Bollywood Old Movie Guide: ‘गाइड’ एक किताब, एक सपना, एक फ़िल्म और एक अनसुलझा सवाल

Guide Full Movie Story: 'गाइड' ने बिना किसी उपदेश के इन तमाम सवालों को छुआ और बहुत ही संजीदगी से उठाया है।

Yogesh Mishra
Published on: 18 May 2026 6:31 PM IST
Bollywood Old Movie Guide: ‘गाइड’ एक किताब, एक सपना, एक फ़िल्म और एक अनसुलझा सवाल
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Bollywood Old Movie Guide Full Story: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो अपने समय से आगे चलती हैं। वे केवल सफल फ़िल्में नहीं रहतीं। बल्कि आने वाले दशकों की सिनेमाई दिशा बदल देती हैं। ‘गाइड’ ऐसी ही फ़िल्म थी। 1965 में रिलीज़ हुई यह फ़िल्म केवल एक प्रेम कहानी नहीं थी। यह एक आदमी की आत्मिक यात्रा थी। एक स्त्री की स्वतंत्रता की कहानी थी। एक समाज से टकराते प्रेम की त्रासदी थी। और अंततः यह उस प्रश्न की खोज थी कि मनुष्य वास्तव में कौन है, वह जो दुनिया देखती है, या वह जो भीतर छिपा रहता है। 'गाइड' ने बिना किसी उपदेश के इन तमाम सवालों को छुआ और बहुत ही संजीदगी से उठाया है।

किताब से पर्दे तक 'गाइड'

1958 की बात है। देव आनंद सफ़र कर रहे थे। उनके हाथ में थी आर. के. नारायण की हाल ही में प्रकाशित एक किताब 'द गाइड'। जैसे-जैसे पन्ने पलटते गए, उनकी उँगलियाँ ठिठकती गईं। वे उस राजू गाइड की दुनिया में खो गए थे। राजू, एक ऐसा इंसान जो टूरिस्ट गाइड से शुरू होकर प्रेमी बनता है, मैनेजर बनता है, ठग बनता है, कैदी बनता है, और अंततः एक संत।

देव आनंद ने किताब बंद की। उन्होंने मन में तय कर लिया कि यह फ़िल्म बनेगी। चाहे कुछ भी हो। देव साहब का ये फैसला, यह सिर्फ़ एक फ़िल्म बनाने का नहीं था। बल्कि यह भारतीय सिनेमा की दिशा बदलने का अनजाने में लिया गया संकल्प था।


आर. के. नारायण का 'द गाइड' कोई साधारण उपन्यास नहीं था। 1960 में इसी उपन्यास के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इस उपन्यास में उन्होंने राजू नाम का एक ऐसा किरदार गढ़ा जो एक साधारण, थोड़ा चालाक, थोड़ा स्वार्थी और थोड़ा प्रेमी इंसान है। वह कोई खलनायक नहीं है पर हीरो भी नहीं है। वह हम जैसा है। एक आम इंसान।

आर.के. नारायण ने जब सुना कि देव साहब उनके उपन्यास पर फ़िल्म बनाना चाहते हैं, तो वे हिचकिचाए क्योंकि उन्हें बॉलीवुड की लटके झटके, ओवर मेलोड्रामा वाली परंपरा का डर था। लेकिन देव आनंद का आग्रह देखकर वे राज़ी हो गए। सिर्फ एक शर्त लगाई कि फ़िल्म का अंग्रेज़ी संस्करण भी बनाया जाए।

एक आर्टिस्ट निर्देशक : विजय आनंद

देव आनंद के बड़े भाई चेतन आनंद पहले से ही फ़िल्म जगत में थे। छोटे भाई विजय आनंद उर्फ 'गोल्डी' एक ऐसे फ़िल्मकार साबित हुए जिन्होंने भारतीय सिनेमा में गाने फ़िल्माने का तरीक़ा ही बदल दिया।

उनसे पहले गानों की शूटिंग का चलन था, कैमरा स्थिर रखो, गायक गाए, नायक-नायिका झूमें, कट। विजय को ये पसन्द नहीं था। 'गाइड' में उन्होंने अपनी चाहत पूरी की। 'आज फिर जीने की तमन्ना है' गाने में उन्होंने कैमरे को वहीदा रहमान के साथ दौड़ाया, घुमाया, खुले मैदानों और पहाड़ियों पर छोड़ दिया। वह गाना एक मील का पत्थर बन गया।


फ़िल्म की शूटिंग भारत के कई हिस्सों में हुई। राजस्थान, उदयपुर और ग्रामीण इलाकों के दृश्य फ़िल्म को वास्तविकता देते हैं। विजय आनंद चाहते थे कि प्रकृति केवल पृष्ठभूमि न लगे। वह पात्रों की मानसिक स्थिति का हिस्सा बने।

वहीदा रहमान और रोज़ी

गाइड में 'रोज़ी' का किरदार उस दौर के लिए हैरतअंगेज था। रोज़ी एक शादीशुदा औरत है जो आज़ादी चाहती है, दिल की तमन्ना पूरी करना चाहती है। रोज़ी अपने पुरातनपंथी पति को छोड़कर चली जाती है। रोज़ी नाचना चाहती है, जीना चाहती है, अपनी शर्तों पर। 1965 के भारत में यह सिर्फ साहसी नहीं बल्कि समाज की नज़र में विद्रोही नजरिया था।


वहीदा रहमान शुरू में डरी हुई थीं। उन्हें चिंता थी कि क्या दर्शक इस किरदार को स्वीकार करेंगे? क्या उनकी अपनी इमेज प्रभावित होगी? लेकिन विजय आनंद ने उन्हें समझाया। उन्होंने कहा, 'रोज़ी बुरी औरत नहीं है। वह बस एक ज़िंदा इंसान है।' और वहीदा रहमान ने उसी रोज़ी को जिया। उन्होंने उसकी टूटन को, उसके डर को, उसकी ख़ुशी को और उसकी थकान को इतनी गहराई से निभाया कि परदे पर रोज़ी कभी-कभी किरदार नहीं, सच्ची इंसान लगती है। बाद में वहीदा रहमान ने एक इंटरव्यू में कहा था :'रोज़ी मेरे सबसे क़रीबी किरदारों में से एक है। उसके लिए मुझे कुछ बनावटी नहीं करना पड़ा। बस खुद को उसमें घुला देना पड़ा।'

‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ केवल गीत नहीं था। वह रोज़ी की मुक्ति की घोषणा थी। पहली बार वह अपने भय और सामाजिक बंधनों से बाहर निकलती दिखाई देती है।

देव आनंद का राजू

उस समय देव आनंद की अलग ही इमेज थी, स्टाइलिश, रोमांटिक, मुस्कुराता हुआ नायक। वे हर फ़िल्म में जीतते थे। प्रेम में, संघर्ष में, ज़िंदगी में। लेकिन राजू गाइड उनसे बिल्कुल उलट किरदार था। राजू प्रेम में पड़ता है। लेकिन स्वार्थ के साथ। वह रोज़ी का शोषण करता है, चाहे अनजाने में। वह झूठ बोलता है। वह जेल जाता है। और अंत में जब गाँव वाले उसे संत समझने लगते हैं, तो वह खुद नहीं जानता कि वह है क्या।


देव आनंद की इमेज बर्बाद होने का खतरा था लेकिन देव साहब किसी भी प्रयोग से डरने वाले नहीं थे। बाद के वर्षों में उन्होंने लिखा, 'राजू मेरे भीतर का वह हिस्सा था जिसे मैंने कभी दिखाया नहीं था। उसे जीना मुझे डराता भी था और रोमांचित भी करता था।'

एस. डी. बर्मन और 'दिन ढल जाए'

संगीतकार सचिन देव बर्मन। इंडस्ट्री के 'दादा'। 'गाइड' के संगीत की रिकॉर्डिंग के दौरान एक रात 'दिन ढल जाए' की बारी आई। बर्मन दादा स्टूडियो में बैठे थे। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। उन्होंने मोहम्मद रफ़ी से कहा, 'रफ़ी साहब, इस गाने में दर्द नहीं चाहिए। उससे भी कुछ गहरा चाहिए। जैसे कोई थका हुआ इंसान आसमान की तरफ़ देख रहा हो और सोच रहा हो अब और कितना चलना है?'


रफ़ी ने एक बार आँखें मूँदीं। फिर माइक के सामने खड़े हो गए। पहली ही टेक में वह गाना बन गया जो आज भी भारत के सबसे इमोशनल गीतों में गिना जाता है। 'वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ' गाना एस. डी. बर्मन ने खुद गाया। यह उनकी आवाज़ थी, कँपकँपाती, थोड़ी कच्ची। लेकिन अत्यंत सच्ची। उनके करीबी बताते हैं कि इस गाने की रिकॉर्डिंग के बाद वे काफ़ी देर तक चुप बैठे रहे।

ये गीत फ़िल्म का आध्यात्मिक केंद्र जैसा है। यह गीत केवल कहानी को आगे नहीं बढ़ाता। वह मनुष्य की अस्थायीता और जीवन की अनिश्चितता पर टिप्पणी करता है।

शैलेन्द्र : एक दार्शनिक गीतकार

गीतकार शैलेन्द्र ने एक बार कहा था, 'मैं शब्दों से नहीं, ज़िंदगी से लिखता हूँ।' 'गाइड' के गीत उनकी इसी सोच के सबूत हैं। 'काँटों से खींच के ये आँचल' में स्त्री की पीड़ा और संकल्प दोनों एक साथ हैं। 'तेरे मेरे सपने' में प्रेम और स्वप्न की वह नाज़ुक डोर है जो टूटने को है लेकिन अभी टूटी नहीं। और 'आज फिर जीने की तमन्ना है', जो शायद हिंदी के सबसे उत्सवधर्मी मुक्तिगानों में से एक है। दुखद यह है कि शैलेन्द्र 'गाइड' की सफलता ज़्यादा देख नहीं पाए। 1966 में, फ़िल्म की रिलीज़ के अगले ही वर्ष, उनका निधन हो गया। वे केवल 43 वर्ष के थे।

नारायण की नाराजगी

‘गाइड’ का निर्माण पूरी तरह सहज नहीं था। सबसे बड़ा विवाद था आर. के. नारायण की प्रतिक्रिया। उन्हें लगा कि फ़िल्म ने उपन्यास की मूल संवेदना और अंत को बदल दिया है।


विशेष रूप से रोज़ी और राजू के संबंधों को लेकर वे संतुष्ट नहीं थे। बाद में उन्होंने एक लेख में लिखा कि गाइड फ़िल्म में उपन्यास की आत्मा नहीं बल्कि कंकाल था। इसके बावजूद फ़िल्म धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने लगी। दर्शकों ने इसे साहित्यिक रूपांतरण की तरह नहीं। बल्कि भावनात्मक और सिनेमाई अनुभव की तरह स्वीकार किया।

अंग्रेज़ी संस्करण :एक असफल प्रयोग

अमेरिकी निर्देशक टैड डेनियलिव्स्की के साथ 'गाइड' का अंग्रेज़ी संस्करण भी बना। देव आनंद ने दोनों संस्करणों में काम किया। कुछ दृश्य साथ-साथ, कुछ अलग-अलग शूट किए गए। लेकिन अंग्रेज़ी 'गाइड' वह जादू नहीं बिखेर सकी जो हिंदी 'गाइड' ने बिखेरा। अंग्रेज़ी में राजू का वह अंदर का संसार जो हिंदी संवादों और एस. डी. बर्मन के संगीत में साँस लेता था कहीं खो गया। यह इस बात का प्रमाण था कि कुछ कहानियाँ अपनी भाषा में ही जीती हैं।

वह अंत जिसका जवाब कभी नहीं मिला

'गाइड' का अंत भारतीय सिनेमा के सबसे रहस्यमय दृश्यों में से एक है। राजू उपवास पर है। गाँव में सूखा है। लोग उसे संत मानते हैं। लेकिन वह खुद नहीं जानता कि वह है क्या। और फिर बारिश आती है। या शायद नहीं आती। परदे पर बादल हैं, आँखें हैं, विश्वास है। लेकिन क्या सच में वर्षा होती है, यह विजय आनंद ने कभी स्पष्ट नहीं किया। यही खुलापन 'गाइड' को एक फ़िल्म से बड़ा बनाता है। यह एक अनुभव है, जिसका अर्थ हर देखने वाला अपने भीतर से निकालता है।

पुरस्कार, प्रतिष्ठा और एक अमर विरासत

'गाइड' ने 1966 के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों में धमाका किया। सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (देव आनंद), सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (वहीदा रहमान), सब पुरस्कार जीते।

फ़िल्म ने लगभग 3 से 4 करोड़ रुपये की कमाई की जो उस ज़माने में विशाल रकम थी। लेकिन 'गाइड' की असली विरासत किसी संख्या में नहीं। वह उन करोड़ों दर्शकों के भीतर है जिन्होंने 'आज फिर जीने की तमन्ना है' सुनकर कभी न कभी आँखें मूँदी हैं और महसूस किया है कि हाँ जीना तो है।

लगभग छह दशक बाद भी 'गाइड' की प्रासंगिकता कम नहीं हुई। इसलिए नहीं कि यह 'क्लासिक' है। बल्कि इसलिए कि इसके सवाल खत्म नहीं हुए। क्या प्रेम में स्वार्थ हो सकता है और फिर भी वह प्रेम रहे?क्या एक इंसान एक ही जीवन में कई चेहरे जी सकता है?क्या संत वह होता है जो बनना चाहता है या वह जिसे दुनिया बना देती है?

'गाइड' इन सवालों का जवाब नहीं देती। वह बस इन्हें हमारे सामने रख देती है। शायद इसीलिए यह फ़िल्म देखी नहीं जाती, महसूस की जाती है। ‘गाइड’ के बाद हिंदी सिनेमा में नायक और नायिका दोनों के चरित्र बदलने लगे। अब पात्र केवल अच्छे या बुरे नहीं रहे। वे अधिक मानवीय, अधिक जटिल और अधिक वास्तविक बनने लगे। इस परिवर्तन में ‘गाइड’ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। समय के साथ ‘गाइड’ भारतीय सिनेमा की सबसे महान फिल्मों में शामिल हो गई। विश्व सिनेमा के अध्येता आज भी इसकी सिनेमैटोग्राफी, संगीत और कथात्मक संरचना का अध्ययन करते हैं।

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Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Neel Mani Lal
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