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El Niño का बढ़ा खतरा! WMO की चेतावनी, 2026 में भीषण गर्मी, सूखा और बाढ़ के संकेत, भारत की बढ़ी चिंता
WMO Warning for El Niño: विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने 2026 में मजबूत अल-नीनो की चेतावनी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में तापमान बढ़ सकता है, कई क्षेत्रों में सूखे और बाढ़ का खतरा रहेगा, जबकि भारत और दक्षिण एशिया में मानसून सामान्य से कमजोर रहने की आशंका जताई गई है।
Image Source- Ai
WMO Warning for El Niño: विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने भारत समेत दुनिया भर के पर्यावरण विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। संगठन ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की है कि प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थितियां तेजी से विकसित हो रही हैं। आने वाले महीनों में यह मौसमी बदलाव वैश्विक तापमान और बारिश के पैटर्न को बड़े स्तर पर प्रभावित कर सकता है।
वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि वर्ष 2026 में आने वाला अल-नीनो सामान्य नहीं होगा। इसके मध्यम से लेकर बहुत मजबूत होने की संभावना जताई गई है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना इस स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी वीडियो संदेश जारी कर चेतावनी दी है कि अल-नीनो पहले से गर्म हो रही दुनिया की स्थिति को और गंभीर बना सकता है। उन्होंने कहा कि इसके प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य और कृषि व्यवस्था पर गहरा असर डाल सकते हैं और यह असर बहुत तेजी से दुनिया भर में महसूस किया जाएगा। तो क्या है ये अल-नीनो और कैसे ये भारत के लिए चिंता का विषय बना हुआ है? आइए इसकी पड़ताल करते हैं।
क्या है अल-नीनो और कैसे बदल देता है मौसम?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण पैदा होती है। यह अल-नीनो साउदर्न ऑसीलेशन का हिस्सा है, जबकि इसका ठंडा चरण ला-नीना कहलाता है।
आमतौर पर अल-नीनो हर दो से सात साल के बीच आता है और लगभग नौ से बारह महीने तक सक्रिय रहता है। यह चक्र आमतौर पर मार्च से जून के बीच विकसित होना शुरू होता है और नवंबर से फरवरी के बीच अपनी चरम स्थिति पर पहुंचता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार अल-नीनो का सबसे बड़ा प्रभाव उसके विकसित होने के दूसरे वर्ष में दिखाई देता है। इस बार समुद्र के भीतर की स्थितियां बेहद गर्म हैं और सतह से नीचे का तापमान सामान्य से लगभग छह डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अतिरिक्त गर्मी आगे चलकर भीषण गर्मी, सूखे और विनाशकारी बाढ़ जैसी परिस्थितियों को जन्म दे सकती है।
जून से अगस्त के लिए बड़ी चेतावनी
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की नई अपडेट के मुताबिक जून से अगस्त 2026 के दौरान अल-नीनो के सक्रिय होने की संभावना 80 प्रतिशत है। वहीं नवंबर तक इसके बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से अधिक बताई गई है।
ग्लोबल सीजनल क्लाइमेट अपडेट रिपोर्ट के अनुसार जून, जुलाई और अगस्त के महीनों में दुनिया के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी अधिक रहने की आशंका है। तापमान में यह वृद्धि लोगों में हीट स्ट्रेस यानी गर्मी से होने वाले शारीरिक तनाव को बढ़ा सकती है और कई क्षेत्रों में गंभीर सूखे की स्थिति पैदा कर सकती है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की महानिदेशक सेलेस्टे साउलो ने कहा है कि दुनिया को एक संभावित रूप से बेहद मजबूत अल-नीनो के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2023-24 का अल-नीनो इतिहास के पांच सबसे शक्तिशाली अल-नीनो में शामिल था और उसने वर्ष 2024 को अब तक का सबसे गर्म साल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। अब वर्ष 2026 में फिर वैसा ही खतरा दिखाई दे रहा है।
क्या होगा भारत और दक्षिण एशिया पर असर?
भारत और पूरे दक्षिण एशिया के लिए यह रिपोर्ट चिंता बढ़ाने वाली है। साउथ एशियन क्लाइमेट आउटलुक फोरम के पूर्वानुमानों का हवाला देते हुए विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने कहा है कि अल-नीनो के प्रभाव से दक्षिण एशिया में इस साल मानसून की बारिश सामान्य से कम हो सकती है।
भारत जैसे कृषि आधारित देश के लिए मानसून बेहद महत्वपूर्ण है। यदि बारिश सामान्य से कम होती है तो इसका सीधा असर खेती, फसलों के उत्पादन, जल उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है। कम वर्षा की स्थिति में सूखे का खतरा बढ़ सकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है।
वहीं दुनिया के कुछ अन्य क्षेत्रों जैसे दक्षिणी अमेरिका, अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों, हॉर्न ऑफ अफ्रीका और मध्य एशिया में सामान्य से अधिक बारिश और बाढ़ की आशंका जताई गई है। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मध्य अमेरिका और कैरिबियाई देशों में मौसम अधिक शुष्क और गर्म रहने की संभावना है।
क्या जलवायु परिवर्तन है इसकी वजह?
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी तक ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है जिससे यह साबित हो सके कि जलवायु परिवर्तन या ग्लोबल वार्मिंग के कारण अल-नीनो की आवृत्ति या ताकत बढ़ी है। अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है जो सदियों से होता आया है।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मानव गतिविधियों से बढ़े प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग ने वातावरण और समुद्रों को पहले ही काफी गर्म कर दिया है। ऐसे में जब प्राकृतिक अल-नीनो इस गर्म वातावरण के साथ जुड़ता है तो इसके प्रभाव और अधिक गंभीर हो जाते हैं।
गर्म वातावरण में ऊर्जा और नमी को धारण करने की क्षमता ज्यादा होती है। इसी वजह से अल-नीनो से जुड़ी घटनाएं जैसे अचानक आने वाली बाढ़, लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव और अन्य मौसमीय आपदाएं अधिक खतरनाक और विनाशकारी रूप ले सकती हैं।
समय रहते तैयारी करने की जरूरत
विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपनी चेतावनी के साथ दुनिया भर की सरकारों और मानवीय सहायता एजेंसियों से समय रहते तैयारी करने की अपील की है। संगठन का कहना है कि अग्रिम मौसम पूर्वानुमानों की मदद से कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में बेहतर रणनीति तैयार की जा सकती है।
संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि इस तरह के संकटों से निपटने के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना और हर नागरिक तक अर्ली वार्निंग सिस्टम की पहुंच सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। इससे संभावित आपदाओं के दौरान जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
2026 पर टिकी है दुनिया की नजर
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताजा रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि वर्ष 2026 मौसम के लिहाज से बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। अल-नीनो की बढ़ती गतिविधियां दुनिया भर में मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में मौसम वैज्ञानिकों की निगाहें प्रशांत महासागर की बदलती परिस्थितियों पर टिकी रहेंगी, क्योंकि इन्हीं के आधार पर दुनिया के कई देशों की जलवायु, कृषि और अर्थव्यवस्था की दिशा तय होगी।


