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Bollywood Old Movie Pyaasa: वह फ़िल्म जिसमें गुरु दत्त ने अपनी आत्मा परदे पर रख दी
Bollywood Old Movie Pyaasa: गुरु दत्त की फिल्म ‘प्यासा’ सिर्फ एक सिनेमाई कृति नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, अकेलेपन और समाज के पाखंड पर गहरी टिप्पणी है।
Bollywood Old Movie Pyaasa: क्या संवेदनशील आदमी के लिए इस समाज में सचमुच कोई जगह है? यह 'प्यासा' का आखिरी सवाल है। लेकिन असल में यही उसकी शुरुआत भी है। 1957 में जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई उस समय हिंदी सिनेमा रोमांटिक मनोरंजन, हल्के गीतों और सुखद अंत की दुनिया में था। उस दुनिया में गुरु दत्त एक ऐसी फ़िल्म लेकर आए जिसमें नायक टूटता है, दुनिया से थक जाता है, और अंत में उस समाज को ही अस्वीकार कर देता है जो उसे अस्वीकार करता आया था। यह साहस था। यह आत्मस्वीकृति थी। और यही 'प्यासा' को अमर बनाता है।
फ़िल्मकार जो ख़ुद 'विजय' था
'प्यासा' का केंद्रीय पात्र 'विजय' केवल काल्पनिक नहीं था। फिल्म इतिहासकार लंबे समय से मानते आए हैं कि विजय में गुरु दत्त का अपना अकेलापन था। उनकी संवेदनशीलता थी। और समाज के प्रति उनका गहरा, दबा हुआ आक्रोश था। वे उन कलाकारों को देखते थे जो जीते-जी संघर्ष करते रहे और मरने के बाद "महान" घोषित हुए। साहित्य, संगीत, कला, हर जगह यही होता था। यही पाखंड 'प्यासा' की जड़ में था।
गुरु दत्त ने यह फ़िल्म इसलिए नहीं बनाई कि समाज को सुधारें। उन्होंने इसलिए बनाई क्योंकि यह उनके भीतर से निकलनी थी। और जो भीतर से निकलता है, वह अलग ही भाषा बोलता है।
अबरार अल्वी: जिसने दर्द को शब्द दिए
'प्यासा' की पटकथा और संवाद अबरार अल्वी ने लिखे। गुरु दत्त और अबरार अल्वी घंटों बैठते थे। दृश्यों पर, संवादों पर, हर पंक्ति के वजन पर। उनका एक ही सिद्धांत था, बनावटी नाटकीयता नहीं चाहिए। दर्द वास्तविक लगना चाहिए। संवाद साहित्यिक हों, लेकिन जीवन से कटे हुए न हों।
यही कारण है कि 'प्यासा' के संवाद आज भी कविता जैसे गहरे लगते हैं लेकिन बोझिल नहीं। "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है" - यह केवल गीत की पंक्ति नहीं थी। यह पूरी फ़िल्म का दार्शनिक निष्कर्ष था। सफलता, प्रसिद्धि और धन के प्रति मोहभंग है, एक पंक्ति में।
वी. के. मूर्ति का कैमरा जो कविता लिखता था
'प्यासा' की दृश्य भाषा भारतीय सिनेमा में अद्वितीय है।
यह उपलब्धि सिनेमैटोग्राफर वी. के. मूर्ति और गुरु दत्त की साझेदारी से जन्मी। मूर्ति केवल रोशनी नहीं डालते थे। वे भावनाओं को रोशनी से बनाते थे।
विजय जब भीड़ में होता है तो कैमरा उसे अकेला दिखाता है। जब वह अंधेरे कमरे में होता है तब रोशनी की एक लकीर उस पर पड़ती है जो उसकी बेचैनी को और तीखा कर देती है।
यह प्रकाश-अंधेरे का खेल केवल सौंदर्यशास्त्र नहीं था। यह पात्र की मानसिक अवस्था को दृश्य रूप देना था।
कई दृश्य देर रात फिल्माए गए ताकि प्राकृतिक और कृत्रिम रोशनी का वह संयोजन मिले जो गुरु दत्त के मन में था। शूटिंग तब तक नहीं रुकती थी जब तक रोशनी "वैसी" न हो जाए। यही परफेक्शन 'प्यासा' को देखने का नहीं बल्कि महसूस करने का अनुभव बनाता है।
साहिर लुधियानवी : वह शायर जिसके गीत आग थे
'प्यासा' के गीत भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में अलग श्रेणी में रखे जाते हैं। साहिर लुधियानवी स्वयं समाज की असमानताओं और पाखंड से गहराई से प्रभावित शायर थे। जब उन्होंने 'प्यासा' के लिए लिखा तो लिखा नहीं, जिया।
'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं' - वेश्याओं की बस्ती, गरीबी और टूटे इंसानों के बीच फिल्माया गया यह गीत उस दौर के समाज पर बेहद साहसी टिप्पणी थी। गुरु दत्त चाहते थे कि दर्शक असहज हों। कि वे केवल मनोरंजन न लें बल्कि अपने समाज का चेहरा देखें।
'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' की शूटिंग के दौरान सेट पर सन्नाटा रहता था। यूनिट के सदस्य जानते थे यह केवल गीत नहीं, एक कलाकार का आंतरिक विस्फोट है।
एस. डी. बर्मन का संगीत जो ख़ामोशी से बड़ा था
एस. डी. बर्मन ने 'प्यासा' के लिए वह किया जो संगीत से माँगा जाता है, कहानी के भीतर साँस लेना।
'सर जो तेरा चकराए' की सहजता हो या 'हम आपकी आँखों में' की कोमलता - बर्मन ने हर गीत को उस दृश्य की भावनात्मक ज़रूरत के हिसाब से गढ़ा। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि संगीत कभी फ़िल्म से बड़ा नहीं हुआ। वह फ़िल्म का हिस्सा बना रहा। रफ़ी, गीता दत्त और हेमंत कुमार की आवाज़ों ने इस संगीत को वह मानवीय छुअन दी जो केवल स्वर-संरचना से नहीं आती।
गुरु दत्त का अभिनय : जब कलाकार ख़ुद को निभाता है
'विजय' के लिए किसी और अभिनेता की कल्पना करना कठिन है। गुरु दत्त के चेहरे पर एक स्थायी थकान थी। आँखों में एक गहरी उदासी जो रोशनी में भी नहीं जाती थी। संवाद बोलने की वह धीमी, भीतर से निकलती शैली।
यह अभिनय नहीं था।
यह आत्मप्रकाशन था।
कई बार ऐसा लगता है कि वे विजय को नहीं जी रहे बल्कि विजय उनके भीतर से बाहर आ रहा है।
वहीदा रहमान : वह गरिमा जो समाज नहीं दे सका
'गुलाबो' 'प्यासा' की नैतिक आत्मा है। समाज जिसे "गिरा हुआ" मानता है, वही सबसे पहले विजय की कविता को, उसकी संवेदनशीलता को पहचानती है। जबकि सभ्य और सफल लोग उसे ठुकराते रहते हैं। गुरु दत्त यहाँ समाज की नैतिक संरचना पर सबसे तीखा सवाल उठाते हैं, बिना एक शब्द बोले।
वहीदा रहमान ने गुलाबो में जो गरिमा भरी वह असाधारण थी। उनकी आँखों में करुणा थी। करुणा जो दया नहीं थी सम्मान था। यही किरदार 'प्यासा' को केवल कवि की कहानी नहीं रहने देता। वह स्त्री की गरिमा की, और समाज के झूठे मानदंडों की कहानी भी बन जाता है।
वह दृश्य जो भारतीय सिनेमा में अमर है
'प्यासा' का सबसे शक्तिशाली दृश्य श्रद्धांजलि सभा का।
विजय की "मृत्यु" की खबर फैल चुकी है। वही लोग जिन्होंने उसे जीते-जी ठुकराया था अब उसकी प्रशंसा में भाषण दे रहे हैं। कविताएँ छप रही हैं। नाम हो रहा है।
और विजय भीड़ में खड़ा यह सब देख रहा है।
यह दृश्य भारतीय सिनेमा की सबसे तीखी सामाजिक टिप्पणियों में से एक है। गुरु दत्त यहाँ कुछ नहीं बोलते। दृश्य बोलता है। और जो बोलता है वह आज भी उतना ही सच है।
वह अंत जो सबसे साहसी था
विजय अंत में प्रसिद्धि अस्वीकार कर देता है। सम्मान अस्वीकार करता है। झूठी श्रद्धांजलि अस्वीकार करता है। वह उस दुनिया को छोड़ देता है, जिसने उसे केवल उपयोग की वस्तु समझा। 1957 के हिंदी सिनेमा में यह अंत असाधारण था। नायक जीतता नहीं। प्रेम पूरा नहीं होता। समाज नहीं बदलता।
लेकिन नायक अपनी शर्तों पर जीने का फ़ैसला करता है। यही साहस 'प्यासा' को उस दौर की हर सफल फ़िल्म से अलग करता है।
वह विरासत जो विश्व सिनेमा तक पहुँची
समय के साथ 'प्यासा' को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में गिना जाने लगा।
यूरोपीय समीक्षकों ने इसकी तुलना इतालवी नव-यथार्थवाद और फ्रेंच नई लहर की फिल्मों से की। वी. के. मूर्ति की सिनेमैटोग्राफी को विश्व-स्तरीय तकनीकी उपलब्धि माना गया। फिल्म स्कूलों में आज भी 'प्यासा' को प्रकाश-संयोजन, भावनात्मक फ्रेमिंग और सामाजिक सिनेमा के उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाता है।
'प्यासा' इसलिए महान नहीं है कि उसमें बड़े सितारे थे या बड़ा बजट था। वह इसलिए महान है क्योंकि उसमें एक संवेदनशील कलाकार ने अपनी पूरी आत्मा डाल दी और जो आत्मा से बनता है वह समय से नहीं डरता। आज भी जब कोई कलाकार दुनिया की बेरुख़ी से टकराता है तो 'प्यासा' उसके पास होती है। चुपचाप। हमेशा की तरह।


