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TMC Split: ममता के सांसदों को लेकर फँसा पेच, क्या सभी सांसद हो सकते हैं एनडीए का हिस्सा
TMC Split: टीएमसी में संभावित विभाजन की अटकलों के बीच सवाल, क्या चुनाव चिन्ह और संगठन पर कब्जे के साथ सांसदों की स्थिति भी बदल सकती है?
Mamata Banerjee (Social Media).jpg
TMC Split: ममता बनर्जी की पार्टी के सभी उनतीस सासंद एनडीए के हो जायें तो कोई हैरत नही होनी चाहिए। इसके लिए पूरी तरह से चौसर बिछा दी गई हैं। बंगाल में जो कुछ हो रहा है, वह केवल अलग दल बना कर मान्यता लेने तक ही नहीं रुकेगा। यह महाराष्ट्र की तर्ज़ पर टीएमसी पर दावा करने की दिशा में बढ़ रही जंग है। जब महाराष्ट्र में यह जंग लड़ी जा रही थी। तब भाजपा केंद्र में स्पष्ट बहुमत की सरकार में थी। आज जब बैसाखी की वह सरकार चला रही है, तब उसे लोकसभा के लिए सासंदों की खासी दरकार है। टीएमसी के पास उनतीस सासंद हैं।
विधानसभा में मान्यता के बाद चुनाव आयोग का रुख़ कर सकता है गुट
सूत्रों के मुताबिक़ ऋतुव्रत बनर्जी वाला गुट विधानसभा में मान्यता के बाद चुनाव आयोग का रुख़ करेगा। भारत के चुनावी और विधायी नियमों के अनुसार, कोई भी सांसद जिस चुनाव चिह्न पर चुनकर आता है, वह मूल रूप से उसी दल का सदस्य माना जाता है। वह अपनी मर्जी से किसी दूसरे दल में नहीं जा सकता। अगर वह ऐसा करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द हो सकती है। हालांकि, जब पार्टी के भीतर ही विभाजन हो जाए, तो नियम थोड़े बदल जाते हैं। इसे समझने के लिए हमें भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है, और चुनाव चिह्न आदेश, 1968 को देखना होगा।
दलबदल विरोधी कानून क्या कहता है
दलबदल विरोधी कानून नियम 2(1)(a) के मुताबिक़ यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है जिसने उसे चुनाव में खड़ा किया था, तो वह सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य हो जाएगा। नियम 2(1)(b) के मुताबिक़ यदि कोई सांसद अपनी पार्टी के 'व्हिप' के खिलाफ जाकर सदन में मतदान करता है या अनुपस्थित रहता है, तो भी उसकी सदस्यता जा सकती है।
पहले इस अनुसूची के पैराग्राफ 4 के तहत 'एक-तिहाई विभाजन' की अनुमति थी। लेकिन 2003 में 91वें संविधान संशोधन द्वारा इसे खत्म कर दिया गया। अब पार्टी से अलग होने का एकमात्र तरीका विलय है, जिसके लिए दो-तिहाई सांसदों/विधायकों का एक साथ किसी दूसरी पार्टी में जाना या नई पार्टी बनाना जरूरी है।
चुनाव आयोग की भूमिका और पैराग्राफ 15
जब किसी पार्टी के दो गुट खुद को असली पार्टी बताते हैं, तो भारत का चुनाव आयोग Symbols Order, 1968 के Paragraph 15 के तहत फैसला करता है।
Paragraph 15 (Power of Commission in relation to splinter groups or rival sections of a recognised political party)
इस नियम के तहत चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि वह उपलब्ध साक्ष्यों, संगठनात्मक बहुमत और विधायी बहुमत को देखकर यह तय करे कि प्रतिद्वंदी गुटों में से कौन सा गुट उस मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का वास्तविक हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट का सुभाष देसाई मामला
इस पूरे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ ने 'सुभाष देसाई मामले' में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया था।
मूल राजनीतिक दल बनाम विधायी पार्टी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सदन के अंदर सांसदों या विधायकों का बहुमत होने से ही कोई गुट असली पार्टी नहीं बन जाता। असली नियंत्रण सांगठनिक विंग का होता है।
ज़ाहिर है विधायकों के इस भारी भरकम आँकड़ों के बाद ऋतुव्रत बनर्जी बंगाल के एकनाथ शिंदे बनने की दिशा में कदम बढ़ायेंगे। टीएमसी के सभी उनतीस सासंद पुष्प व तृण चुनाव चिन्ह पर जीत कर आये हैं। ऐसे में यह चुनाव निशान जिसके पास रहता है। वे उसी के सदस्यों माने जायेगे।
शिवसेना मॉडल और टीएमसी की स्थिति
अब आती है बात शिवसेना के जंग की। कहा जा सकता है कि शिवसेना के बारह सासंद शिंदे के साथ हो लिये। सात उद्धव के साथ ही रहे। पर ऐसा महज़ इसलिए हुआ क्योंकि जब फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को असली 'शिवसेना' माना, तो उसने उद्धव ठाकरे गुट के अस्तित्व को खत्म नहीं किया।
चुनाव आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उद्धव गुट को एक नया आधिकारिक नाम 'शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)' दिया। उन्हें एक नया चुनाव चिह्न 'मशाल' आवंटित किया। चूंकि यह बदलाव सांसदों ने अपनी मर्जी से नहीं किया था। बल्कि चुनाव आयोग के एक कानूनी आदेश के तहत हुआ था, इसलिए कानूनन इसे 'दलबदल' नहीं बल्कि पार्टी का 'आधिकारिक तौर पर दो हिस्सों में बंटना' माना गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस व्यवस्था को अंतरिम संरक्षण दिया था ताकि किसी की सदस्यता न जाए।
महाराष्ट्र से अलग, लेकिन कहानी मिलती-जुलती
ऋतुव्रत बनर्जी व ममता के जंग में महाराष्ट्र से अलग केवल यह है कि बंगाल के विधायकों को लंबे समय तक किसी पांच सितारा होटल में नहीं रोकना पड़ा। और महाराष्ट्र की जंग दूसरे राज्यों की ज़मीन पर लड़ी जा रही थी। बंगाल की जंग बंगाल के ज़मीन पर लड़ी जा रही है। बाक़ी सब पुनर्पाठ ही हैं।
ऋतुव्रत बनर्जी ने जो लड़ाई छेड़ी है वह संगठन पर भी क़ब्ज़े की ओर जाती हुई दिखती है। यदि लड़ाई महाराष्ट्र के तर्ज़ पर जाती हुई दिखी तो हालात ऋतुव्रत बनर्जी के पक्ष में इतने मज़बूत हैं कि उन्हें केवल साठ विधायकों का समर्थन ही नहीं, टीएमसी के ऑफिस, कोष और पार्टी को भी उनकी तरफ़ जाते हुए देख सकते हैं।


