Rising Sea Level in India: समंदर का बढ़ता जलस्तर और हमारे डूबते मुंबई-चेन्नई जैसे शहरों की हकीकत

Rising Sea Level in India: ग्लोबल वार्मिंग और पिघलते ग्लेशियरों के कारण भारत के तटीय शहरों पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है। जानिए कैसे समुद्र का बढ़ता जलस्तर मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों की अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और पारंपरिक आजीविका को तबाह कर रहा है।

Shivam Shrivastava
Published on: 5 Jun 2026 5:21 PM IST
Rising Sea Level in India:   समंदर का बढ़ता जलस्तर और हमारे डूबते मुंबई-चेन्नई जैसे शहरों की हकीकत
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Rising Sea Level in India: बढ़ते वैश्विक तापमान और पिघलते ग्लेशियरों के कारण समुद्र की लहरें अब सिर्फ तटों को छूकर वापस नहीं लौट रहीं, बल्कि वे हमारे भविष्य की बुनियादी नींव को खोखला कर रही हैं। जिसे कभी आने वाले दशकों का एक धीमा और दूर का खतरा माना जाता था, वह अब भारतीय तटीय शहरों के दरवाजों पर दस्तक दे चुका है। वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, इस सदी के अंत तक यानी साल 2100 तक वैश्विक औसत समुद्र स्तर में 1 मीटर से अधिक की भारी वृद्धि हो सकती है। यह केवल एक भौगोलिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जहां चक्रवातों और मूसलाधार बारिश के साथ बढ़ता जलस्तर तटीय बुनियादी ढांचे, मानव जीवन और करोड़ों लोगों की आजीविका को सीधे तौर पर निगल रहा है।

ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों का हिस्सा होने के कारण भारत के सामने यह चुनौती और भी विकट रूप में सामने आती है। विकसित देशों के विपरीत, हमारे तटीय शहरों के पास इस अदृश्य आपदा से लड़ने के लिए न तो पर्याप्त वित्तीय संसाधन हैं और न ही वैसी मजबूत प्रशासनिक क्षमता। यदि भारत को अपनी समुद्री अर्थव्यवस्था का वास्तविक और दीर्घकालिक लाभ उठाना है, तो हमें विकास के मौजूदा ढर्रे को पूरी तरह बदलना होगा और एक ऐसी नीति अपनानी होगी जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चले।

खतरे की कगार पर खड़े देश के आर्थिक पावरहाउस (Economic powerhouses on the brink of collapse)

भारत की 11,000 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक जीवन रेखा है। भारत का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार समुद्री मार्गों से होता है और देश की कुल जीडीपी में अकेले मत्स्य पालन का योगदान 1 प्रतिशत है। इस क्षेत्र से लगभग 40 लाख मछुआरों का जीवन सीधा जुड़ा है, जबकि करोड़ों अन्य लोग मछली प्रोसेसिंग, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और छोटे तटीय व्यवसायों के जरिए अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। इसके बावजूद, हमारे सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र आज प्रकृति के सीधे निशाने पर हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, शहरी बाढ़ के कारण भारत को हर साल लगभग 4 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हो रहा है, जिसके साल 2070 तक बढ़कर 14 से 30 अरब डॉलर होने की आशंका है। यह भारी नुकसान हमारे मौजूदा प्रशासनिक ढांचे की कमियों को उजागर करता है।

सदी के मध्य यानी 2050 तक भारत के कई प्रमुख शहरों पर जलमग्न होने का गंभीर संकट मंडरा रहा है। मुंबई का यह खतरा उसके निचले इलाकों, समुद्र को पाटकर बनाई गई जमीन और अनियंत्रित फैलाव की वजह से है। वहीं चेन्नई में यह समस्या प्राकृतिक रूप से पानी सोखने वाले दलदली मैदानों के अंधाधुंध विनाश से पैदा हुई है। कोलकाता शहर गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा के प्राकृतिक रूप से धंसने और समुद्र के बढ़ते स्तर के दोहरे दबाव से जूझ रहा है। इसके साथ ही कोच्चि में आए दिन आने वाले ज्वार-भाटा की बाढ़ और भूजल में खारे पानी के प्रवेश की गंभीर समस्या हो रही है, जबकि सूरत की भौगोलिक स्थिति ऐसी जगह है जहां नदी और समुद्र का पानी मिलता है, जिससे वहां अक्सर विनाशकारी बाढ़ आती है। बंदरगाहों, मछली पालन और तटीय बुनियादी ढांचे में बार-बार आने वाली इन रुकावटों से रोजगार, सप्लाई चेन और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है।


पारंपरिक आजीविका पर संकट और ब्लू इकॉनोमी की विषमता (Traditional livelihoods in crisis amid Blue Economy inequalities)

बढ़ते जलस्तर और जलवायु परिवर्तन का सबसे पहला और सीधा प्रहार तटीय समुदायों की आजीविका पर हुआ है। जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ने, बढ़ते प्रदूषण और समुद्र के बढ़ते तापमान ने तटों के पास मछलियों की संख्या को बहुत कम कर दिया है। इसके कारण छोटे मछुआरों के हाथ कम मछलियां लग रही हैं, उनके नावें और जाल खराब हो रहे हैं और उनका जीवन असुरक्षित हो गया है। दूसरी ओर, बंदरगाह और रियल एस्टेट जैसे बड़े उद्योगों ने तटीय संसाधनों और जमीन की कीमतें बहुत बढ़ा दी हैं। इससे समुद्री अर्थव्यवस्था का मुनाफा बराबर नहीं बंट रहा और गरीब तटीय आबादी को पर्यावरण व आर्थिक मंदी का सबसे बड़ा खतरा अकेले झेलना पड़ रहा है।

समुद्री अर्थव्यवस्था के इस फैलाव के बावजूद तटीय इलाकों में स्थानीय उद्यमशीलता का विकास नहीं हो पाया है। कागजी उलझनें और लाइसेंस के कड़े नियम स्थानीय लोगों को समुद्र से जुड़े उद्योगों में कदम रखने से रोकते हैं। इसके विपरीत, दुनिया भर का अनुभव दिखाता है कि अगर समुद्री बिजनेस को जमीनी स्तर पर बढ़ावा दिया जाए, तो इससे नए रोजगार पैदा हो सकते हैं, लोगों की आजीविका सुधर सकती है और इस क्षेत्र में नए प्रयोग हो सकते हैं। अगर ऐसा सहयोग नहीं मिला, तो भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था सिर्फ बड़े पूंजीपतियों के हाथ में सिमट कर रह जाएगी, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए बड़े मुनाफे वाले कामों में हिस्सा लेने के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।


अनियोजित शहरीकरण की भारी पर्यावरणीय और वित्तीय कीमत (Heavy environmental and financial cost of unplanned urbanization)

शहरी इलाकों के बेतरतीब कंक्रीट के फैलाव ने उन मैंग्रोव, दलदली जमीनों और बाढ़ के मैदानों को बर्बाद कर दिया है जो सदियों से चक्रवातों और तेज लहरों को रोकने का काम करते थे। भले ही राष्ट्रीय स्तर पर भारत ने मैंग्रोव के कुल दायरे में अच्छी बढ़त दर्ज की है, लेकिन शहरी इलाकों में इनका लगातार कटाव हो रहा है। उदाहरण के लिए, चेन्नई अपनी 85 प्रतिशत दलदली जमीनें खो चुका है, जबकि मुंबई ने 71 प्रतिशत और कोलकाता ने 36 प्रतिशत पर्यावरण को सुरक्षा देने वाले इन प्राकृतिक क्षेत्रों पर बड़े पैमाने पर कब्जा होते देखा है।

तटीय नियमन क्षेत्र जैसे कानूनी नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर ठीक से लागू नहीं किया जाता। नतीजतन, तटीय क्षेत्रों में अवैध निर्माण खूब फला-फूला है, और घरों की कमी के कारण लाचार होकर गरीब लोगों ने सबसे ज्यादा खतरे वाले निचले इलाकों में अपनी झुग्गी-बस्तियां बना ली हैं। बुनियादी ढांचे की ये कमियां इन खतरों को और बढ़ा देती हैं। अनुमान बताते हैं कि साल 2036 तक भारत को शहरी बुनियादी ढांचे में 840 अरब अमेरिकी डॉलर के भारी-भरकम निवेश की जरूरत होगी, जिसका एक बड़ा हिस्सा जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए होगा। इसके बावजूद, हमारा नगर निगम प्रशासन आर्थिक रूप से काफी कमजोर और टुकड़ों में बंटा हुआ है जो इतनी बड़ी चुनौती से निपटने में सक्षम नहीं दिखता।


जनभागीदारी की उपेक्षा और वैश्विक सीख (Neglect of public inclusion and global insights)

तटीय प्रबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान की अनदेखी करना है। मुंबई के कोली समाज को लहरों के उतार-चढ़ाव, मौसम के बदलावों और मैंग्रोव व खाड़ियों की अहमियत की पुश्तैनी समझ होती है। इसी तरह, केरल के पारंपरिक मछुआरे भी समुद्री धाराओं और तटों के कटाव के तौर-तरीकों को अच्छी तरह जानते हैं। इसके बावजूद, उन्हें उन सरकारी फैसलों से पूरी तरह दूर रखा जाता है जो सीधे उनके जीवन और रोजगार पर असर डालते हैं। इसके विपरीत, ओडिशा में तटीय लोगों की भागीदारी से की गई चक्रवात की तैयारियों ने सुरक्षा को बहुत मजबूत किया है और जान-माल के नुकसान को न्यूनतम स्तर पर ला दिया है।

दुनिया भर में अब इस तरह के पारंपरिक ज्ञान को सरकारी कामकाज में शामिल करने को काफी बढ़ावा मिल रहा है। न्यूजीलैंड की नीतियां वहां के मूल माओरी समुदाय के तटीय प्रबंधन के तरीकों को अपनाती हैं। कनाडा के समुद्री सुरक्षा कार्यक्रम वहां के आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को एक साथ मिलाते हैं। नीदरलैंड्स ने अपनी प्रसिद्ध 'रूम फॉर द रिवर' योजना में जनता को साथ लेकर चलने का तरीका अपनाया है, जबकि चीन के 'स्पंज सिटी' प्रोजेक्ट्स में स्थानीय लोगों को जल प्रबंधन में बराबर का साझेदार बनाया जाता है।

एक नए तटीय शहरीकरण और न्यायसंगत भविष्य की राह (Roadmap for new coastal cities and an equitable future)

बढ़ते समुद्र स्तर से निपटने के लिए भारत को तटीय शहरीकरण के अपने पूरे नजरिए को बदलना होगा। बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में पर्यावरण संरक्षण और 'ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर' को प्राथमिकता देकर ऐसे जल तंत्र विकसित करने होंगे जो प्राकृतिक रूप से पानी को सोख सकें। वैज्ञानिक नियोजन के जरिए खतरे वाले संवेदनशील क्षेत्रों में नए निर्माण को सीमित करना और भविष्य के अनुकूल बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, नगर निगमों को वित्तीय रूप से मजबूत करना होगा और लोन, हुनर व बाजारों तक पहुंच बढ़ाकर 'ब्लू उद्यमिता' और कचरा रीसाइक्लिंग जैसी चक्रीय समुद्री अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना होगा।


अंत में, तटीय समुदायों को सिर्फ सरकारी योजनाओं के लाचार लाभार्थी मानने के बजाय सक्रिय आर्थिक भागीदार समझना होगा। योजना निर्माण में उनके पारंपरिक ज्ञान को जोड़कर यह पक्का करना होगा कि नीतियां उन्हें उजाड़ने के बजाय सुरक्षित करें। जलवायु के इन खतरों और आर्थिक अवसरों में संतुलन बनाने के लिए भारत को बुनियादी ढांचे, पर्यावरण, प्रशासन और आजीविका को एक ठोस रणनीति में जोड़ना होगा। यह तालमेल पक्का करेगा कि समुद्री अर्थव्यवस्था का लाभ सबको बराबर मिले और असमानता दूर हो। बढ़ते खतरों को देखते हुए हमारे प्रशासनिक तंत्र को तुरंत बदलना होगा, क्योंकि अब मुख्य सवाल यह है कि भारत के तटीय शहरों में आने वाला यह बदलाव योजनाबद्ध और सुरक्षित होगा या फिर तबाही के बाद मजबूरी में उठाया गया कदम।

Shivam Shrivastava
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Shivam Shrivastava

शिवम उत्तर प्रदेश के एक युवा और उभरते पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 4 वर्षों का अनुभव प्राप्त है। वे राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और हाइपरलोकल खबरों की गहरी समझ रखते हैं और समसामयिक मुद्दों पर सटीक व प्रभावशाली रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उनकी विशेष रुचि डाटा-ड्रिवन पत्रकारिता और विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग में है, जिससे उनकी खबरें अधिक तथ्यात्मक और विश्वसनीय बनती हैं। वे जमीनी स्तर की रिपोर्टिंग के साथ-साथ डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप को भी समझते हैं। लेखन और रिसर्च में उनकी मजबूत पकड़ उन्हें एक सक्षम और जिम्मेदार पत्रकार के रूप में स्थापित करती है।

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