भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी का फतवा और पार्टी के भीतर उठते सवाल

किसी के चलाए तीर को पकड़ कर भाजपा की पीठ में गाड़ दिया, पिंकी, पंकज, पंकज चौधरी से अध्यक्ष जी तक की दिलचस्प यात्रा

Sanjay Tiwari
Published on: 27 Dec 2025 9:24 PM IST
भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी का फतवा और पार्टी के भीतर उठते सवाल
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भाजपा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष पंकज चौधरी ने किसी अंजान तीर को पकड़ कर भाजपा की पीठ में ही गाड़ दिया है। सामान्य ब्राह्मण जो कभी जाति की राजनीति नहीं करता, इस समय भाजपा का ही दुश्मन दिख रहा है। जातियों के सम्मेलन और विमर्श करने वाली पार्टी के इस नए अध्यक्ष को कुछ ब्राह्मण विधायकों की एक छोटी बैठक इतनी नागवार गुजरी कि तत्काल फतवा जैसा पत्रक जारी कर गंभीर चेतावनी दे डाली। परिणाम इतना भयावह है कि तीन दिन में यह मुद्दा सरकार में ब्राह्मणों की उपेक्षा से बहुत आगे निकल कर भाजपा के विरोध का स्वरूप लेने लगा है। नए अध्यक्ष जी के चयन में किसी सलाहकार ने पार्टी हाई कमान को गजब का गच्चा दिया है। संगठन का दूर दूर तक अनुभव नहीं रखने वाले कुर्मी जाति के नाम से बली बताए जाने वाले इस नेता पर लगाया गया दांव महंगा पड़ने वाला हो सकता है।

लखनऊ में 24 दिसंबर की रात विधायकों की जुटान की वजह चाहे जो रही हो, अध्यक्ष जी ने किसी अन्य के चलाए तीर को पकड़ कर सीधे पार्टी की पीठ में ही गाड़ दिया है। याद कीजिए , 2007 में विधानसभा चुनाव बीत जाने के बाद तक किसी को अंदाजा नहीं था कि मायावती जी सरकार बना सकती हैं। परिणाम अचानक पलट गए थे। इसके पीछे ब्राह्मण ही थे। सतीश चंद्र मिश्र के वे सम्मेलन याद कर सकते हैं। इसी तरह 2011 में अखिलेश यादव की ताजपोशी को भी याद कीजिए। उस बार भी ब्राह्मण ही थे।

अब भाजपा के इस अध्यक्ष जी को पता नहीं कुछ याद भी है या नहीं। साल था 1989, गोरखपुर में नगर निगम का चुनाव। हैंड पंप चुनाव चिह्न पर पार्षद का चुनाव लड़ने आया एक नौजवान। दोस्तों में उसे सब पिंकी कहते थे। कुछ कहते थे पंकज। आज वह पंकज चौधरी हैं। केंद्र सरकार में मंत्री हैं। उत्तर प्रदेश भाजपा के शिखर पुरुष बनाए गए हैं। पिंकी से पंकज चौधरी तक के सफर की अनेक कथाएं हैं। सब कही नहीं जा सकती। इतना याद है कि 1989 के उस चुनाव में अपने क्षेत्र के घरों में हैंड पंप लगवाने में वह बहुत तेज थे। जीत कर निगम के सदन पहुंचे तो सौभाग्य और सुयोग से डिप्टी मेयर भी बने।

खैर, यह बहुत पुरानी बात हो गई। इनका संयोग देखिए कि केवल दो साल बाद ही पंकज चौधरी के रूप में महराजगंज लोकसभा सीट से इनको भाजपा से टिकट मिला और राम लहर में लोकसभा पहुंच गए। सिक्का जम गया। उस समय रमापति राम त्रिपाठी के नेतृत्व में गोरखपुर में भाजपा अपनी जड़ें जमा रही थी। कहा जाता है कि रमापति जी ने ही पंकज को भाजपा में दाखिला दिया और लगातार उन्हें निर्देशित करते रहे। 1991 के बाद से अब तक पंकज को केवल दो लोकसभा चुनावों में पराजय मिली है। इस बीच उनकी ताकत ऐसी हुई कि उनकी माता जी महाराज गंज से जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं। उनके भाई प्रदीप चौधरी भी जिला पंचायत अध्यक्ष हुए। उनकी एक बहन सिद्धार्थ नगर से जिला पंचायत अध्यक्ष हुईं। उनके बहनोई विधायक बने। उनके एक बहनोई नेपाल में सांसद और मंत्री बने।

पंकज चौधरी ने कभी किसी आंदोलन का नेतृत्व किया हो या भाग लिया हो, ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। भाजपा संगठन में उनकी किसी प्रकार की भूमिका भी कभी नहीं रही है। वे सीधा प्रदेश अध्यक्ष ही बने हैं।

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

Sanjay Tiwari
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Sanjay Tiwari

लेखक भारत संस्कृति न्यास के अध्यक्ष और संस्कृति पर्व के संपादक हैं।

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