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Rajesh Exports SEBI Case 2026: 15 लाख करोड़ का खेल! दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनरी के मालिक पर SEBI का शिकंजा
Rajesh Exports SEBI Case 2026: SEBI ने राजेश एक्सपोर्ट्स पर 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित फर्जी राजस्व, संदिग्ध लेनदेन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस उल्लंघनों के आरोप लगाए हैं।
Rajesh Exports SEBI Case 2026
Rajesh Exports SEBI Case 2026: भारतीय शेयर बाजार में एक ऐसा खुलासा हुआ है जिसने निवेशकों, नियामकों और कॉर्पोरेट जगत को हैरान कर दिया है। दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनरियों में गिनी जाने वाली कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स पर सेबी ने 15.15 लाख करोड़ रुपये के कथित फर्जी राजस्व, संदिग्ध लेनदेन और गंभीर कॉर्पोरेट गवर्नेंस उल्लंघनों के आरोप लगाए हैं। सेबी की ताजा जांच ने भारतीय कॉर्पोरेट जगत को झकझोर कर रख दिया है। जांच में दावा किया गया है कि कंपनी ने पिछले पांच वर्षों में करीब 15.15 लाख करोड़ रुपये का राजस्व गलत तरीके से दिखाया। इस खुलासे के बाद निवेशकों में हड़कंप मच गया है और कंपनी के शेयर पहले ही अपने उच्चतम स्तर से 90 प्रतिशत से अधिक टूट चुके हैं।
कौन हैं राजेश एक्सपोर्ट्स और क्यों है यह मामला इतना बड़ा?
बेंगलुरु स्थित राजेश एक्सपोर्ट्स भारत की सबसे बड़ी गोल्ड कंपनियों में गिनी जाती है। कंपनी की पहचान सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी स्विस सहायक कंपनी वाल्काम्बी एसए (Valcambi SA) को दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनरियों में शामिल किया जाता है। यही वजह है कि सेबी की कार्रवाई ने केवल भारतीय बाजार ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर निवेशकों को भी चौंका दिया है।
3 जून 2026 को जारी 109 पन्नों के अंतरिम आदेश में सेबी ने कंपनी के खातों, लेनदेन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व पर उठे सवाल
सेबी की जांच के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच कंपनी ने कुल 15.45 लाख करोड़ रुपये का समेकित राजस्व दिखाया। लेकिन नियामक का आरोप है कि इसमें से लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये का राजस्व वास्तविक नहीं था या उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। यानी कंपनी द्वारा घोषित कुल राजस्व का करीब 99.8 प्रतिशत हिस्सा संदेह के घेरे में है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि इसे भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े संभावित वित्तीय हेरफेर मामलों में गिना जा रहा है।
स्विट्जरलैंड की सहायक कंपनी से जुड़ा पूरा खेल
जांच में सबसे बड़ा अंतर स्विट्जरलैंड स्थित सहायक कंपनी वाल्काम्बी एसए और उसकी होल्डिंग कंपनी ग्लोबल गोल्ड रिफाइनरीज एजी (GGR) के खातों में पाया गया। जहां वाल्काम्बी एसए के ऑडिटेड खातों में साल 2023 का राजस्व केवल लगभग 543 करोड़ रुपये था, वहीं उसी कारोबार को होल्डिंग स्तर पर करीब 2.93 लाख करोड़ रुपये के रूप में दिखाया गया। सेबी का कहना है कि यह अंतर सामान्य लेखांकन प्रक्रिया से कहीं अधिक है और इसकी विस्तृत जांच की जरूरत है।
फॉरेंसिक ऑडिट में नहीं मिला सहयोग
सेबी द्वारा नियुक्त फॉरेंसिक ऑडिटर बीडीओ इंडिया को जांच के दौरान कई अहम दस्तावेज नहीं दिए गए। रिपोर्ट के अनुसार कंपनी ने अपने ERP सिस्टम, लेखा रिकॉर्ड, जर्नल डंप और विदेशी इकाइयों से जुड़े कई मूल दस्तावेज उपलब्ध कराने से इनकार किया।
कंपनी ने स्विस डेटा गोपनीयता कानूनों का हवाला दिया, लेकिन सेबी ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और इसे जांच में बाधा डालने वाला व्यवहार माना।
प्रमोटर के निजी सौदों को कंपनी का कारोबार दिखाने का आरोप
जांच में यह भी सामने आया कि लगभग 11,487 करोड़ रुपये की खरीद और बिक्री ऐसे लेनदेन के रूप में दर्ज की गई, जो वास्तव में कंपनी का व्यापार नहीं थे।
सेबी का आरोप है कि ये सौदे प्रमोटर राजेश मेहता के व्यक्तिगत गोल्ड डेरिवेटिव ट्रेडिंग से जुड़े थे। इन्हें कंपनी के कारोबार का हिस्सा दिखाया गया और इसके लिए कंपनी के फंड का इस्तेमाल किया गया। जिसमें सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह मानी जा रही है कि इन लेनदेन को लेकर बोर्ड या ऑडिट कमेटी की मंजूरी भी नहीं ली गई थी।
कंपनी के पैसों से प्रमोटरों को ट्रांसफर हुए करोड़ों रुपये
सेबी ने अपने आदेश में बताया कि जांच अवधि के दौरान कंपनी से प्रमोटर राजेश मेहता के निजी खाते में 338.90 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए। इसके अलावा उनके बेटे सिद्धार्थ मेहता के खाते और क्रेडिट कार्ड में भी 21 करोड़ रुपये से अधिक भेजे गए, जबकि उनका कंपनी में कोई आधिकारिक पद नहीं था।
साथ ही प्रमोटर समूह की दूसरी कंपनी एलिस्ट प्राइवेट लिमिटेड को भी 565 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम ट्रांसफर की गई, जिसके पीछे उचित व्यावसायिक कारण नहीं मिले।
निवेशकों को हुआ भारी नुकसान
इस विवाद का सबसे बड़ा असर छोटे निवेशकों पर पड़ा है। फरवरी 2023 में राजेश एक्सपोर्ट्स का शेयर 1,028 रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर था और कंपनी का मार्केट कैप 30,000 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया था। लेकिन वित्तीय खुलासों में देरी, कैश फ्लो रिपोर्ट जमा न होने और बढ़ती चिंताओं के बीच शेयर लगातार टूटता गया। अप्रैल 2026 तक इसका भाव करीब 80 रुपये रह गया और मार्केट कैप घटकर लगभग 2,365 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। विश्लेषकों का अनुमान है कि इस गिरावट से सार्वजनिक निवेशकों की करीब 12,700 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति नष्ट हो चुकी है।
सेबी का बड़ा एक्शन, आगे क्या होगा?
सेबी ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए प्रमोटर राजेश मेहता को शेयर बाजार में किसी भी तरह की खरीद-बिक्री और लेनदेन से तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया है। साथ ही कंपनी और प्रमोटर को 30 दिनों के भीतर विस्तृत जवाब और आवश्यक दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए एक नए फॉरेंसिक ऑडिटर की नियुक्ति की जा रही है। इसके अलावा कंपनी के वैधानिक ऑडिटरों की भूमिका की भी जांच होगी और मामले की जानकारी नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी (NFRA) को भेजी गई है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सेबी के आरोप अंतिम जांच में सही साबित होते हैं तो यह भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास के सबसे बड़े कॉर्पोरेट गवर्नेंस और अकाउंटिंग विवादों में शामिल होगा। यह मामला केवल एक कंपनी का नहीं, बल्कि निवेशकों के भरोसे, ऑडिट सिस्टम की विश्वसनीयता और कॉर्पोरेट पारदर्शिता की भी बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।


