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Hindi Literature Crisis: क्या हिंदी साहित्य संसार में छटनी संभव है
Hindi Literature Crisis: क्या हिंदी साहित्य में भी छंटनी संभव है? यह विचारोत्तेजक लेख सोशल मीडिया के दौर में गिरते साहित्यिक मानकों, दिखावे और वास्तविक सृजन के बीच के संघर्ष पर सवाल उठाता है।
Hindi Literature Crisis (Image Credit-Social Media)
Hindi Literature Crisis: अभी बीते दिनों हिंदी साहित्य की प्रमुख छायावादी कवियत्री महादेवी वर्मा की जन्म जयंती निकली है। बड़े ही चुपचाप निकल गई। स्त्री मुक्ति की बड़ी आवाज को कहीं हमने 'गिल्लू' और 'मैं नीर भरी दुःख की बदली' से आगे कहीं समझने की जरूरत ही नहीं समझी है। दरअसल हमें नासिक के धूर्त ढोंगी बाबा अशोक खरात के वीडियो और ईरान- अमेरिका युद्ध, गैस सिलेंडरों की मारामारी और धुरंधर 2 से फुर्सत मिलें तो हम यह सोचते और उस पर बात करते। क्या हम अपने साहित्यिक पूर्वजों के अवदान को भूलने लग गए हैं? क्या यह साहित्यिक और सांस्कृतिक विस्मृति का समय चल रहा है?
इन दोनों बहुत से नए चेहरे हिंदी साहित्य के नाम पर, हिंदी रचना के नाम पर आगे बढ़ते और स्थापित होते दिखाई दे रहे हैं, जो कि कभी अनाम थे। लेखन का रचना संसार पहले की तरह शब्द सृजन संसार नहीं रहा, बल्कि आगे बढ़कर एक मौखिक अदृश्य सी सत्ता का भी संसार हो चला है, जहां पर विचार या लेखन से आपका स्तर तय नहीं होता, आपकी जगह तय नहीं होती। बल्कि एक तरह का तंत्र विकसित हो चला है जो यह तय करने लगा है कि मंच किसे मिलेगा, निर्णायक कौन रहेगा, साहित्यिक उत्सव में कौन संचालन करेगा, कौन छपेगा और कौन नहीं छपेगा। दरअसल यह क्षेत्र भी एक चक्रव्यूह के समान हो चला है, जहां घुसने के लिए हर रचनाकार तैयार नहीं हो पाता या हो पाती है। इसके अपने अघोषित से नियम हैं, अदृश्य सी परंपराएं हैं।
हिंदी बोलने और उच्चारित किए जाने की भी स्थिति बहुत ही संतोषजनक नहीं कहीं जा सकती है। विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और उन पर चलते चैनलों के उद्घोषकों की जब हिंदी देखी जाती है, न तो उन्हें भाषा की समझ होती है, न ही उसके प्रति संवेदना। जबकि पहले के उद्घोषकों का उच्चारण, औपचारिक लहजा, उनकी भाषा के कारण वे पहचाने जाते रहे थे। इस गिरावट का असर उनके अपने प्रस्तुतीकरण पर दिखाई दे रहा है। हद तो यह है कि हिंदी की बिंदी अपने स्थान से सरक पर कहीं और उड़ चली है। भाषा पर पकड़ अब दूर की कौड़ी हो गई है। अन्य भाषा -भाषियों के साथ यह काम सबसे ज्यादा हिंदी वालों के ही हाथों में हो रहा है क्योंकि अब लाइक, शेयर और कमेंट्स का जमाना है। वह समय गया जब लेखक अपने भीतर की आवाज से लिखते, देखते और सुनते थे। वह रोशनी को भी समझते थे, शब्दों को भी समझते थे, मौन को भी समझते थे और अंधेरों को भी पढ़ लेते थे, पेड़ पौधों को भी जानते थे तो पत्थर तोड़ती स्त्री की भी पीड़ा को समझते थे। अब लेखक अपने आंख-कान से देखकर भी सही लिख नहीं पाते हैं। जब-जब किसी ने इसके विरुद्ध बोलने की कोशिश की है तो उन्हें उस विमर्श में समझने की जगह न देखने वाले हिस्से में डाल दिया जाता है। भले ही चर्चा में आए इन चेहरों की कविताओं से विचार ही गायब हैं। बल्कि यूं लगता है कि अलग-अलग व्हाट्सएप ग्रुपों में चलती रोजाना की विचार या शब्द या चित्र चर्चा पर लिखी हुई कवितानुमा रचनाएं हैं, जिन्हें ये चर्चित चेहरे अब इस रचना संसार में बिखेर रहें हैं।
सीधी सपाट कह दी गई इन कविताओं को बस हाथों के झोके दे देकर, चेहरे में विस्मयकारी मुद्राओं द्वारा दृश्य- श्रव्य, आडंबरी तरीके से प्रस्तुत करना ही अब काव्य प्रस्तुति बन गया है। शब्द भी याद नहीं रहते अब कविताओं के या उनमें कोई नयापन नहीं होता है। बल्कि कुछ कविताएं तो चुराई हुई सी प्रतीत होती हैं। क्या हम शब्दों की आंतरिक शक्ति को नहीं पहचान रहे हैं, क्या हम भूल गए हैं? अब हमें याद रहते हैं तो कविता कहन के तरीके और उससे उपजी झटक -मटक। कथा कहन, कविता कहन मानो अब एक कला न होकर सेल्फी का कहन हो गया है, जिसमें न शब्द है न ध्वनि है, न प्रेम है। अधिकांश आलेखों, कहानियों को पढ़कर भी यही प्रतीत होने लगा है कि चैट जीपीटी का सपाटपन इनमें भर गया है, जैसे बाहर से उन्हें अच्छे से सजा कर बैठा दिया गया हो। कुछ भी दिल में उतरता ही नहीं।
फेसबुक भरे पड़े होते हैं लाइक्स और कमेंट से। छानों तो अंगूठा दिखाने और शाबाशी देने वालों की कतार। न कहीं समझ, न कहीं व्यंजना , बस पोस्ट करने वाले का नाम देखो उसकी रील और फोटो देखो और लगा दो बधाई का अंबार। सच तो यह है कि शिल्प के इस स्पष्ट और अस्पष्ट के विभाजन बिंदु पर फर्क नहीं समझ आ रहा है क्योंकि रचना संसार अब अनुभव का, गहराई में उतरने का संसार नहीं रहा बल्कि सोशल मीडिया की पोस्ट बनकर रह गया है। पता नहीं क्यों इस सुंदर साहित्य सृजन संसार के सौंदर्य को बिना समझे लोग कवि-कवियत्री, लेखक -लेखिका, साहित्यकार, स्तंभकार का टैग चस्पा कर घूमते हैं और तालियां बटोरते हैं।
एक पैटर्न से बाहर निकल कर संवेदनशील शिल्प का संसार गढ़ना होगा अन्यथा यह सृजन संसार सिर्फ दिखावेबाजों का और जुमलेबाजों का, धमकते -दमकते चेहरों का ही संसार रह जाएगा। 'पहुंच' शब्द इस तरह के संसार पर बहुत फिट होती है, जिसकी जितनी ज्यादा दूर तक पहुंच उसके लिए उतना ही बड़ा प्रसिद्ध होने का दायरा बढ़ जाता है। यह लॉबिंग , यह नेट्वर्किंग , यह अप्रोच जैसे शब्दों ने साहित्य का बेड़ा गर्क कर दिया है। महादेवी वर्मा की यह स्त्री मुक्ति के लिए लिखी गई कविता की पंक्तियां बड़ी तेजी से याद आ रही हैं-
' तू न अपनी छांह को अपने लिए कारा बनाना
जाग तुझको दूर जाना,
पंथ में तुझको मिलेंगे तितलियों के पर रंगीले
जाग तुझको दूर जाना'
शोर के विरुद्ध बोलिए, छद्म कर्मकांड के विरुद्ध बोलिए, नालंदा जैसे हादसों के विरुद्ध बोलिए, संसार में चल रहे इस युद्ध और उससे उपजे क्रंदन के विरोध में बोलिए पर अपना बोलिए। चैट जीपीटी युक्त शब्द मशीनी होते हैं, स्वाभाविक नहीं होते हैं। पर दिक्कत यह है कि यह रचना संसार कोई बड़ी और औरेकल जैसी कंपनी नहीं जहां सुबह के 6:00 बजे कंपनी के 30,000 कर्मचारियों ,12000 भारतीयों समेत को मेल पहुंचे कि आपको नौकरी से हटा दिया गया है। कारण एआई हो सकता है, कारण उन कर्मचारियों का खुद को अपडेट न करना हो सकता है, कारण कुछ नया न सीखना हो सकता है। क्या इस हिंदी साहित्य के संसार में ऐसी कोई छंटनी संभव है?


