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पीरियड लीव बहस और महिला स्वास्थ्य की जमीनी चुनौतियां
सुप्रीम कोर्ट के पीरियड लीव पर फैसले के बाद महिला स्वास्थ्य, कार्यस्थलों की सुविधाएं और सुरक्षित-साफ सार्वजनिक टॉयलेट्स की कमी पर बहस फिर तेज हो गई है।
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हाल ही के फैसले में कार्यस्थलों और शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं के लिए अनिवार्य 'पीरियड लीव' (मासिक धर्म अवकाश) की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच का कहना था कि अगर पीरियड लीव को कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया जाता है, तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी पर रखने में संकोच कर सकते हैं। इससे महिलाओं के करियर और रोजगार के अवसरों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। साथ ही माननीय बेंच का कहना था कि ऐसा कानून अनजाने में जेंडर रूढ़िवादिता को मजबूत कर सकता है, जिससे महिलाएं कार्यस्थल पर कम पसंद की जा सकती हैं। कोर्ट का कहना था कि यह एक तरह का नीतिगत मुद्दा है बजाय इसके कि इसके लिए एक कानून बनाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और सम्मान के अधिकार का हिस्सा माना है और स्कूलों में अलग व साफ टॉयलेट्स के निर्देश दिए हैं। अदालत के इस फैसले के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है कि क्या पीरियड्स के दौरान छुट्टी देना एक प्रगतिशील और आवश्यक कदम है या फिर इससे यह विचार मजबूत होता है कि कार्यस्थलो के लिए महिलाएं कमजोर या कम सक्षम हैं। इस बात पर पहले भी इस कॉलम में लिखा जा चुका है। पर प्रश्न यह है कि क्या हकीकत में वाकई ऐसा है कि महिलाओं को एक साफ- सुथरा टॉयलेट घर से बाहर उपयोग के लिए मिल जाता है? अधिकांशतः जवाब आएगा नहीं।
हमारा देश जो कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है पर जमीनी हालात उस तरह के आज भी दिखाई नहीं देते कि वह अपनी मूलभूत सुविधाओं को भी उस स्तर तक ले जा पा रहा है। बहुत काम हुआ है, मात्र कागजों में भी और जमीन पर भी, बहुतायत काम होना बाकी है। पर इन सब के बीच झूलती आम जनता हर रोज उन मूलभूत सुविधाओं को न प्राप्त कर पाने की असहजता से हर रोज दो-चार होती है। और सबसे अधिक परेशानी का सामना महिलाओं को करना पड़ता है, जिन्हें साफ टॉयलेट्स की उपलब्धता के अभाव में असुविधाजनक या असुरक्षित परिस्थितियों में काम करना पड़ सकता है। पिछले कुछ दशकों में भारत में महिलाओं ने स्थापित स्टीरियोटाइपस की बाधाओं को तोड़कर विभिन्न व्यावसायिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, प्रोफेशनल और व्यक्तिगत रूप से नई ऊंचाइयों को छुआ है, नए क्षेत्रों में प्रवेश किया है और नए मापदंड स्थापित किए हैं। फिर भी आज भी कार्यक्षेत्र में पूर्ण भूमिका निभाने और पुरुषों के समान रोजगार और पेशेवर अवसरों तक समान पहुंच प्राप्त करने की उनकी यात्रा चुनौतियों से भरी हुई है। इसका कारण सिर्फ यह नहीं की महिलाओं में क्षमता नहीं है या महिलाएं करना नहीं चाहतीं। कहीं घर और सदस्यों की देखभाल अगर उनके लिए उसका एक कारण है तो उसका एक दूसरा बड़ा कारण घर के बाहर कार्यस्थलों और फील्ड वर्क/ विजिट में टॉयलेटस की असुविधा भी उन्हें अपने कदम आगे बढ़ाने पर कहीं न कहीं रोक लगाती हैं। 2011 की भारत की जनगणना के अनुसार, भारत में 58.7 करोड़ महिलाएं हैं, जो जनसंख्या का 48 प्रतिशत हैं। इसके बावजूद, केवल एक तिहाई महिलाएं ही श्रम बल में शामिल हुई हैं।
भारत भर में करोड़ों शौचालयों के निर्माण के सरकार के प्रयासों के बावजूद, 'स्वच्छता अभियान' चलाने के बावजूद अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाली महिला श्रमिकों को आज भी सुरक्षित और स्वच्छ शौचालयों की सुविधा प्राप्त करने में कठिनाई होती है। मंदिरों में चले जाइए, मात्र एक या दो प्रतिशत मंदिरों को छोड़ दें तो, छोटे- बड़े होटलों में चले जाइए कुछ प्रतिशत को छोड़ दें तो, सुंदर बने पार्को में चले जाइए, विद्यालयों में चले जाइए विशेषकर सरकारी, सार्वजनिक कार्यक्रम स्थल, कम्युनिटी सेंटर, सरकारी दफ्तरों, सामाजिक संस्था के भवनों में चले जाइए सब जगह लगभग एक जैसी स्थिति से सामना होना ही होता है। रेलगाड़ियों की दुर्दशा की बात करना ही बेमानी है। या तो टॉयलेटस ही नहीं हैं और अगर हैं तो उनमें न तो समुचित पानी की व्यवस्था होती है और न ही पर्याप्त रोशनी। कहीं दरवाजे बंद करने की सुविधा नहीं है तो कहीं खूंटी टूटीं पड़ीं हैं। गंदगी का आलम यह है कि महिला मरें न क्या करें। उन्हें उनका प्रयोग करना मजबूरी होता है। कहीं सुविधा शुल्क मांगा जाता है , वह अलग, उसके बाद भी सुविधा नदारद होती हैं। विभिन्न क्लबों और संस्थाओं द्वारा सार्वजनिक टॉयलेट्स जगह-जगह बनवाए गए हैं पर उनमें भी अधिकांशत: ताला ही लटका मिलता है। नाक बंद करके, स्वयं को संभालती वह अगर किसी तरह से उनका प्रयोग कर भी लेती हैं तो इंफेक्शन होने का डर हो जाता है। रात के समय तो उन टॉयलेटस की सुरक्षा भगवान भरोसे ही होती है। विभिन्न पेट्रोल पंपों पर भी टॉयलेट्स रहते हैं पर वहां भी स्थिति इससे कोई बेहतर नहीं मिलती। बाहर सड़कों या निर्माण स्थलों पर काम करने वाली महिला कामगारों से लेकर पर्यटकों तक, घर से किसी काम से बाहर निकली महिलाओं, लड़कियों, कामकाजी महिलाएं चाहे वह दफ्तर में काम करती हों या फील्ड वर्क में हों, सब्जी बेचने वाली महिला हो, सिक्योरिटी गार्ड हो या दुकान पर बैठी महिला हो, उनमें से कितनों को अपने-अपने कार्यस्थलों के आसपास एक सहज, साफ-सुथरे टॉयलेट की सुविधा मिलती है। एक फील्ड रिपोर्टिंग करने वाली महिला पत्रकार, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव आदि के लिए कितनी कठिन स्थिति हो जाती है कि वह सार्वजनिक शौचायलयों के अभाव में बाहर पानी तक पीना टाल जाती हैं। सबसे बड़ी बात यह होती है कि पुरुष सहयोगी या वरिष्ठ के लिए यह स्थिति सामान्य होती हैं ।उनका कहना होता है कि अगर महिला को काम करना है तो इन स्थितियों से दो-चार होना ही होगा अन्यथा वह इस काम को छोड़ दें और अपने घर बैंठे। इसलिए चाहे पत्रकार हों या मजदूर ये व्यवस्थाएं उनके लिए आज भी दुरुस्त नहीं है । इससे उनकी कार्य करने की क्षमता सीमित हो जाती है और उनके स्वास्थ्य को खतरा होता है। एक रिपोर्ट बताती है कि 68% महिलाओं ने अस्वच्छ सार्वजनिक टॉयलेट्स के कारण तनाव और परेशानी की बात स्वीकार की। रिपोर्ट यह भी कहती है कि खराब स्वच्छता और गंदगी के कारण 53.9% से अधिक महिलाओं को युरिन इंफेक्शन जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ा। 46% सार्वजनिक शौचालय असुरक्षित माने जाते हैं। 53% महिलाओं के शौचालयों में पानी की कमी पाई गई और 35% में पुरुष और महिलाओं के लिए अलग-अलग टॉयलेट्स नहीं हैं। 71% सार्वजनिक शौचालय नियमित रूप से साफ नहीं होते हैं, जो उनके अनुपयोगी होने का सबसे बड़ा कारण है। हालांकि शहरों में 'पिंक टॉयलेट' जैसे प्रयोग किए जा रहे है, पर फिलहाल वे ऊंट के मुंह में जीरा हैं।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि सार्वजनिक टॉयलेट्स में सेनेटरी पैड डिस्पोजल मशीन तो होती ही नहीं है। हालांकि यह अब बड़े विद्यालयों, आफिसों में होती है पर कई जगह तो यह लगी होने के बावजूद खराब ही मिलती है। इनके सही और उचित निस्तारण के अभाव में यह असुरक्षित और अस्वास्थ्यकर हो जाता है। मसला सिर्फ इतना नहीं कि पीरियड लीव दी जाए या नहीं, पेड लीव दी जाए या नहीं, यह उसके सही प्रबंधन का है। महिलाओं से अपेक्षा तो यह है कि वह पीरियड लीव न लेकर उनमें काम करें क्योंकि इससे उनको दक्षता, कैरियर, रोजगार के अवसरों, जेंडर असमानता जैसी बातों का सामना करना पड़ेगा। पर एक बेहतरीन समाज बनाने के लिए, एक जेंडर समान कार्यस्थल देने के लिए हम उन्हें क्या वे सुविधा दे पाते हैं, जिससे कि वे उस तकलीफ वाले समय में भी काम कर सकें। सुप्रीम कोर्ट का फैसला उचित और सही होगा पर साथ ही यह महिलाओं के लिए स्वच्छ और सुरक्षित सार्वजनिक टॉयलेट्स की मांग को और अधिक जरूरी बनाता है। आखिर स्वस्थ और सुरक्षित महिला ही तो स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य को बना पाएंगी। महिलाओं को भी अपने स्वास्थ्य के लिए इस खामोश जंग को स्वयं ही आगे बढ़ाना होगा।


