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पुरी जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की बड़ी चूक, त्रिमूर्ति की गलत तस्वीर पर SJTA ने मांगी माफी
Puri Jagannath Temple News: 2026 के कैलेंडर में परंपरा से जुड़ी गलती पर भड़के भक्त, बिक्री पर लगी रोक
Puri Jagannath Temple News
Puri Jagannath Temple News: ओडिशा के पुरी स्थित विश्वप्रसिद्ध श्रीजगन्नाथ मंदिर से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा में है। मंदिर प्रशासन द्वारा जारी किए गए साल 2026 के कैलेंडर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की पारंपरिक स्थिति को गलत तरीके से दर्शाए जाने पर भक्तों और सेवकों में गहरा आक्रोश देखने को मिला। विवाद बढ़ने के बाद श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (SJTA) ने कैलेंडर की बिक्री पर रोक लगाते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है। पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर न केवल ओडिशा बल्कि पूरे देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां की हर परंपरा, हर अनुष्ठान और यहां तक कि भगवान की मूर्तियों की स्थिति भी शास्त्रों और सदियों पुरानी मान्यताओं के अनुसार तय है। ऐसे में जब मंदिर प्रशासन द्वारा जारी किए गए 2026 के टेबल और वॉल कैलेंडर में इन परंपराओं से जुड़ी गंभीर गलतियां सामने आईं। जिसके बाद व्यापक रूप से विरोध शुरू हो गया।
क्या है पूरा मामला
दरअसल, 2026 के लिए जारी किए गए कैलेंडर में रत्न सिंहासन पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को गलत क्रम में दिखाया गया। परंपरा के अनुसार, रत्न सिंहासन पर मध्य में भगवान जगन्नाथ, उनके दाईं ओर भगवान बलभद्र और बाईं ओर देवी सुभद्रा विराजमान रहती हैं। लेकिन कैलेंडर में भगवान जगन्नाथ के स्थान पर बलभद्र और बलभद्र के स्थान पर जगन्नाथ की छवि प्रकाशित कर दी गई।
इतना ही नहीं, कैलेंडर में छपी एक रथ यात्रा से जुड़ी तस्वीर को लेकर भी आपत्ति जताई गई। चित्र में देवी सुभद्रा के दर्पदलन रथ को सबसे पहले, फिर भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ और अंत में भगवान बलभद्र के तालध्वज रथ को खींचते हुए दिखाया गया। जबकि परंपरा के अनुसार रथ यात्रा के दौरान रथों का क्रम अलग होता है, जिसे मंदिर की परंपराओं का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।
भक्तों और सेवकों में नाराजगी
इन गलतियों के सामने आते ही मंदिर के सेवकों, विद्वानों और आम श्रद्धालुओं ने कड़ी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि श्रीजगन्नाथ संस्कृति में छोटी-सी भी चूक को गंभीरता से लिया जाता है। क्योंकि यह केवल कला या चित्रण का विषय नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा मामला है। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
बीजेडी के प्रवक्ता मोहंती ने भी इस मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि एसजेटीए ने पुरानी कलाकृति का इस्तेमाल करने से पहले मंदिर परंपराओं के जानकारों और विशेषज्ञों से सलाह नहीं ली, जो एक बड़ी चूक है।
मंदिर प्रशासन का पक्ष और माफी
विवाद बढ़ने के बाद श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने स्थिति को संभालते हुए बयान जारी किया। एसजेटीए ने स्पष्ट किया कि कैलेंडर में प्रकाशित तस्वीरें ओडिशा राज्य संग्रहालय में संरक्षित एक सदी पुरानी ताड़ के पत्तों की पांडुलिपि से प्रेरित थीं। प्रशासन के अनुसार, यह उस दौर के एक चित्रकार की शैली को दर्शाती है और इसका उद्देश्य किसी भी तरह से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था।
अपने बयान में एसजेटीए ने कहा, 'यह उस समय के एक कलाकार की कला है। हमें उम्मीद है कि भगवान जगन्नाथ के भक्त इसे गलत अर्थों में नहीं लेंगे।' इसके साथ ही प्रशासन ने यह भी स्वीकार किया कि अनजाने में हुई इस गलती से लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं, जिसके लिए वे खेद प्रकट करते हैं।
बिक्री पर रोक का फैसला
भारी विरोध को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से इन कैलेंडरों की बिक्री पर रोक लगाने का निर्देश दिया। अधिकारियों को आदेश दिया गया कि बाजार में उपलब्ध कैलेंडर वापस लिए जाएं और आगे ऐसी किसी भी सामग्री के प्रकाशन से पहले विशेषज्ञों की राय जरूर ली जाए।
परंपरा और सावधानी का सवाल
यह पूरा मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि धार्मिक संस्थानों से जुड़े प्रकाशनों में कितनी सावधानी बरती जानी चाहिए। श्रीजगन्नाथ मंदिर जैसी ऐतिहासिक और आस्थावान संस्था में हर प्रतीक, हर चित्र और हर विवरण का विशेष महत्व है। ऐसे में प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि किसी भी प्रकार की सामग्री जारी करने से पहले परंपराओं और मान्यताओं का पूरा ध्यान रखा जाए।
2026 के कैलेंडर को लेकर उठा यह विवाद भले ही अनजाने में हुई गलती का नतीजा हो, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि आस्था से जुड़े मामलों में छोटी-सी चूक भी बड़ा रूप ले सकती है। मंदिर प्रशासन द्वारा माफी मांगना और कैलेंडर की बिक्री पर रोक लगाना एक जरूरी कदम माना जा रहा है। अब उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में ऐसी गलतियों से बचने के लिए और अधिक सतर्कता बरती जाएगी, ताकि श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस न पहुंचे और श्रीजगन्नाथ परंपरा की गरिमा बनी रहे।
डिस्क्लेमर: यह खबर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और आधिकारिक बयानों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि पाठकों तक तथ्यात्मक जानकारी पहुंचाना है।


