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Education Crisis India: करोड़ों खर्च के बाद भी क्यों नहीं सुधरी शिक्षा?
NITI Aayog Education Report 2026: नीति आयोग की 2026 रिपोर्ट के अनुसार भारत में स्कूली शिक्षा की ज़मीनी हकीकत अब भी चिंताजनक है...
NITI Aayog Education Report 2026
NITI Aayog Education Report 2026: तकरीबन पच्चीस-छब्बीस साल पहले शुरू हुए सर्व शिक्षा अभियान से लेकर 2009 में लागू हुए 'शिक्षा के अधिकार' कानून तक देश ने प्राथमिक शिक्षा को सबके दरवाज़े तक पहुँचाने की दिशा में बड़े कदम उठाए। लेकिन इन तमाम कोशिशों के बाद भी ज़मीनी तस्वीर निराश करती है। मई 2026 में नीति आयोग ने 'School Education System in India: Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement' शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जो इस कड़वी सच्चाई को आँकड़ों के साथ सामने रखती है।
रिपोर्ट का सार एक ही वाक्य में कहा जा सकता है कि बच्चे स्कूल तक पहुँच रहे हैं, लेकिन सीखना अभी भी पीछे छूट रहा है।
बुनियाद ही कमज़ोर है
रिपोर्ट जो तस्वीर खींचती है, वह चिंताजनक है। देश में एक लाख से अधिक स्कूलों में बिजली नहीं है। करीब 98,000 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं है। हज़ारों स्कूलों में पानी, प्रयोगशाला और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। एक लाख स्कूल तो ऐसे हैं जहाँ सिर्फ एक ही शिक्षक तैनात है।
इससे भी बड़ी बात यह है कि देश के केवल 5.4 फीसदी स्कूल ही कक्षा 1 से 12 तक एकीकृत हैं। यानी पूरा सिस्टम बुरी तरह बिखरा हुआ है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। मिडिल और सेकेंडरी स्तर पर बड़ी संख्या में छात्र स्कूल छोड़ देते हैं।
करोड़ों का बजट, फिर भी परिणाम नदारद
देश में 10 लाख 13 हजार से अधिक सरकारी स्कूल हैं और 24 करोड़ से ज़्यादा बच्चे इस पूरे सिस्टम से जुड़े हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार ने शिक्षा के लिए 1.28 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा, जिसमें से 78,572 करोड़ रुपये अकेले स्कूली शिक्षा के लिए थे। राज्य सरकारों का खर्च जोड़ें तो यह आँकड़ा पाँच से सात लाख करोड़ रुपये सालाना तक पहुँच जाता है। कुल मिलाकर भारत अपनी जीडीपी का 2.5 से 2.7 फीसदी शिक्षा पर खर्च करता है।
इतने बड़े निवेश के बावजूद नतीजे निराशाजनक हैं। कारण स्पष्ट है, शिक्षक तेज़ी से भर्ती हुए, लेकिन उनका प्रशिक्षण कमज़ोर रहा। निगरानी तंत्र भी प्रभावी नहीं रहा। और सबसे बड़ी चूक यह रही कि पूरी व्यवस्था 'गुणवत्ता मॉडल' नहीं बल्कि 'पहुँच मॉडल' बनकर रह गई। नतीजतन, सरकारी स्कूलों में नामांकन गिरकर 49 फीसदी पर आ गया और लोग स्कूल की बजाय कोचिंग को तरजीह देने लगे।
'असर' की रिपोर्ट: सीखने का गहरा संकट
नीति आयोग की रिपोर्ट से भी ज़्यादा चौंकाने वाले आँकड़े 'असर 2026' सामने रखता है। यह कोई सरकारी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एनजीओ 'प्रथम' द्वारा कराया गया देश का सबसे बड़ा और विश्वसनीय लर्निंग सर्वे है, जो शिक्षा की ज़मीनी हकीकत बताता है।
इसके मुताबिक कक्षा 3 के केवल 23.4 फीसदी बच्चे ही कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पाते हैं। 14 से 18 साल की उम्र के किशोरों में, जिनमें से 95 फीसदी स्कूल जाते हैं, एक चौथाई अभी भी बुनियादी पढ़ाई में कमज़ोर हैं। महामारी के बाद कुछ सुधार ज़रूर आया है, लेकिन वह नाकाफी है। एक और तथ्य उल्लेखनीय है, इन्हीं आँकड़ों में निजी स्कूल सरकारी स्कूलों से काफी आगे नज़र आते हैं।
रटंत से आगे: 'पीसा' की राह
इन तमाम सबकों से सीखते हुए सरकार ने अब अपना ध्यान बदलने की शुरुआत की है। सबसे बड़ा बदलाव है रटंत शिक्षा से बाहर निकलकर 'पीसा' आधारित मूल्यांकन प्रणाली की ओर बढ़ना। पीसा यानी प्रोग्राम फ़ॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट एसेसमेंट। यह ओईसीडी द्वारा आयोजित दुनिया की सबसे चर्चित परीक्षा है, जिसमें आमतौर पर 15 वर्ष के विद्यार्थियों की वास्तविक समझ परखी जाती है। यह परीक्षा यह नहीं देखती कि बच्चे ने किताब में क्या रटा है, बल्कि यह जाँचती है कि वह सीखी हुई बातों को असल ज़िंदगी में कितना लागू कर सकता है। गणित में सूत्र याद होना काफी नहीं, बच्चा रोज़मर्रा की समस्याओं में उसका उपयोग कर पाता है या नहीं, यह देखा जाता है। भाषा में पाठ रटना नहीं, बल्कि पढ़कर अर्थ निकालने की क्षमता मायने रखती है।
नई शिक्षा नीति के बाद से यह चर्चा लगातार तेज़ हुई है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था को भी धीरे-धीरे ऐसी कौशल एवं क्षमता आधारित दिशा में ले जाया जाए। इसके साथ ही स्कूल रैंकिंग सिस्टम को लागू करने की दिशा में भी तेज़ी से काम हो रहा है।
समस्या स्कूलों की संख्या की नहीं है। समस्या यह है कि उन स्कूलों में पढ़ाया कितना जा रहा है और बच्चे सीख कितना रहे हैं। जब तक इस बुनियादी सवाल का जवाब नहीं बदलता, तब तक अभियान चाहे जितने चलें, रिपोर्टें चाहे जितनी आएँ असली बदलाव दूर ही रहेगा।


