Gulmarg Gondola Mishap: कब तक रेस्क्यू के भरोसे रहेगी पर्यटकों की सुरक्षा?

Gulmarg Gondola Mishap: हवा में फंसे 300 पर्यटक; देवघर और टिम्बर ट्रेल जैसे पुराने हादसों के बाद भी प्रशासन ने नहीं लिया सबक। अब सख्त सुरक्षा ऑडिट जरूरी।

Ramkrishna Vajpei
Published on: 25 May 2026 6:45 PM IST
Gulmarg Gondola Mishap
X

Gulmarg Gondola Mishap (Social Media).jpg

Gulmarg Gondola Mishap: गुलमर्ग में सोमवार को हुई घटना ने एक बार फिर देश के सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक, जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा दावों की पोल खोल दी है। प्रसिद्ध गुलमर्ग गोंडोला रोपवे में आई तकनीकी खराबी के कारण करीब 300 पर्यटक घंटों हवा में जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे। हालांकि, सेना, पुलिस, SDRF और स्थानीय प्रशासन के संयुक्त रेस्क्यू ऑपरेशन ने मुस्तैदी दिखाते हुए सभी को सुरक्षित निकाल लिया, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया। लेकिन राहत की इस खबर के पीछे एक कड़वा और डरावना सच छिपा है—आखिर कब तक हमारे देश में पर्यटक प्रशासनिक लापरवाही और तकनीकी कमियों का शिकार होते रहेंगे? क्या एक सफल रेस्क्यू ऑपरेशन को सुरक्षा की गारंटी मानकर हर बार असली समस्या पर पर्दा डाल दिया जाएगा?

सबक सीखने में हर बार नाकाम रहा प्रशासन

गुलमर्ग की यह घटना कोई पहली या अनपेक्षित घटना नहीं है। अगर हम अतीत के पन्नों को पलटें, तो रोपवे हादसों का एक ऐसा खौफनाक इतिहास सामने आता है, जिसे देखकर भी प्रशासन अपनी नींद से जागने को तैयार नहीं है:

गुलमर्ग (2023 और 2017): इसी गुलमर्ग गोंडोला में साल 2023 में भी तकनीकी खराबी के चलते करीब 250 पर्यटक हवा में फंस गए थे। वहीं, 2017 में हुआ हादसा बेहद दर्दनाक था, जब एक पेड़ गिरने से रोपवे की केबल टूट गई थी और एक ही परिवार के 4 सदस्यों सहित 7 लोगों की मौत हो गई थी।

त्रिकुट पहाड़ हादसा, देवघर (2022): झारखंड के देवघर में हुआ यह हादसा देश के सबसे खौफनाक रोपवे हादसों में गिना जाता है। ट्रॉलियां आपस में टकराने के कारण 45 से अधिक लोग करीब 40 घंटे तक हवा में फंसे रहे। इस दौरान भारतीय वायुसेना के रेस्क्यू ऑपरेशन के बावजूद 3 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

टिम्बर ट्रेल, परवाणू (2022 और 1992): हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित टिम्बर ट्रेल रोपवे में जून 2022 को तकनीकी खराबी के कारण 11 पर्यटक हवा में फंस गए थे। इससे पहले 1992 में इसी जगह हुए एक बड़े हादसे में केबल टूटने से कई लोग फंस गए थे और एक ऑपरेटर की मौत हो गई थी।

रेस्क्यू की सफलता नहीं, 'निवारक सुरक्षा' है असली समाधान

पर्यटन विशेषज्ञों का साफ मानना है कि रोपवे जैसी उच्च जोखिम वाली प्रणालियों में केवल हादसे के बाद की तैयारी (Reactive Approach) काफी नहीं है। असली जरूरत निवारक सुरक्षा तंत्र (Preventive Security System) की है।

"जब गर्मी या सर्दियों के पीक सीजन में हजारों पर्यटक रोजाना इन सेवाओं का लाभ उठाते हैं, तो मशीनों पर दबाव दोगुना हो जाता है। ऐसे में बिना किसी स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट, इंटरनेशनल सेफ्टी सर्टिफिकेशन और रियल-टाइम सेंसर मॉनिटरिंग के इन रोपवे को चलाना पर्यटकों की जान से खिलवाड़ करने जैसा है।"

बड़ा सवाल: राजस्व या पर्यटकों की जान?

इस ताजा हादसे ने एक बार फिर देश के नीति-निर्माताओं और पर्यटन विभागों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पर्यटन से राजस्व (Revenue) कमाना बेशक जरूरी है, लेकिन क्या यह मासूम पर्यटकों की जिंदगी से बढ़कर है?

गुलमर्ग की हवा में फंसे उन 300 पर्यटकों के खौफ को सिर्फ एक सफल रेस्क्यू की कहानी बताकर भुलाया नहीं जा सकता। अब समय आ गया है कि देश के सभी प्रमुख रोपवे प्रोजेक्ट्स का एक कड़ा और स्वतंत्र सेफ्टी ऑडिट किया जाए, ताकि भविष्य में किसी भी सैलानी को अपनी छुट्टियों का लुत्फ उठाने की कीमत जान देकर न चुकानी पड़े।

Ramkrishna Vajpei
ABOUT THE AUTHOR

Ramkrishna Vajpei

Ram Krishna Vajpei is a veteran cross-media journalist, political analyst, and data journalism expert whose distinguished career began in 1982. Spanning over four decades across print, broadcast (TV/Radio), and digital platforms, he specializes in rigorous research and deep analytical reporting on socio-political affairs. An authority on modern data journalism and the technical application of AI/LLMs in media, Vajpei also trains next-generation journalists and is currently pursuing a PhD in media studies. His work is defined by an absolute commitment to objectivity and a comprehensive editorial vision.

Next Story