की बेचैनी, चेहरे की झिझक, झूठ बोलते वक़्त होंठों की हल्की-सी काँपन, यह सब "परफ़ॉर्म" नहीं किया जा सकता। यह सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। और अमोल पालेकर ने महसूस किया।

उत्पल दत्त : वह गंभीरता जो हँसाती है


'भवानी शंकर' हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार कॉमिक किरदारों में है। लेकिन उत्पल दत्त ने उसे कभी "कॉमिक किरदार" की तरह नहीं निभाया। यही उसका रहस्य है। भवानी शंकर को अपनी नैतिकता पर पूरा यकीन है। मूँछ उनके लिए पुरुषत्व और अनुशासन का प्रतीक है। खेलकूद में उनका गहरा विश्वास है। और "चरित्र" उनके लिए जीवन की सबसे बड़ी कसौटी है। उत्पल दत्त ने इस आदमी को पूरी ईमानदारी से जिया। बिना किसी विडंबना के। बिना किसी कैरिकेचर के। और यही यह पूर्ण गंभीरता हास्य बन गई। क्योंकि दर्शक जानता था कि यह आदमी ग़लत नहीं है। बस वह अपने समय में अटका हुआ है। यही फ़र्क था। और यही उत्पल दत्त की महानता थी।

'मूँछ': एक सामाजिक प्रतीक


'गोलमाल' में मूँछ का विचार जितना हास्यपूर्ण लगता है, उतना ही गहरा है। भवानी शंकर के लिए मूँछ रखना एक नैतिक घोषणा है। मूँछ वाला आदमी यानी अनुशासित, पारंपरिक, भरोसेमंद। और यहीं ऋषिकेश मुखर्जी भारतीय सामाजिक ढाँचे का सबसे सूक्ष्म व्यंग्य करते हैं।

व्यक्ति की योग्यता नहीं उसकी बाहरी छवि तय करती है कि वह "अच्छा" है या नहीं।

रामप्रसाद झूठ इसलिए नहीं बोलता कि वह बुरा है। वह झूठ इसलिए बोलता है क्योंकि समाज उसे वैसा देखना चाहता है जैसा वह नहीं है। यही व्यंग्य यही सच पूरी फ़िल्म की आत्मा है।

ऋषिकेश मुखर्जी की एडिटिंग : वह लय जो संगीत से भी सटीक थी

'गोलमाल' की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि दिखती नहीं। लेकिन महसूस होती है। ऋषिकेश मुखर्जी एडिटिंग को कॉमेडी का सबसे बड़ा हथियार मानते थे। वे जानते थे हास्य "रिद्म" से पैदा होता है। संवाद कहाँ रुकेगा। प्रतिक्रिया कब आएगी। कैमरा कितनी देर ठहरेगा। पात्र कब चौंकेगा। यह पूरा समय-नियंत्रण लगभग संगीत जैसा सटीक था।

'गोलमाल' के हास्य-दृश्य इसीलिए आज भी उतने ही ताज़े हैं। क्योंकि उनकी लय कभी पुरानी नहीं होती।

सेट डिज़ाइन : वह वास्तविकता जो हास्य को धार देती है

ऋषिकेश मुखर्जी को भव्यता नहीं चाहिए थी। उन्हें विश्वसनीयता चाहिए थी। ऑफिस के दृश्यों में फर्नीचर, दीवारें, फाइलें, पंखे, सब वैसे ही थे जैसे 1970 के दशक के किसी असली भारतीय ऑफिस में होते थे।


घर भी वैसे ही, न बहुत अमीर, न बहुत गरीब। मध्यवर्गीय। परिचित। यही परिचितपन फ़िल्म के हास्य को और धारदार बनाता था। जब दर्शक देखते थे कि यह दुनिया उनके अपने जीवन जैसी है तो रामप्रसाद का डर उनका अपना डर बन जाता था। और उसी डर पर हँसना कहीं ज़्यादा गहरा हँसना होता है।

आर. डी. बर्मन और 'आने वाला पल'

'गोलमाल' संगीत-प्रधान फ़िल्म नहीं थी। लेकिन एक गीत था जो फ़िल्म के हल्के-फुल्के संसार में अचानक एक दरवाज़ा खोल देता था जीवन की क्षणभंगुरता का। 'आने वाला पल जाने वाला है।' आर. डी. बर्मन और गुलज़ार चाहते थे कि यह गीत बोझिल न हो। उसमें जीवन का सरल दर्शन हो, हल्के हाथ से छुआ हुआ। किशोर कुमार की आवाज़ ने इसे वह छुअन दी। हँसी की फ़िल्म के भीतर यह गीत जब आता है तो दर्शक एक पल के लिए रुक जाता है। और सोचता है। यही ऋषिकेश मुखर्जी की विशेषता थी कि उनकी हल्की फ़िल्में भी भीतर से गहरी थीं।

सहजता की इंजीनियरिंग

बहुत कम लोग समझते हैं कि ‘गोलमाल’ की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि उसकी “सहजता की इंजीनियरिंग” थी। फ़िल्म इतनी स्वाभाविक लगती है कि उसकी कठिनाई दिखाई नहीं देती। लेकिन वास्तव में कॉमेडी को इतना सहज बनाना अत्यंत जटिल काम होता है। संवाद की गति, एडिटिंग की लय, अभिनय की सूक्ष्मता और दृश्य संरचना सब कुछ असाधारण नियंत्रण माँगता है। यही कारण है कि ‘गोलमाल’ आज भी कृत्रिम नहीं लगती।


फ़िल्म का बजट बहुत बड़ा नहीं था। यह विशाल सेटों, विदेशी लोकेशनों या स्टार-प्रधान तमाशे पर आधारित फ़िल्म नहीं थी। लेकिन इसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी लेखन गुणवत्ता और अभिनय थे। यही ऋषिकेश मुखर्जी सिनेमा की विशेषता थी। सीमित संसाधनों में गहरी मानवीय दुनिया रचना।

अपनी कॉमेडी, अपना संसार

रिलीज़ के समय ‘गोलमाल’ को दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने बेहद पसंद किया। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि बिना फूहड़ता, बिना ज़ोरदार स्लैपस्टिक और बिना कृत्रिम रोमांस के भी कॉमेडी असाधारण रूप से मनोरंजक हो सकती है। फ़िल्म का हास्य घरेलू बातचीत का हिस्सा बनने लगा।

बॉक्स ऑफिस पर फ़िल्म बड़ी सफलता साबित हुई। लेकिन उसकी वास्तविक ताकत उसकी “लंबी उम्र” थी। टेलीविज़न युग में प्रवेश करने के बाद ‘गोलमाल’ ने नई पीढ़ियों के बीच भी वही लोकप्रियता हासिल की। बहुत कम कॉमेडी फ़िल्में समय के साथ और अधिक प्रिय होती जाती हैं। ‘गोलमाल’ उनमें से एक है।

समीक्षकों ने विशेष रूप से ऋषिकेश मुखर्जी की लेखन-संवेदनशीलता और उत्पल दत्त-अमोल पालेकर की जोड़ी की प्रशंसा की। समय के साथ फ़िल्म की आलोचनात्मक प्रतिष्ठा और बढ़ती गई क्योंकि लोगों ने समझा कि यह केवल कॉमेडी नहीं थी। यह भारतीय मध्यवर्ग का सूक्ष्म सामाजिक अध्ययन भी थी।

विदेशों में बसे भारतीय दर्शकों के बीच भी फ़िल्म अत्यंत लोकप्रिय हुई क्योंकि उसमें भारतीय घरेलू संस्कृति की परिचित गर्माहट थी। प्रवासी दर्शकों के लिए यह फ़िल्म भारत की “घर जैसी” स्मृति बन गई।

‘गोलमाल’ की सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत यही है कि उसने भारतीय कॉमेडी को गरिमा दी। उसने साबित किया कि हास्य केवल शोर, गिरने-पड़ने और फूहड़ता से पैदा नहीं होता। वह मनुष्य की सामाजिक बेचैनी, छोटे झूठों और रोज़मर्रा की असुरक्षाओं से भी पैदा हो सकता है। यही कारण है कि ‘गोलमाल’ आज भी केवल मज़ेदार फ़िल्म नहीं लगती। वह भारतीय मध्यवर्ग की सामूहिक आत्मकथा जैसी लगती है।


लेकिन ‘गोलमाल’ का सबसे गहरा असर उसके अंतिम भावों में खुलता है। वहाँ फ़िल्म केवल एक झूठ के पकड़े जाने या बच निकलने की कहानी नहीं रह जाती। वह धीरे-धीरे उस भारतीय समाज की कहानी बन जाती है जहाँ व्यक्ति को लगातार कई चेहरे पहनकर जीना पड़ता है। रामप्रसाद का सबसे बड़ा संघर्ष किसी अपराध को छिपाना नहीं है। उसका संघर्ष यह है कि वह अपनी नौकरी, सम्मान और सामाजिक स्वीकृति बचाये रख सके। यही कारण है कि दर्शक उसके झूठ से नाराज़ नहीं होता। वह उसके साथ खड़ा हो जाता है। क्योंकि कहीं न कहीं हर मध्यवर्गीय आदमी अपने जीवन में कुछ न कुछ अभिनय कर रहा होता है।

यहीं ‘गोलमाल’ अपनी सबसे बड़ी मानवीय ऊँचाई पर पहुँचती है। फ़िल्म यह समझती है कि समाज अक्सर लोगों को उनके वास्तविक व्यक्तित्व के साथ स्वीकार नहीं करता। इसलिए लोग “आदर्श कर्मचारी”, “संस्कारी युवक”, “सभ्य बेटा” या “अनुशासित इंसान” जैसी भूमिकाएँ निभाने लगते हैं। रामप्रसाद का दोहरा व्यक्तित्व इसी सामाजिक दबाव का हास्यपूर्ण लेकिन बेहद सटीक रूपक है।

ऋषिकेश मुखर्जी अपने पात्रों का मज़ाक नहीं उड़ाते। वे उन्हें समझते हैं। भवानी शंकर भी पूरी तरह खलनायक नहीं हैं। वे उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अनुशासन और नैतिकता को लेकर कठोर है क्योंकि उसे डर है कि आधुनिकता सब कुछ बिगाड़ देगी। वहीं रामप्रसाद नई पीढ़ी का प्रतिनिधि है जो जीवित रहने के लिए लचीला बनना सीख चुकी है। यही पीढ़ीगत टकराव फ़िल्म को और गहरा बनाता है। और शायद यही कारण है कि ‘गोलमाल’ आज भी समाप्त नहीं हुई। क्योंकि उसका संसार आज भी हमारे आसपास मौजूद है।

ऑफिस बदल गये हैं।

कपड़े बदल गये हैं।

लेकिन लोग अब भी अपनी वास्तविकता छिपाकर “स्वीकार्य” दिखने की कोशिश कर रहे हैं।

यही कारण है कि ‘गोलमाल’ केवल कॉमेडी नहीं रह जाती।वह भारतीय मध्यवर्गीय जीवन का सबसे मुस्कुराता हुआ, और शायद सबसे सच्चा आईना बन जाती है।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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