Delhi Gymkhana Club: दिल्ली जिमखाना क्लब का शाही संसार, जाने ये अनसुनी कहानी

Delhi Gymkhana Club Information: दिल्ली का जिमखाना क्लब उसी औपनिवेशिक परंपरा का सबसे चर्चित प्रतीक बन गया। शुरू में यह क्लब लगभग पूरी तरह अंग्रेज सैन्य अधिकारियों और उच्च ब्रिटिश वर्ग के लिए आरक्षित था।

Yogesh Mishra
Published on: 25 May 2026 9:16 PM IST (Updated on: 25 May 2026 9:23 PM IST)
Delhi Gymkhana Club Information
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Delhi Gymkhana Club Information: दिल्ली के दिल में एक ऐसी दुनिया बसती है जहाँ प्रवेश केवल पैसे से नहीं मिलता। वहाँ पहुंचने के लिए पीढ़ियाँ इंतज़ार करती हैं। जहाँ सदस्यता केवल सुविधा नहीं बल्कि सामाजिक हैसियत का प्रतीक मानी जाती है। जहाँ अंग्रेज चले गए, लेकिन उनकी बनाई सामाजिक दीवारें अब भी काफी हद तक जस की तस खड़ी दिखाई देती हैं। यह दुनिया है दिल्ली के मशहूर जिमखाना क्लब की। वही जिमखाना क्लब जो कभी ब्रिटिश अफसरों की शामों का ठिकाना हुआ करता था और आज भी सत्ता, नौकरशाही, सैन्य प्रतिष्ठान, उद्योगपतियों और पुराने अभिजात्य वर्ग के सबसे प्रभावशाली अड्डों में गिना जाता है।

दिल्ली के लुटियंस ज़ोन (Delhi Gymkhana Club Information Wikipedia) में सफदरजंग रोड पर फैला यह क्लब केवल खेल या मनोरंजन का केंद्र नहीं रहा। इसके भीतर राजनीति, इतिहास, प्रेम, सत्ता, विभाजन, नौकरशाही और औपनिवेशिक मानसिकता की कई परतें एक साथ दिखाई देती हैं। लगभग 27 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला यह क्लब आज भी उस दौर की याद दिलाता है जब अंग्रेज भारत में अपने लिए अलग सामाजिक संसार बनाया करते थे। अंग्रेजों ने भारत में केवल शासन नहीं किया था। उन्होंने जीवनशैली भी बनाई थी। सेना के लिए कैंटोनमेंट। अधिकारियों के लिए सिविल लाइंस। घूमने के लिए माल रोड। और मेलजोल के लिए क्लब। इन क्लबों में भारतीयों का प्रवेश लगभग निषिद्ध रहता था। यहाँ ब्रिटिश अधिकारी अपनी पत्नियों के साथ आते थे। शामें बिताते थे। शराब, टेनिस, बैडमिंटन, नृत्य और निजी बैठकों का संसार इन्हीं परिसरों के भीतर बसता था।


दिल्ली का जिमखाना क्लब उसी औपनिवेशिक परंपरा का सबसे चर्चित प्रतीक बन गया। शुरू में यह क्लब लगभग पूरी तरह अंग्रेज सैन्य अधिकारियों और उच्च ब्रिटिश वर्ग के लिए आरक्षित था। आजादी के बाद अंग्रेज चले गए, लेकिन क्लब संस्कृति नहीं गई। उसकी जगह भारतीय नौकरशाहों, सैन्य अधिकारियों, बड़े व्यापारियों और राजनीतिक प्रतिष्ठान ने ले ली। सदस्यता का स्वरूप बदला, लेकिन अभिजात्य चरित्र कायम रहा। आज भी इस क्लब की सदस्यता को लेकर जो प्रतीक्षा सूची बताई जाती है, वह कई दशक लंबी मानी जाती है। मज़ाक में कहा जाता है कि दादा आवेदन करें तो शायद पोते को सदस्यता मिल जाए।

जिमखाना क्लब केवल सत्ता और वैभव की कहानी नहीं है। यह प्रेम और निजी रिश्तों के इतिहास का भी गवाह रहा है। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन का परिवार भी किसी न किसी रूप में इस क्लब की कहानी से जुड़ता है। उनकी सास दीप कौर कभी दिल्ली जिमखाना क्लब में टेनिस खेलने आया करती थीं।


विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान के सरगोधा से दिल्ली आया था। उस समय उनकी उम्र लगभग सत्रह वर्ष थी। जिमखाना के टेनिस कोर्ट उस दौर में बेहद चर्चित माने जाते थे। कहा जाता था कि विंबलडन के बाद यदि किसी कोर्ट की सबसे अधिक चर्चा होती थी तो उनमें दिल्ली जिमखाना का नाम भी लिया जाता था।

इन्हीं टेनिस कोर्टों पर दीप कौर की मुलाकात दलजीत सिंह से हुई। दलजीत सिंह मशहूर लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह के भाई थे। उनके पिता सरदार सोभा सिंह ब्रिटिश दौर के सबसे बड़े बिल्डरों में गिने जाते थे। नई दिल्ली की अनेक औपनिवेशिक इमारतों और सरकारी ढाँचों के निर्माण में उनका बड़ा योगदान माना जाता है। दिल्ली के निर्माण के इतिहास में उनका नाम आज भी बेहद प्रभावशाली माना जाता है। दीप कौर और दलजीत सिंह का रिश्ता धीरे-धीरे प्रेम में बदला। परिवार राजी हुआ। दोनों की शादी हुई। कहा जाता है कि उस दौर की यह बेहद चर्चित शादियों में से एक थी। शादी के बाद वे उस भव्य सामाजिक संसार का हिस्सा बने जिसे नई दिल्ली का कुलीन वर्ग कहा जाता था।


लेकिन यह रिश्ता बहुत लंबा नहीं चल पाया। बाद में लंदन में दीप कौर की मुलाकात BBC के प्रसिद्ध पत्रकार सर चार्ल्स व्हीलर से हुई। दोनों करीब आए। दीप कौर ने दलजीत सिंह से अलग होकर चार्ल्स व्हीलर से विवाह कर लिया। इसी परिवार से आगे चलकर बोरिस जॉनसन का रिश्ता जुड़ा। दीप कौर की बेटी मरीना व्हीलर ने अपनी पुस्तक Homestead: My Mother, Partition and the Punjab में अपनी मां की जिंदगी, विभाजन और जिमखाना क्लब से जुड़ी यादों को विस्तार से दर्ज किया है। इस तरह दिल्ली का यह क्लब केवल राजनीतिक और औपनिवेशिक इतिहास का हिस्सा नहीं रहा बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक परिवारों से जुड़ी निजी कहानियों का भी मौन गवाह बन गया।

जिमखाना क्लब की चर्चा उसके वैभव जितनी ही उसके बंद सामाजिक ढाँचे को लेकर भी होती रही है। सदस्यता महँगी है। प्रक्रिया जटिल है। सामाजिक नेटवर्क अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। लंबे समय तक ऐसे क्लबों को सत्ता प्रतिष्ठान का विस्तार माना जाता रहा। यह वह जगहें थीं जहाँ नीतियाँ भले न बनती हों, लेकिन रिश्ते बनते थे। नौकरशाह, सैन्य अधिकारी, कारोबारी और राजनेता अनौपचारिक रूप से एक-दूसरे के संपर्क में आते थे। कई पुराने सदस्य यह मानते हैं कि दिल्ली की वास्तविक नेटवर्किंग संसद भवन से अधिक इन क्लबों और गोल्फ कोर्सों में होती थी।


दिल्ली का जिमखाना अकेला ऐसा क्लब नहीं था। अंग्रेजों के दौर में पूरे भारत में इसी तरह के कई क्लब बने। कोलकाता का Calcutta Club। कानपुर का Cawnpore Club। दिल्ली का Chelmsford Club। रोशनआरा क्लब। दिल्ली गोल्फ क्लब। इन सभी संस्थानों में वर्षों तक ड्रेस कोड और सामाजिक नियम बेहद कठोर रहे। कहीं सूट-बूट-टाई अनिवार्य था। कहीं भारतीय पोशाकों को लेकर प्रतिबंध थे। कुछ क्लबों में जींस तक स्वीकार नहीं थी। कुछ जगह महिलाओं और पुरुषों के प्रवेश के अलग नियम थे। इन क्लबों के भीतर अंग्रेजियत केवल वास्तुकला में नहीं बल्कि व्यवहार और मानसिकता में भी दिखाई देती थी।

दिल्ली गोल्फ क्लब की कहानी भी इसी अभिजात्य संस्कृति से जुड़ी हुई है। 1933 में बने इस क्लब को लंबे समय तक देश के सबसे प्रभावशाली और महंगे क्लबों में गिना जाता रहा। इसके आसपास मुगल और लोदी काल की ऐतिहासिक संरचनाएँ हैं। विशाल हरियाली है। वर्षों तक इसकी सदस्यता को सामाजिक प्रतिष्ठा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता रहा। वहीं दूसरी तरफ इंडिया इंटरनेशनल सेंटर यानी IIC ने अपेक्षाकृत अलग छवि बनाई। 1962 में स्थापित यह केंद्र संस्कृति, कला, बौद्धिक विमर्श और सार्वजनिक चर्चाओं का मंच माना गया। हालांकि समय के साथ यहाँ भी राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव बढ़ता गया।


लेकिन इन तमाम क्लबों को लेकर सबसे बड़ी आलोचना हमेशा यही रही कि ये संस्थान आम जनता से कटे हुए हैं। जमीन सरकारी। लोकेशन प्राइम। सुविधाएँ उत्कृष्ट। लेकिन पहुँच सीमित। आलोचकों का तर्क रहा है कि इन क्लबों को मिली सुविधाएँ अप्रत्यक्ष रूप से जनता के संसाधनों से आती हैं, इसलिए इनकी गतिविधियाँ अधिक पारदर्शी होनी चाहिए। शराब और खानपान पर मिलने वाली रियायतें भी अक्सर विवाद का विषय बनती रही हैं।

हाल के वर्षों में दिल्ली जिमखाना क्लब अचानक बड़े विवाद के केंद्र में आ गया। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक हित का हवाला देते हुए क्लब की जमीन को लेकर कार्रवाई शुरू की। क्लब को नोटिस जारी किए गए। वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक गड़बड़ियों की चर्चाएँ भी सामने आईं। इसके बाद क्लब के भीतर बेचैनी फैल गई। कई पुराने सदस्य इसे ऐतिहासिक धरोहर बताते हुए बचाने की कोशिश में जुट गए। कानूनी लड़ाई की चर्चाएँ शुरू हुईं। दूसरी तरफ आलोचकों ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसे बंद अभिजात्य ढाँचे आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में कितने प्रासंगिक हैं।

दिल्ली जिमखाना क्लब की कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यह केवल एक क्लब की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहाँ औपनिवेशिक ढाँचे खत्म तो हुए, लेकिन उनकी सामाजिक परछाइयाँ लंबे समय तक बनी रहीं। यह सत्ता और समाज के उस रिश्ते की कहानी भी है जहाँ दरवाजे सबके लिए बराबर नहीं खुलते। बाहर लोकतंत्र चलता है। भीतर सदस्यता। बाहर आम नागरिक लाइन में खड़ा रहता है। भीतर पीढ़ियों से चल रहे नेटवर्क काम करते हैं।

और शायद यही कारण है कि जिमखाना क्लब आज भी केवल एक भवन नहीं बल्कि भारतीय सत्ता-संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। एक ऐसा प्रतीक जहाँ इतिहास, अभिजात्यवाद, प्रेम, राजनीति, नौकरशाही और औपनिवेशिक विरासत अब भी एक ही छत के नीचे दिखाई देते हैं।

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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