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ओडिशा में BJP-BJD ने मिलकर किया बड़ा खेला... मुंह देखती रह गई Congress! भाजपा की इस 'चाल' से बदल गया चुनावी गणित
Odisha Rajya Sabha elections 2026: कुछ दिनों में होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले राज्य की सियासत में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने कांग्रेस की उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया।
Odisha Rajya Sabha elections 2026 (photo: social media)
Odisha Rajya Sabha elections 2026: ओडिशा की राजनीति में एक बार फिर रणनीतिक समीकरणों ने बड़ा ही ऐतिहासिक मोड़ ले लिया है। कुछ दिनों में होने वाले राज्यसभा चुनाव से पहले राज्य की सियासत में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने कांग्रेस की उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और बीजू जनता दल (BJD) के बीच बनी समझदारी ने चारों राज्यसभा सीटों का रास्ता लगभग साफ कर दिया है, जबकि कांग्रेस देखते रह गई और कुछ कर न सकी।
कब होंगे राज्यसभा चुनाव ?
जानकारी के मुताबिक, राज्य में 16 मार्च को होने वाले राज्यसभा चुनाव के अंतर्गत 4 सीटों पर मतदान प्रस्तावित है। विधानसभा की मौजूदा वक़्त की संख्या के आधार पर एक सीट जीतने के लिए लगभग 31 विधायकों के समर्थन की ज़रूरत है। ओडिशा विधानसभा में भाजपा के पास 82 विधायक हैं, जिससे वह बहुत आसानी से दो उम्मीदवारों को जीत दिला सकती है। दो सीटों के बाद भी उसके पास अतिरिक्त वोट बचते हैं।
वहीं BJD के पास कुल 48 विधायक हैं, जो उसे एक सीट सुनिश्चित करते हैं और कुछ अतिरिक्त वोट भी उसके खाते में हैं। कांग्रेस के पास मात्र 14 विधायक हैं, जो उसे अपने दम पर किसी उम्मीदवार को जिताने की स्थिति में नज़र नहीं आ रहे।
कांग्रेस की रणनीतिपर भाजपा का तगड़ा वार
इसी गणित के बीच कांग्रेस ने BJD के साथ तालमेल बैठाने का पूरा प्रयास कर रही थी। प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व चाहता था कि BJD चौथी सीट कांग्रेस के लिए छोड़ दे, ताकि दोनों दल मिलकर भाजपा को तीसरी सीट जीतने से रोक सकें। लेकिन अब आखिरी वक़्त भाजपा ने तीसरे उम्मीदवार को मैदान में न उतारकर राजनीतिक समीकरण ही बदल दिए। इससे कांग्रेस की रणनीति धरी की धरी रह गई।
भाजपा इन उम्मीदवारों की जीत लगभग तय!
भाजपा ने अपने प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल और पूर्व BJD नेता सुजीत कुमार को राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है। सुजीत कुमार हाल ही में BJD छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे। दूसरी तरफ BJD ने डॉ. संतृप्त मिश्रा और प्रसिद्ध यूरोलॉजिस्ट डॉ. दत्तेश्वर होता को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। मौजूदा संख्या बल को ध्यान में रखते हुए इन चारों उम्मीदवारों की जीत लगभग तय मानी जा रही है।
क्या है राजनीतिक विश्लेषकोंकी राय ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक समझ का नतीजा है। राज्यसभा में जब-जब भाजपा को समर्थन की आवश्यकता पड़ी, तब-तब BJD ने केंद्र में सत्तारूढ़ दल का साथ दिया। अब ओडिशा में जब BJD को सहयोग की आवश्यकता थी, भाजपा ने तीसरी सीट पर उम्मीदवार न उतारकर अप्रत्यक्ष समर्थन का स्पष्ट रूप से संकेत दिया है। इससे दोनों दलों के बीच आपसी भरोसा और रणनीतिक तालमेल की झलक दिखाई पड़ती है।
लेकिन... मनमोहन सामल चर्चा में क्यों ?
इस पूरे घटनाक्रम में मनमोहन सामल की भूमिका भी चर्चा में है। क्योंकि साल 2024 के विधानसभा चुनाव में ओडिशा में भाजपा ने पहली बार अपने दम पर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। संगठन को मजबूत करने और जमीनी स्तर पर पार्टी की पकड़ बढ़ाने में सामल की सक्रिय भूमिका मानी जाती है। हालांकि, वे स्वयं चुनाव हार गए थे, लेकिन संगठनात्मक योगदान को देखते हुए पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजने का निर्णय किया।
वहीं अब BJD ने डॉ. संतृप्त मिश्रा जैसे कारोबारी पृष्ठभूमि वाले नेता और डॉ. दत्तेश्वर होता जैसे चिकित्सा क्षेत्र के प्रतिष्ठित चेहरे को आगे कर संतुलित संदेश देने का प्रयास किया है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि BJD सामाजिक और पेशेवर विविधता को प्रतिनिधित्व देना चाहती है।
कांग्रेस के लिए बड़ा झटका
अब ऐसे में इस घटनाक्रम को कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम एक बड़ा झटका माना जा रहा है। राज्य में पहले से ही सीमित राजनीतिक आधार के बीच पार्टी राज्यसभा में भी प्रतिनिधित्व से वंचित होती दिख रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि कांग्रेस ने संभावित समीकरणों पर विश्वास किया, लेकिन भाजपा की आखिरी वक़्त की रणनीति ने पूरा खेल बदल कर रख दिया।
ओडिशा की राजनीति में इस वक़्त ये है सबसे बड़ा संकेत...
ओडिशा की राजनीति में यह प्रकरण इस बात का संकेत है कि भले ही विधानसभा और लोकसभा में दल आमने-सामने हों, लेकिन राज्यसभा जैसे चुनावों में व्यावहारिक राजनीति और रणनीतिक सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भाजपा और BJD के इस कदम ने यह साफ़ कर दिया है कि राज्य और केंद्र की राजनीति में समीकरण हमेशा परिस्थितियों के अनुसार बनते-बिगड़ते रहते हैं।
अब सभी की निगाहें 16 मार्च 2026 के मतदान और उसके औपचारिक नतीजे पर टिकी है, लेकिन मौजूदा अंकगणित को देखते हुए तस्वीर लगभग साफ़ है। इस घटनाक्रम ने ओडिशा की सियासत में एक बार फिर रणनीति बनाम भावना की बहस को जन्म दे दिया है, जिसमें इस बार बढ़त रणनीति को मिलती नज़र आ रही है।


