एक आधुनिक राष्ट्र, एक प्राचीन आत्मा: भारत का उदय और उससे उपजी वैश्विक असहजता

भारत का उदय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत है। आधुनिकता और प्राचीन सांस्कृतिक आत्मा के संगम से उपजा यह परिवर्तन वैश्विक विमर्श को चुनौती देता है।

Shashi Dubey
Published on: 2 Dec 2025 11:04 AM IST
Rising India
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Rising India (Image Credit-Social Media)

भारत आज अपनी सभ्यतागत यात्रा के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है — आर्थिक रूप से उभरता हुआ, भू–राजनीति में assertive (दृढ़ और स्पष्ट), और सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी।

लेकिन इस उभार के साथ एक नया प्रकार का प्रतिरोध भी सामने आ रहा है।

वैश्विक शक्ति–केन्द्र — चाहे वे वैचारिक संस्थाएँ हों, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार हों या सांस्कृतिक–औद्योगिक समूह — भारत के उस वैकल्पिक सामाजिक मॉडल से असहज हैं, जिसकी जड़ें परिवार, आत्म–संयम, अध्यात्म और अखंड पारिवारिक–नैतिक निरंतरता में निहित हैं, न कि अत्यधिक उपभोग और व्यक्तिवादी विखंडन में।

लेख में यह बताया गया है कि भारत के विरुद्ध एक सूक्ष्म नैरेटिव–युद्ध चलाया जा रहा है —

  • भारतीय त्योहारों को प्रदूषण से जोड़ा जाता है,
  • भारतीय भोजन को असुरक्षित बताया जाता है,
  • भारतीय अध्यात्म को अवैज्ञानिक कहा जाता है,
  • और संयुक्त परिवार को पिछड़ा सिद्ध करने की कोशिश की जाती है।

Rising India: फिल्मों, विज्ञापन उद्योग, मीडिया, अकादमिक संस्थानों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिये यह विमर्श धीरे–धीरे युवाओं की चेतना में उतारा जाता है, ताकि समाज की सांस्कृतिक नींव कमजोर पड़ने लगे और युवा पीढ़ी को अतिवादी व्यक्तिवाद तथा वैश्विक उपभोक्तावाद की ओर धकेला जा सके।

लेख का केंद्रीय तर्क है कि संघर्ष किसी राजनीतिक सत्ता से नहीं, बल्कि एक दर्शनिक टकराव से उपजा है।

भारत की सभ्यता संयम, पीढ़ियों के बीच के संबंध, और सामूहिक कल्याण को महत्व देती है —

जबकि पश्चिमी उपभोक्तावादी मॉडल का आधार है निरंतर इच्छा–उत्पादन, सम्पूर्ण व्यक्तिवाद, और मनुष्यों को एक–दूसरे से अलग–थलग करना।

इसीलिए भारतीय सांस्कृतिक पहचान को निशाना बनाया जाता है:

  • परिवार को कमजोर करो,
  • परंपराओं को तोड़ो–मरोड़ो,
  • आचार–विचारों को अवैध ठहराओ —
  • और समाज अपने–आप अस्थिर, दिशाहीन और बाहरी प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।

लेख यह प्रतिपादित करता है कि भारत की शक्ति किसी टकराव में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास में निहित है —

  • अपनी सभ्यतागत बुद्धि पर भरोसा,
  • स्वदेशी उद्योगों और विचारों का समर्थन,
  • और भारतीय परंपराओं की गहराई को समझना।

लेख का अंतिम संदेश यह है कि भारत का उदय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत उदय है —

और भारत की सबसे बड़ी सामर्थ्य यह है कि वह आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी प्राचीन आत्मा को जीवित रख सकता है।

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