पार्किंग का 'दंगल': जब घर की दहलीज बन जाए जंग का मैदान

India’s Parking Crisis: सड़कों पर बढ़ती हिंसा और सिस्टम की विफलता का विश्लेषण। जानें कैसे बेहतर शहरी नियोजन और सख्त कानूनों से सुधर सकते हैं हालात।

Arvind Singh Bisht
Published on: 21 April 2026 1:00 PM IST (Updated on: 21 April 2026 1:20 PM IST)
India’s Parking Crisis
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भारत के महानगरों में आज गाड़ी खरीदना जितना आसान है, उसे पार्क करना उतना ही चुनौतीपूर्ण। यह सिर्फ गुस्से या बर्ताव की समस्या नहीं है, बल्कि शहरी प्रशासन (Urban Governance) की विफलता का नतीजा है।

1. संकट की जड़ें: क्यों उबल रहे हैं शहर?

असंतुलित विकास: गाड़ियों की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बुनियादी ढांचा स्थिर है।

अतिक्रमण का बोलबाला: सार्वजनिक सड़कों को लोग अपने घर का निजी हिस्सा समझने लगे हैं। जब कानून का डर खत्म होता है, तो विवादों का निपटारा कोर्ट में नहीं, बल्कि सड़क पर ताकत के जोर पर होता है।

नियोजन की कमी: अनियोजित कॉलोनियों में गलियां इतनी संकरी हैं कि वहां दो गाड़ियां एक साथ नहीं निकल सकतीं। ऐसे में 'पहले आओ-पहले कब्जा करो' की नीति हिंसा को जन्म दे रही है।

2. कानून की कमी नहीं, क्रियान्वयन का अकाल

भारत में कानूनों की कमी नहीं है, बस उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति गायब है:

मोटर वाहन अधिनियम, 1988: यह अधिकारियों को गलत पार्किंग पर कार्रवाई का अधिकार देता है।

नगर निगम अधिनियम (यूपी 1959, दिल्ली 1957): इनके पास अतिक्रमण हटाने की स्पष्ट शक्तियां हैं।

विफलता: हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने भवन निर्माण की अनुमति को 'पार्किंग प्रावधान' से जोड़ दिया है, लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में 'अपार्टमेंट एक्ट' जैसे जरूरी कानून दशकों से लंबित या कमजोर रहे हैं।

समाधान: कैसे थमेगा यह खूनी संघर्ष?

पार्किंग विवादों को रोकने के लिए केवल पुलिस बुलाना काफी नहीं है, इसके लिए सिस्टम में सर्जरी की जरूरत है:

सख्त नियम और प्लानिंग

नो पार्किंग, नो बिल्डिंग: किसी भी इमारत को तब तक मंजूरी न मिले जब तक उसमें पर्याप्त पार्किंग सुनिश्चित न हो। कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC) देने से पहले इसकी भौतिक जांच अनिवार्य हो।

सड़कों की चौड़ाई: नई कॉलोनियों में सड़कों की न्यूनतम चौड़ाई कम से कम 27 फीट होनी चाहिए, ताकि यातायात और पार्किंग दोनों के लिए जगह रहे।

संस्थानों पर रोक: स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों को उन तंग कॉलोनियों में अनुमति नहीं मिलनी चाहिए जहाँ कम से कम दो-लेन की सड़क न हो।

तकनीकी और इंफ्रास्ट्रक्चर का मेल

मल्टी-लेवल पार्किंग: घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पुराने ढांचे को तोड़कर आधुनिक वर्टिकल पार्किंग बनाई जानी चाहिए।

परमिट सिस्टम: रिहायशी इलाकों में 'पार्किंग परमिट' लागू किए जाएं, ताकि सड़कों पर गाड़ियों की संख्या नियंत्रित की जा सके।

प्रौद्योगिकी का उपयोग: ऐप आधारित पार्किंग स्लॉट बुकिंग और सेंसर-आधारित मॉनिटरिंग से पारदर्शिता बढ़ेगी।

नोएडा की घटना महज एक 'हादसा' नहीं बल्कि एक चेतावनी है। जब पार्किंग जैसी बुनियादी जरूरत के लिए जान जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि हमारे शहर रहने लायक नहीं बचे हैं। समाधान 'रिएक्टिव पुलिसिंग' में नहीं, बल्कि 'प्रोएक्टिव प्लानिंग' में है।

"भारत के पास कानूनों का भंडार है, लेकिन अनुशासन की कमी है। जब तक नियमों को सख्ती से लागू नहीं किया जाता, सड़कों पर यह खूनी खेल जारी रहेगा।"

लेखक- वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व सूचना आयुक्त, उत्तर प्रदेश हैं।

Arvind Singh Bisht
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