एकादशी पर चावल पाप, लेकिन पुरी में महाप्रसाद... क्या है ‘उल्टी एकादशी’ का रहस्य?

Ekadashi Vrat Katha: एकादशी पर चावल वर्जित क्यों है, और पुरी के जगन्नाथ मंदिर में क्यों चढ़ता है चावल? जानिए ‘उल्टी एकादशी’ की अनोखी कथा।

Jyotsana Singh
Published on: 14 Feb 2026 4:45 PM IST
एकादशी पर चावल पाप, लेकिन पुरी में महाप्रसाद... क्या है ‘उल्टी एकादशी’ का रहस्य?
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Ekadashi Vrat Katha: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना गया है। यह व्रत हर महीने दो बार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। एकादशी से जुड़े कई नियम हैं, जिनमें सबसे प्रमुख है कि, इस दिन चावल का सेवन करना वर्जित माना गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में एकादशी के दिन भी भगवान को चावल का महाभोग लगाया जाता है? इसी कारण वहां की एकादशी को ‘उल्टी एकादशी’ कहा जाता है। आइए जानते हैं इस व्रत का महत्व, इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और पुरी की अनोखी परंपरा का रहस्य-

किस देवता से जुड़ी है एकादशी तिथि?

एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। मान्यता है कि इस दिन सृष्टि के पालनहार विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में एकादशी व्रत का विस्तृत वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे, तब उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसने राक्षस ‘मुर’ का वध किया। वही शक्ति ‘एकादशी देवी’ के रूप में प्रसिद्ध हुई। इसलिए यह तिथि पापों के नाश और आत्मशुद्धि का प्रतीक मानी जाती है।

एकादशी पर चावल क्यों वर्जित माना गया है?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन चावल का सेवन करने से अगले जन्म में जीव को कीड़े-मकोड़े की योनि मिल सकती है। कहा जाता है कि चावल में जल तत्व की अधिकता होती है, जिससे मन में चंचलता और तामसिक प्रवृत्ति बढ़ती है। एकादशी का व्रत मन, वचन और कर्म की शुद्धि के लिए रखा जाता है, इसलिए इस दिन सात्विक भोजन या फलाहार किया जाता है।

कुछ ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, एकादशी चंद्रमा से संबंधित तिथि है और चावल भी चंद्र तत्व से जुड़ा है। ऐसे में इस दिन चावल का त्याग मानसिक संतुलन बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि जो लोग व्रत नहीं भी रखते, वे भी इस दिन चावल खाने से बचते हैं।

जगन्नाथ पुरी में क्यों चढ़ता है चावल?

पूरे भारत में जहां एकादशी पर चावल वर्जित है, वहीं जगन्नाथ मंदिर में भगवान को चावल का महाप्रसाद चढ़ाया जाता है। यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा विराजमान हैं। मंदिर में प्रतिदिन चार बार भोग लगाने की परंपरा है और भक्तों को ‘महाप्रसाद’ वितरित किया जाता है।

एकादशी के दिन भी यहां चावल से बने व्यंजन भगवान को अर्पित किए जाते हैं। इसी विशेष परंपरा के कारण पुरी की एकादशी को ‘उल्टी एकादशी’ कहा जाता है।

उल्टी एकादशी की पौराणिक कथा

कथा के अनुसार, एक बार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद ग्रहण करने पुरी आए। लेकिन उनके पहुंचने से पहले ही प्रसाद समाप्त हो चुका था। एक पत्तल पर थोड़ा-सा प्रसाद बचा था, जिसे एक कुत्ता चाट रहा था। ब्रह्मा जी की भक्ति इतनी सच्ची थी कि वे उसी कुत्ते के साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करने लगे।

तभी एकादशी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने ब्रह्मा जी से प्रश्न किया कि एकादशी के दिन आप चावल कैसे खा सकते हैं? तभी स्वयं भगवान जगन्नाथ प्रकट हुए और कहा, 'जहां सच्ची भक्ति होती है, वहां नियमों का बंधन नहीं होता।' भगवान ने यह भी कहा कि उनके महाप्रसाद पर एकादशी का नियम लागू नहीं होगा। कथा के अनुसार, भगवान ने एकादशी देवी को दंडस्वरूप उल्टा लटका दिया, जिससे पुरी में एकादशी का नियम ‘उल्टा’ हो गया। तभी से यहां एकादशी के दिन भी चावल का भोग लगता है और भक्त उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करते हैं।

एकादशी व्रत का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

एकादशी व्रत केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी लाभकारी माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, महीने में दो बार उपवास करने से शरीर की पाचन क्रिया को आराम मिलता है और विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। आध्यात्मिक रूप से यह व्रत आत्मसंयम, इंद्रिय-निग्रह और मन की शुद्धि का अभ्यास कराता है। भगवान विष्णु की आराधना से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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Jyotsana Singh is an Tech/Auto and Tourism Desk Content Writer at Newstrack.com.

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