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Ritabrata Banerjee: बंगाल का 'एकनाथ शिंदे' कौन? जानिए कैसे कम्युनिस्ट से TMC के बागी बने ऋतब्रत बनर्जी ने किया दीदी के नाक में दम
Ritabrata Banerjee TMC Rebellion: पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी को दोफाड़ करने का दावा करने वाले बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी कौन हैं? SFI के राष्ट्रीय महासचिव से लेकर राज्यसभा और फिर ममता बनर्जी के खिलाफ 'महाराष्ट्र जैसे विद्रोह' का नेतृत्व करने वाले ऋतब्रत बनर्जी के राजनीतिक सफर और इस पूरे विवाद की इनसाइड स्टोरी पढ़ें।
Ritabrata Banerjee TMC Rebellion: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक ऐसा अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है जिसने राज्य के सबसे बड़े राजनीतिक दल, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नींव को हिलाकर रख दिया है। विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही थीं कि अचानक पार्टी के भीतर एक बहुत बड़ी बगावत खुलकर सामने आ गई। इस बगावत के बाद टीएमसी अब सीधे तौर पर दो धड़ों में बंटती हुई नजर आ रही है और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या यह ममता बनर्जी के राजनीतिक साम्राज्य के अंत की शुरुआत है?
इस पूरे सियासी ड्रामे और विवाद के केंद्र में एक ही नाम सबसे ज्यादा गूंज रहा है और वह नाम है ऋतब्रत बनर्जी का। ऋतब्रत बनर्जी ने अपने आक्रामक तेवरों और दावों से टीएमसी नेतृत्व की नाक में दम कर दिया है। हालात इस कदर बेकाबू हो चुके हैं कि ममता बनर्जी को आनन-फानन में पार्टी की सभी मुख्य कमेटियों और सभी 16 फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग करने का एक ऐतिहासिक और कठोर फैसला लेना पड़ा है।
कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी
ऋतब्रत बनर्जी को समझने के लिए उनके राजनीतिक सफर और उनके मिजाज को समझना बेहद जरूरी है। वे बंगाल की राजनीति के कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि छात्र जीवन से ही वे बेहद मुखर और आक्रामक नेता रहे हैं। ऋतब्रत बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत वामपंथी दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के छात्र संगठन एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) से की थी। अपनी तेज तर्रार छवि और शानदार भाषण शैली के दम पर वे बहुत जल्द एसएफआई के राष्ट्रीय महासचिव बन गए। इसके बाद माकपा ने उनकी काबिलियत को देखते हुए उन्हें साल 2014 में राज्यसभा भेजा था।
राज्यसभा सांसद के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान ही उनके साथ कई विवाद जुड़ने लगे। साल 2017 में उन पर महंगी जीवनशैली अपनाने, लग्जरी सामानों का इस्तेमाल करने और पार्टी सिद्धांतों के खिलाफ काम करने के गंभीर आरोप लगे। माकपा जैसी कैडर आधारित पार्टी में इस तरह की जीवनशैली को अनुशासनहीनता माना गया और आखिरकार साल 2017 में ही उन्हें माकपा से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसके कुछ समय बाद उन्होंने ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी का दामन थाम लिया, जहां उन्हें पार्टी के श्रमिक संगठन (आईएनटीटीयूसी) में बड़ी जिम्मेदारी दी गई और बाद में वे विधायक बनकर सदन पहुंचे। लेकिन बागी स्वभाव के ऋतब्रत बनर्जी का विवादों से नाता कभी नहीं छूटा।
क्या है वह पूरा विवाद
इस पूरे सियासी खेल और विवाद की शुरुआत तब हुई जब हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजे आए। इन चुनावों में टीएमसी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा और वह महज 80 सीटों पर सिमट कर रह गई। इस करारी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष के स्वर उठने लगे। विवाद तब और गहरा गया जब टीएमसी शीर्ष नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाने का एकतरफा ऐलान कर दिया। पार्टी के इस फैसले के खिलाफ ऋतब्रत बनर्जी और उनके साथी विधायक संदीपन साहा खुलकर सामने आ गए।
ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में बागी गुट ने आरोप लगाया कि 6 मई को सदन के नए पदाधिकारियों के नामों को मंजूरी देने के लिए जो प्रस्ताव पत्र तैयार किया गया था, उस पर कई विधायकों के फर्जी यानी नकली हस्ताक्षर किए गए थे। बागी विधायकों का दावा था कि उस सूची में उनके खुद के दस्तखत भी जाली थे। इसके बाद जब टीएमसी ने ऋतब्रत और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित किया, तो बगावत की आग और भड़क गई। संदीपन साहा की अगुवाई में बागी गुट सीधे विधानसभा पहुंच गया और उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी को असली नेता प्रतिपक्ष बनाने का दावा पेश कर दिया। बागी गुट का दावा है कि टीएमसी के 50 से अधिक और कुछ सूत्रों के अनुसार लगभग 60 विधायकों का समर्थन ऋतब्रत बनर्जी के साथ है।
कैसे ऋतब्रत ने महाराष्ट्र जैसा संकट खड़ा किया?
ऋतब्रत बनर्जी के इस कदम ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के सामने वही संकट खड़ा कर दिया है जैसा साल 2022 में महाराष्ट्र में शिवसेना के भीतर एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के सामने खड़ा किया था। दलबदल कानून के तहत किसी भी पार्टी के विधायकों की सदस्यता तभी बच सकती है जब कुल विधायकों के दो-तिहाई सदस्य एक साथ टूटें। टीएमसी के जीते हुए 80 विधायकों के लिहाज से दो-तिहाई का यह जादुई आंकड़ा 54 विधायकों का होता है। ऋतब्रत बनर्जी ने अपने साथ 59 विधायकों के समर्थन का दावा करके सीधे तौर पर ममता बनर्जी की विधायकी शक्ति को चुनौती दे दी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऋतब्रत बनर्जी ने बहुत ही सुनियोजित तरीके से टीएमसी के भीतर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के कार्यशैली से नाराज विधायकों को एकजुट किया। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि आज की तारीख में तृणमूल कांग्रेस को शीर्ष स्तर के कुछ नेताओं द्वारा हाईजैक कर लिया गया है और जमीन पर काम करने वाले नेताओं की कोई सुनवाई नहीं हो रही है। ऋतब्रत के इस कड़े रुख और विधायकों की इतनी बड़ी संख्या को अपने पाले में कर लेने के कारण ही ममता बनर्जी को बैकफुट पर आना पड़ा है।
कमेटियां और फ्रंटल संगठन भंग करने की असली रणनीति
जब ममता बनर्जी को यह अहसास हुआ कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है और पार्टी के कई संगठन अंदर ही अंदर ऋतब्रत बनर्जी के बागी गुट का समर्थन कर रहे हैं, तो उन्होंने एक बहुत बड़ा संगठनात्मक फैसला लिया। टीएमसी नेतृत्व ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी मुख्य कमेटियां, कोर कमेटी, स्टेट कमेटी, जिला और ब्लॉक कमेटियां और इसके साथ ही सभी 16 फ्रंटल संगठन (जैसे युवा, महिला, छात्र और मजदूर विंग) तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएंगे।
इस कदम के पीछे ममता बनर्जी की बहुत गहरी रणनीतिक सोच काम कर रही है:
विद्रोहियों के नेटवर्क को तोड़ना: कमेटियों और संगठनों को भंग करने का सबसे पहला मकसद उन स्थानीय पदाधिकारियों को पदों से हटाना है जो चुपके से बागी गुट की मदद कर रहे थे। पद छिन जाने से उनकी सांगठनिक ताकत खत्म हो जाएगी।
नए सिरे से वफादारों की नियुक्ति: पार्टी अब हर स्तर पर आत्म-निरीक्षण और कार्य-समीक्षा की एक व्यापक प्रक्रिया चलाएगी। इसके बाद केवल उन्हीं नेताओं को दोबारा जगह मिलेगी जो पूरी तरह से ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार होंगे।
समय हासिल करना: संगठनों को भंग करके ममता बनर्जी ने नई कमेटियों के गठन तक का समय हासिल कर लिया है, जिससे उन्हें बागी विधायकों को मनाने या उनके खिलाफ जवाबी रणनीति तैयार करने का मौका मिल जाएगा।
क्या पूरी तरह खत्म हो जाएगी TMC?
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या तृणमूल कांग्रेस का वजूद अब खत्म होने वाला है? इस मामले के दो मुख्य कानूनी और राजनीतिक पहलू दिखाई देते हैं। यदि ऋतब्रत बनर्जी का 59 विधायकों के समर्थन का दावा पूरी तरह सच साबित होता है और वे राज्यपाल तथा विधानसभा अध्यक्ष के सामने इन विधायकों की सशरीर परेड करा देते हैं, तो वे तकनीकी और कानूनी रूप से असली टीएमसी होने का दावा कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में ममता बनर्जी के गुट के पास बहुत कम विधायक रह जाएंगे, जिससे उनसे मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी छिन सकता है, क्योंकि सदन में नेता प्रतिपक्ष का पद पाने के लिए कम से कम 10 प्रतिशत यानी 29 विधायकों का होना जरूरी है।
दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के राजनीतिक इतिहास को देखने वाले जानते हैं कि वे संकटों से लड़कर ही आगे बढ़ी हैं। उन्होंने पार्टी को बचाने के लिए सांगठनिक फेरबदल शुरू कर दिया है और साथ ही वे राष्ट्रीय स्तर पर 'इंडिया' ब्लॉक की बैठकों में शामिल होकर देश को यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि बंगाल की अंदरूनी कलह से उनकी राष्ट्रीय राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है।
पश्चिम बंगाल की यह राजनीतिक लड़ाई अब पूरी तरह से वर्चस्व की लड़ाई बन चुकी है। एक तरफ ममता बनर्जी का दशकों पुराना राजनीतिक अनुभव और करिश्मा है, तो दूसरी तरफ ऋतब्रत बनर्जी की युवा सोच और टीएमसी के भीतर असंतुष्ट विधायकों का एक बहुत बड़ा गुट है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले कुछ दिन बंगाल की सत्ता और सांगठनिक भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं।


