Special Marriage Act पर दिल्ली HC की बड़ी टिप्पणी, अब 1 साल से पहले तलाक मंजूर, जानें मामला

Delhi HC Verdict on Special Marriage Act: अदालत ने कहा है कि कुछ ख़ास परिस्थितियों में तलाक के लिए निर्धारित एक साल की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि (कूलिंग ऑफ पीरियड) सिर्फ पीड़ा बढ़ाने का कारण बन सकती है।

Priya Singh Bisen
Published on: 5 Jun 2026 3:06 PM IST
Delhi HC Verdict on Special Marriage Act
X

Delhi HC Verdict on Special Marriage Act

Delhi HC Verdict on Special Marriage Act: Special Marriage Act के अंतर्गत शादी करने वाले दंपतियों के लिए दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि कुछ ख़ास परिस्थितियों में तलाक के लिए निर्धारित एक साल की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि (कूलिंग ऑफ पीरियड) सिर्फ पीड़ा बढ़ाने का कारण बन सकती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एक दंपति को शादी के एक साल पूरा होने से पहले ही आपसी सहमति से तलाक की याचिका दायर करने की अनुमति दे दी।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की खंडपीठ ने इस मामले को “असाधारण कठिनाई” की श्रेणी में रखते हुए साकेत फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक साल की प्रतीक्षा अवधि में छूट देने से इनकार किया गया था। अदालत ने यह साफ़ कहा कि ऐसे विवाह को जबरन बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है, जो शुरुआत से ही असफल हो चुका हो।

क्या है ये मामला?

मामला शाहबाज खान और उनकी पत्नी से जुड़ा है, जिन्होंने 25 अगस्त 2025 को स्पेशल मैरिज एक्ट के अंतर्गत विवाह किया था। दोनों अलग-अलग धर्मों से संबंध रखते हैं। हाईकोर्ट में पेश किये गए तथ्यों के मुताबिक, विवाह के बाद दोनों परिवारों ने इस रिश्ते का विरोध किया।

शाहबाज खान ने अदालत को बताया कि शादी की सूचना मिलने के बाद उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और परिवार के कई सदस्यों ने उनसे संबंध तोड़ लिए। दूसरी तरफ, पत्नी ने भी अदालत को बताया कि उसे अपने परिवार से इसी तरह की नकारात्मक प्रतिक्रिया का डर था, जिसके कारण उसने विवाह की जानकारी अपने परिवार को नहीं दी।

दंपति ने अदालत को यह भी बताया कि विवाह के बाद वे कभी साथ नहीं रहे। न तो उन्होंने वैवाहिक जीवन शुरू किया और न ही उनके बीच दांपत्य संबंध स्थापित हुए। दोनों पक्षों ने सहमति जताई कि इस रिश्ते को सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति कभी नहीं मिली।

Delhi HC ने क्या कहा?

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि Special Marriage Act में निर्धारित प्रतीक्षा अवधि का मकसद उन विवाहों को बचाने का मौका देना है, जिनके सफल होने की वास्तविक संभावना हो। लेकिन अगर विवाह सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया हो और दोनों पक्ष उसे समाप्त करना चाहते हों, तो ऐसी स्थिति में प्रतीक्षा अवधि लागू करने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं रह जाता।

खंडपीठ ने कहा कि पति को परिवार से अलग-थलग कर दिए जाने की स्थिति, पिता की गंभीर बीमारी और पत्नी को अपने परिवार से विरोध का भय जैसी परिस्थितियां कानून की दृष्टि में "असाधारण कठिनाई" मानी जा सकती हैं। ऐसे मामलों में न्यायालय को मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

फैमिली कोर्ट की व्याख्या पर खड़े किये सवाल

हाईकोर्ट ने कहा कि साकेत फैमिली कोर्ट ने मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को अनदेखा करते हुए कानून की अत्यधिक तकनीकी और संकीर्ण व्याख्या की थी। अदालत ने माना कि कानून का उद्देश्य लोगों की समस्याओं का समाधान करना है, न कि उन्हें अनावश्यक रूप से लंबा खींचना।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 29 के अंतर्गत एक साल की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि में छूट प्रदान की और मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेजते हुए जल्द सुनवाई और निस्तारण के आदेश दिए।

पहले क्या था प्रावधान?

आपको बता दे, स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की धारा 27 और धारा 29 के अंतर्गत सामान्य नियम यह है कि विवाह के एक साल पूरा होने से पहले तलाक की याचिका दायर नहीं की जा सकती।

हालांकि, कानून में एक अपवाद भी मौजूद है। अगर किसी पक्ष को "असाधारण कठिनाई" का सामना करना पड़ रहा हो या दूसरे पक्ष का व्यवहार "असाधारण रूप से अनुचित" हो, तो अदालत एक वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले भी तलाक की याचिका दाखिल करने की अनुमति दे सकती है।

इसके अलावा, आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) के मामलों में भी दंपति को कुछ निर्धारित वक़्त तक अलग रहने और फिर अदालत द्वारा तय की गई प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। इसका मकसद पति-पत्नी को रिश्ते पर फिर से विचार करने और सुलह का अवसर देना होता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में दी गई एक वर्ष की प्रतीक्षा अवधि का उद्देश्य उन विवाहों को बचाना है, जिनके टिके रहने की संभावना हो। लेकिन अगर विवाह सिर्फ कागजों पर रह गया हो, पति-पत्नी कभी साथ न रहे हों और दोनों ही विवाह समाप्त करने पर सहमत हों, तो ऐसी स्थिति में प्रतीक्षा अवधि लागू करने से कोई फायदा नहीं होता।

अदालत ने माना कि इस मामले में पारिवारिक विरोध, सामाजिक अस्वीकृति, पति के पिता की गंभीर बीमारी और दंपति का कभी साथ न रहना "असाधारण कठिनाई" की श्रेणी में आता है। इसलिए एक साल की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि में छूट दी जा सकती है।

इस फैसले का प्रभाव

यह फैसला स्पष्ट करता है कि हालांकि कानून में एक साल की प्रतीक्षा अवधि का प्रावधान है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में अदालतें मानवीय आधार पर राहत दे सकती हैं। इससे उन दंपतियों को मदद मिल सकती है जिनका विवाह शुरुआत से ही पूरी तरह विफल हो चुका हो और जिनके साथ रहने की कोई संभावना न बची हो।

Priya Singh Bisen
ABOUT THE AUTHOR

Priya Singh Bisen

Priya Singh Bisen is a Content Writer at Newstrack.com.

Next Story