Deepak Prakash News:बीजेपी में विलय नहीं करने पर कटा दीपक प्रकाश का पत्ता? MLC रेस से बाहर हुए कुशवाहा के बेटे, मंत्री पद जाना लगभग तय

Deepak Prakash News: RLM प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश की मंत्री पद की कुर्सी खतरे में है। बिहार विधान परिषद (MLC) चुनाव के लिए NDA की 9 उम्मीदवारों की सूची से उनका नाम गायब है। संवैधानिक नियमों के अनुसार, 6 महीने के भीतर सदन का सदस्य न बनने पर उन्हें इस्तीफा देना पड़ सकता है।

Shivam Shrivastava
Published on: 6 Jun 2026 6:57 PM IST (Updated on: 6 Jun 2026 7:16 PM IST)
Deepak Prakash News:बीजेपी में विलय नहीं करने पर कटा दीपक प्रकाश का पत्ता? MLC रेस से बाहर हुए कुशवाहा के बेटे, मंत्री पद जाना लगभग तय
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Upendra Kushwaha son Deepak Prakash: राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश की मंत्री कुर्सी इस समय बड़े संकट में नजर आ रही है। बिहार विधान परिषद की खाली हो रही सीटों के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने अपने पत्ते खोल दिए हैं, लेकिन इन उम्मीदवारों की सूची से दीपक प्रकाश का नाम पूरी तरह गायब है। एनडीए ने जिन 9 प्रत्याशियों के नामों का ऐलान किया है, उनमें से चार-चार सीटें भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के खाते में गई हैं, जबकि बची हुई एक सीट पर चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) ने अपना उम्मीदवार उतारा है। दीपक प्रकाश फिलहाल बिहार विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, जिसके चलते उनकी मंत्री पद की सदस्यता पर तलवार लटक गई है।

पार्टी को BJP में विलय नहीं करने की मिली सजा

सूत्रों के मुताबिक, पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव में निर्विरोध चुनी जाने वाली सीट नहीं मिल सकती है। इसके पीछे उपेंद्र कुशवाहा और बीजेपी के बीच चल रही राजनीतिक खींचतान को वजह बताया जा रहा है। चर्चा है कि पार्टी में विलय को लेकर उपेंद्र कुशवाहा द्वारा स्पष्ट निर्णय न लेने से बीजेपी नाराज है। ऐसे में दीपक प्रकाश को अब 10वीं सीट के लिए चुनावी मुकाबले का सामना करना पड़ सकता है।

सूत्रों का दावा है कि उपेंद्र कुशवाहा को पहले राज्यसभा की निर्विरोध सीट देने से पहले उनकी पार्टी के बीजेपी में विलय का प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि, उन्होंने उस समय इस मुद्दे पर आगे चर्चा का हवाला देते हुए फैसला टाल दिया था। बताया जाता है कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में हुए कैबिनेट विस्तार के दौरान भी ऐसी ही स्थिति बनी थी।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उपेंद्र कुशवाहा की ओर से बार-बार विलय के मुद्दे को टाले जाने से बीजेपी नेतृत्व असंतुष्ट है। इसी वजह से दीपक प्रकाश का नाम उन उम्मीदवारों की सूची में शामिल नहीं किया गया, जिन्हें निर्विरोध एमएलसी चुने जाने की संभावना थी। हालांकि, इस संबंध में किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

दूसरी तरफ बेटे की राजनीतिक साख और मंत्री पद को सुरक्षित करने के लिए उपेंद्र कुशवाहा लगातार हाथ-पैर मार रहे हैं। वह इस मामले को लेकर एनडीए के शीर्ष नेतृत्व के साथ निरंतर संपर्क बनाए हुए हैं। शनिवार को मीडिया से बातचीत के दौरान राज्यसभा सांसद कुशवाहा ने उम्मीद का दामन थामे रखा और कहा कि अभी विधान परिषद चुनाव के नामांकन की प्रक्रिया समाप्त होने में दो दिन का समय बचा हुआ है, इसलिए तब तक इंतजार करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे गठबंधन के बड़े नेताओं से लगातार बातचीत के जरिए बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे हैं।

सीटों का गणित और नामांकन की समय सीमा

बिहार विधान परिषद की विधानसभा कोटे वाली 9 सीटों पर नियमित चुनाव हो रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के कारण खाली हुई एक सीट पर उपचुनाव कराया जा रहा है। विधानसभा के मौजूदा संख्याबल को देखा जाए तो इन कुल 10 सीटों में से 9 पर एनडीए की जीत पूरी तरह तय मानी जा रही है, जबकि महज एक सीट विपक्ष के पाले में जाती दिख रही है। इस चुनावी प्रक्रिया के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 8 जून तय की गई है, जिसके बाद 18 जून को वोट डाले जाएंगे। भाजपा, जदयू और लोजपा-आर द्वारा अपने-अपने उम्मीदवारों की घोषणा किए जाने के बाद से ही दीपक प्रकाश के भविष्य को लेकर राजनीतिक गलियारों में सस्पेंस गहरा गया है।

संवैधानिक मजबूरी और राजनीतिक समीकरणों का फेर

दीपक प्रकाश के सामने सबसे बड़ी चुनौती संवैधानिक नियमों की है। नियम के मुताबिक, बिना किसी सदन का सदस्य रहे कोई भी व्यक्ति केवल 6 महीने तक ही मंत्री पद पर बना रह सकता है। शपथ ग्रहण के बाद से तय समय सीमा के भीतर यदि वे विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं बनते हैं, तो उन्हें अपनी कुर्सी गंवानी पड़ेगी। उपेंद्र कुशवाहा को पूरी उम्मीद थी कि भाजपा अपने कोटे से एक सीट उनके बेटे के लिए छोड़ देगी, लेकिन भाजपा ने भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह समेत अपने चारों प्रत्याशियों के नाम फाइनल कर कुशवाहा की उम्मीदों को झटका दे दिया।

रालोमो के पास विधानसभा में महज चार विधायक हैं, जबकि एक सीट जीतने के लिए कम से कम 25 विधायकों के समर्थन की जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में भाजपा और जदयू के बिना वे अपने दम पर कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हैं। हालांकि एनडीए चाहे तो विपक्ष के प्रभाव वाली आखिरी सीट पर दीपक प्रकाश को उतार सकता है, लेकिन वहां महागठबंधन की जीत पक्की होने के कारण दीपक प्रकाश के जीतने की संभावना न के बराबर है।

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Shivam Shrivastava

शिवम उत्तर प्रदेश के एक युवा और उभरते पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 4 वर्षों का अनुभव प्राप्त है। वे राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और हाइपरलोकल खबरों की गहरी समझ रखते हैं और समसामयिक मुद्दों पर सटीक व प्रभावशाली रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उनकी विशेष रुचि डाटा-ड्रिवन पत्रकारिता और विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग में है, जिससे उनकी खबरें अधिक तथ्यात्मक और विश्वसनीय बनती हैं। वे जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग के साथ-साथ डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप को भी समझते हैं। लेखन और रिसर्च में उनकी मजबूत पकड़ उन्हें एक सक्षम और जिम्मेदार पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।

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