नई दिल्ली एआई शिखर सम्मेलन से विकसित भारत की राहः वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत

AI Summit New Delhi 2026: नई दिल्ली में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन 2026 ने भारत की तकनीकी दिशा को नई गति दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य और उद्योग में वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ता आत्मनिर्भर भारत।

Yogesh Mohan
Published on: 21 Feb 2026 10:01 PM IST
AI Summit New Delhi 2026
X

AI Summit New Delhi 2026 (Image Credit-Social Media)

AI Summit New Delhi 2026: हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन ने भारत की तकनीकी दिशा को एक नया आयाम दिया। इस अवसर पर हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्पष्ट कहा कि आने वाला भविष्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का है। वास्तव में, आज संपूर्ण विश्व एआई को अपनाने के लिए उत्सुक है, क्योंकि आगामी वर्षों में इसका प्रभाव शिक्षा, कृषि, व्यापार, उद्योग, रक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाला है।

प्रधानमंत्री ने विश्व के अग्रणी एआई देशों को एक मंच पर आमंत्रित कर विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और उद्योगपतियों को संवाद का अवसर प्रदान किया। यह पहल केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की आकांक्षा का संकेत है। किंतु केवल आयोजन और भाषण पर्याप्त नहीं हैं; वास्तविक प्रगति के लिए ठोस अनुसंधान, निवेश और विश्वविद्यालयों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।


आज अमेरिका ने एआई अनुसंधान हेतु लगभग 500 अरब डॉलर का विशाल बजट निर्धारित किया है, जो विश्व में सर्वाधिक है। इसके मुकाबले भारत का निवेश अत्यंत सीमित है। यदि भारत को एआई में उच्च स्थान प्राप्त करना है, तो सबसे पहले अपने विश्वविद्यालयों को अनुसंधान का सशक्त केंद्र बनाना होगा। केवल नए विश्वविद्यालय खोलना सरकार का ध्येय नहीं होना चाहिए, बल्कि उनमें गुणवत्ता, शोध-संस्कृति और नवाचार को बढ़ावा देना भी अनिवार्य है।

वर्तमान में भारत एआई अनुसंधान में विश्व स्तर पर अपेक्षाकृत पीछे है। केवल घोषणाएँ और भाषण हमें अग्रणी नहीं बना सकते। इसके लिए प्रयोगशालाएँ, डेटा सेंटर, सुपरकंप्यूटिंग सुविधाएँ, उद्योग-सहयोग और शोधार्थियों को वित्तीय सहायता प्रदान करनी होगी। विश्वविद्यालयों में ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहाँ विद्यार्थी स्वतंत्र रूप से प्रयोग कर सकें और वैश्विक स्तर के शोधपत्र प्रकाशित कर सकें।

एक चिंताजनक तथ्य यह है कि प्रतिवर्ष लगभग 8 लाख भारतीय विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं, जिससे लगभग 12 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर चले जाते हैं। यदि हमारे विश्वविद्यालयों में विश्वस्तरीय शोध और नवाचार का वातावरण विकसित हो, तो न केवल यह धन देश में रहेगा, बल्कि भारत वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में उभर सकता है। गली-मोहल्लों में विश्वविद्यालय खोलने से समस्या का समाधान नहीं होगा; बल्कि शोध-आधारित उत्कृष्टता ही विद्यार्थियों को आकर्षित करेगी।

हमारी मानसिकता में भी परिवर्तन आवश्यक है। विदेशी शोध को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति समाप्त करनी होगी। अपने शोध पर गर्व करना और उसे वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करना ही आत्मनिर्भर भारत की पहचान बनेगा। विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में भारत को एआई के माध्यम से व्यापक सुधार की आवश्यकता है।


चीन ने एआई की सहायता से कृषि उत्पादन, ड्रोन निगरानी, स्मार्ट सिंचाई और डेटा-आधारित प्रबंधन को अपनाकर उल्लेखनीय प्रगति की है। भारत में भी यदि विश्वविद्यालय कृषि वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और डेटा विशेषज्ञों के साथ मिलकर कार्य करें, तो हम भी कृषि में अग्रणी बन सकते हैं।

कुछ उद्योगपति और नीति-निर्माता यह आशंका व्यक्त करते हैं कि एआई से बेरोजगारी बढ़ेगी। यह सत्य है कि कुछ पारंपरिक नौकरियाँ प्रभावित होंगी, किंतु साथ ही नई तकनीकी नौकरियों और उद्योगों का सृजन भी होगा। एआई आधारित रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, डेटा साइंस और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में नए अवसर उत्पन्न होंगे। विश्वविद्यालयों के द्वारा विद्यार्थियों को इन नई भूमिकाओं के लिए प्रशिक्षित करना होगा।

स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई एक नई क्रांति ला सकता है। रोगों की प्रारंभिक पहचान, मेडिकल इमेजिंग, दवा अनुसंधान और टेलीमेडिसिन में एआई की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि भारतीय भारतीय विद्यार्थी और शोधकर्ता एआई का सही उपयोग करें, तो भारत चिकित्सा क्षेत्र में विश्व को नई दिशा दे सकता है।

अंततः, हमें अपने विश्वविद्यालयों और विद्यार्थियों पर विश्वास करना होगा। उन्हें संसाधन, स्वतंत्रता और सहयोग प्रदान कर एआई आधारित नवाचार के लिए प्रेरित करना होगा। विश्वविद्यालयों को राजनीति से मुक्त कर शोध और राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत ज्ञान के मंदिर बनाना होगा।

यदि भारत अपने विश्वविद्यालयों को सशक्त बनाकर एआई को कृषि, उद्योग, शिक्षा और स्वास्थ्य से जोड़े, तो वह न केवल चीन जैसे देशों की बराबरी कर सकेगा, बल्कि वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की दिशा में भी अग्रसर होगा। यही विकसित और आत्मनिर्भर भारत की सच्ची परिकल्पना है।

योगेश मोहन

डा0 दीपा शर्मा

(कुलपति)

(21.02.2026 )

Yogesh Mohan
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mohan

Next Story