भारत की महिलाएं कल को गढ़ रही हैं

महिला दिवस पर विचार: हिंसा और भेदभाव के बावजूद शिक्षा, आत्मनिर्भरता और साहस के बल पर भारतीय महिलाएं अपने अधिकार और भविष्य खुद गढ़ रही हैं।

Anshu Sarda Anvi
Published on: 8 March 2026 2:51 PM IST
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आठवीं की परीक्षा देकर घर लौट रही छात्रा का अपहरण कर तीन युवकों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार की कभी खबर आती है तो कभी कॉलेज जाती लड़कियों से छेड़छाड़ कर उन्हें असहज स्थिति में डाल दिया जाता है। होली पर भी हमने तमाम ऐसे वीडियो देखें जहां पर महिलाओं को उनकी अनुमति के बिना उन पर रंग डाला जा रहा था या स्पर्श किया जा रहा था। यह हमारा देश है जहां पर हर 20 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता है और उसकी रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की जाती है। मानसिक हिंसा, पारिवारिक हिंसा, घरेलू हिंसा, बैड टच जैसी घटनाओं की तो कोई गिनती ही नहीं है। कितनी अजीब बात है कि जहां आज सारा विश्व अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है, वहीं युद्धग्रस्त इजरायल, ईरान, उत्तर अफ्रीका, रूस, यूक्रेन जैसे देशों की महिलाएं अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा की प्रति आशंकित हैं। और युद्धग्रस्त क्षेत्रों में युद्ध के बाद की स्थिति तो और भी अधिक भयावह हो जाती है, जब इन महिलाओं के साथ पशुओं से भी अधिक दुर्व्यवहार होता है। उनका जिस तरह से दैहिक शोषण होता है, वह अमानवीयता की हद को पार कर जाता है, जिस पर बहुत कम लिखा गया होगा। गरिमा श्रीवास्तव ‌जैसी कुछ गिनी-चुनी लेखिकाओं ने इस पर अपनी कलम चलाई है। एपस्टीन फाइल्स के खुले सच से भी तो महिलाओं, बच्चियों के ऊपर शोषण की कहानी जिस तरह से खुली, लगा सांसें रुकती हुई महसूस हुई, बेचैनी महसूस हुई। इस तरह की कितनी ही एपस्टीन फाइल्स के छोटे वर्जन हमारे अपने देश में हर रोज दफन होते हैं। पर इस भागती हुई दुनिया में कौन, कितने दिन उस शोषण को याद रखेगा। जर और जमीन की लड़ाई में क्या विकसित, क्या विकासशील देश सब एक ही थाली के चट्टे -बट्टे होते हैं।

एक तरफ जहां महिला दिवस मनाने का ढोल पीटा जा रहा है,जूम पर संगोष्टियां हो रही हैं, महिला संस्थाएं एक कार्यक्रम करके अपना नाम कर रही हैं। नारी सशक्तिकरण के नाम पर सभी संस्थाएं इस तरह के विभिन्न कार्यक्रमों को करके अपने ही मुख पर सुनहरा मुलम्मा चढ़ा ले रही हैं। कोफ्त होती है इन्हें देखकर कि हम आज भी इस सजावटीपन के मोहजाल ‌ से बाहर नहीं निकले हैं। तमाम औपचारिक, सजावटी कार्यक्रमों के जाल में किस संस्था से अपेक्षा करें कि वह महिलाओं को उनकी जमीन खुद बनाने के लिए मजबूती से खड़ा कर सकेंगी।

हमारी पीढ़ी ने साड़ी से सूट तक के बदलाव का भी सफर देखा है तो रिक्शा और दूसरों के द्वारा चलाई जा रही गाड़ियों से सेल्फ ड्राइविंग तक का भी सफर तय किया है। अपनी पढ़ाई के लिए उस समय जद्दोजहद की है जब साथ पढ़ने वाली लड़कियों की शादी कक्षा 12 के बाद, जब उसके लिए अच्छा लड़का मिल जाए, कर दी जाती थी और यह समय भी देख रहे हैं जब शादी के लिए न करती लड़कियां सामने आती हैं। दादी -नानी और फिर मां, फिर खुद ने भी चक्की चलाने का दौर देखा है तो अभी वे हाथ कंप्यूटर चलाते भी देखे हैं। यह कहना बेमानी होगा कि समय नहीं बदला है। समय बहुत बदला है। लड़कियां सिर्फ साक्षर ही नहीं हो रही है बल्कि खुद के जीवन को अपनी तरह से जीना भी सीख रही हैं। जहां शाम ढले महिलाएं अपने घर में घुस जाती थीं, वहीं देर रात तक शराब की दुकानों से लड़कियों, महिलाओं को शराब खरीदते भी देखते हैं। यह अलग बात है कि हम में से किसी के लिए वह सही और किसी के लिए वह बात गलत नजरिया रखती है।‌ अपने हक के लिए लड़तीं महिलाएं देखीं हैं तो नशे की हालत में दुर्घटनाएं करतीं , गालियां देतीं, झगड़ा करती महिलाएं भी हैं। समानता के नाम पर सब कुछ सही है कहने वाले लोग कहीं जबरदस्ती तो कहीं शौक से इन महिलाओं को बदलना चाहते हैं या यह महिलाएं खुद बदलती हैं , वह भी देखा है। बगावत करती स्त्री का साथ न देने वाली एक उदासीन चुप्पी भी देखी है।

साक्षर होती इस दुनिया में स्त्रियों का सुरक्षित रहना कितना मुश्किल है, यह भी देखा है तो हर रोज कभी पीने के पानी के लिए लंबी कतारों में खड़ी महिला, तो कभी मीलों दूर से चलकर परिवार के लिए पीने का पानी लाने को संघर्ष करती स्त्री को भी देखा है। घर को संवारने के लिए काम करती स्त्री को भी देखा है तो घर में चुपचाप जुल्म सहती स्त्री को भी देखा है। स्त्रियों को चाहिए कि रिझाने में, रीझने में अपना समय व्यर्थ करने की जगह सीखने में अपना समय लगाएं। बोलतीं, प्रश्न करतीं , अपने निर्णय खुद लेती स्त्रियां कभी भी किसी को पसंद नहीं आती पर जब एक स्त्री अपने इस भय के माहौल से बाहर निकाल कर आती है तभी वह इतिहास लिख पाती है। भले ही अभी सूर्योदय हुआ है और अभी इस संघर्ष में बहुत आगे, नंगे पैर चलकर एक स्त्री को अपनी पहचान को पकड़ने की हर कोशिश करनी है पर इसे किया जाना चाहिए। हमारे देश में तो स्त्रियों को देवी की अवधारणा से सज्जित किया जाता है पर हमने कभी भी उनमें स्त्री अस्तित्व की खोज नहीं की है। हमने उन्हें अलंकारिक उपमा दी है, महान बनाया है, उसकी पीड़ा को उसके आत्मोसर्ग को, उसकी कुर्बानियों के महत्व को न समझ उसको महानता के दायरे में खड़ा कर दिया है। वही उसकी कुर्बानियों का मोल लगाया है पर क्या उससे उसके जीवन की जड़ता खत्म हुई है? क्या उसे अपने जीवन में एक खुली हवा में सांस लेने का अधिकार नहीं है? आश्चर्य होता है उन स्त्रियों पर जो स्त्री सशक्तिकरण के नाम पर, महिला दिवस मनाने के नाम पर क्लबों में शराब के जाम टकराती हैं, रील्स बनाती हैं , अच्छा है पर वैचारिकी के नाम पर उनके लिए स्त्री संस्कृति मात्र एक छलावा है। इसलिए महिला संस्कृति या विमर्श पर आडंबरपूर्ण आयोजनों को करने का क्यों स्वांग किया जाता है? क्यों उनको घर जाकर या कार्यक्रम में सम्मानित करते हैं जिन्होंने अपने परिवार को चलाने के लिए कितना त्याग किया, उसका महत्व बताकर आप आगे आने वाली पीढ़ी को किस तरह के उदाहरण देकर जाना चाहते हैं। उनकी आर्थिक परतंत्रता उनकी मजबूरी थी इसलिए वे उस तरह से जी रही थीं पर जब आर्थिक स्वतंत्रता है तब स्त्री को अपने निर्णय लेने में और अधिक समावेशी बनाना चाहिए और अधिक सहयोगी बनना चाहिए। उस तरह के उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए।

8 मार्च के बाद जब महिला दिवस के आयोजनों का शोर थम जाएगा तब वही ढाक के तीन-पात नजर आएंगे। न्याय की एक दिन बड़ी-बड़ी बातें होने के बाद वही 'अस्सी 'की बलात्कार पीड़िता की भांति अपने को इंसाफ दिलाने के लिए स्त्री लड़ती मिलेगी, जूझती मिलेगी और अधिकांशत हारती मिलेंगी। यह समाज घर छोड़ने वाली स्त्रियों पर घात लगाए बैठा होता है। ए आई से बनाए गए फेक वीडियो भी एक महिला की जिंदगी बर्बाद कर जाते हैं। घर की देहरी के अंदर जब तक उसे सम्मान नहीं मिलेगा, बाहर सम्मान नहीं मिलेगा तब तक महिला दिवस मनाने की बातें बेमानी हैं। और स्त्रियों को भी चाहिए कि अपनी मानसिकता में खुलापन लाए। मांगने की जगह अपने लिए, अपनी जगह स्वयं अर्जित करें। खुलापन का अर्थ ‌ कभी भी भोंडेपन या दिखावेबाजी से नहीं बल्कि अपने लिए सृजनात्मक और सकारात्मक बनने से हैं । प्रसिद्ध ‌ छायावादी लेखिका महादेवी वर्मा ‌ ने महिलाओं पर बहुत लिखा था। वह महिलाओं के लिए अपना आकाश चाहती थीं और कहती थींं कि ”दर्पण का उपयोग तभी तक है जब तक वह किसी दूसरे की आकृति को अपने हृदय में प्रतिबिंबित करता रहा है वरना लोग उसे निरर्थक जानकर फेंक देते हैं। पुरूष के बगैर सोचे-समझे नकल ने स्त्री के व्यक्तित्व को अपना दर्पण बनाकर उसकी उपयोगिता तो सीमित कर ही दी। साथ ही समाज को भी अपूर्ण बना दिया।”

हताशा से बाहर निकले, साथ मिलकर आवाज़ उठाएं और कुछ अच्छा करें। तभी कह सकेंगे कि भारत की महिलाएं कल को गढ़ रही हैं।

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