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महिला पत्रकारों और उद्घोषिकाओं का बदलता संसार
सरला माहेश्वरी से आज की आक्रामक एंकरिंग तक: मीडिया में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, संघर्ष, लैंगिक नजरिया और नेतृत्व में सीमित प्रतिनिधित्व पर लेख
woman journalists (Photo: Social Media)
हाल ही में दूरदर्शन की प्रसिद्ध, वरिष्ठ समाचार प्रस्तोता सरला माहेश्वरी का निधन हुआ। वह उस समय की समाचार उद्घोषिका थीं, जब दूरदर्शन एकमात्र सरकारी चैनल हुआ करता था। वह धीरे-धीरे चलने वाले भारत का दौर था, खबरों में गंभीरता पर जोर था और किसी भी तरह की गला-काट प्रतियोगिता भी नहीं थी। मासिक, साप्ताहिक पत्रिकाएं आती थीं, साप्ताहिक अखबार निकलते थे, दैनिक अखबार आते थें। प्रिंट मीडिया के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी स्वीकार करने लगे थे और किसी भी तरह के ब्रेकिंग न्यूज़ का चलन नहीं था। तब लड़कियों का एक वर्ग शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ने को तैयार हो रहा था और उसके सपने भी बड़े हो रहे थे। एक बड़ा प्रतिशत लड़कियों का सपना देखने की, कुछ करने की आजादी चाहता था। और यह उनके अंदर अंगड़ाई लेने लगा था कि वे उन महिलाओं को अपना आदर्श मानने लगीं थीं जो कि उस समय एकमात्र आने वाले चैनल दूरदर्शन पर एंकर के रूप में दिखाई देने लगीं थीं। हालांकि उस समय में महिलाएं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश तो कर चुकीं थीं, लेकिन इसे आकार देने या नया रूप देने में उनका कोई महत्वपूर्ण हस्तक्षेप नहीं रहा। समाज और परिवार भी लड़कियों को उतना जरूर पढ़ाना चाहते थे कि उन्हें एक अच्छा परिवार और वर मिल जाए। धीरे-धीरे करके उन्हीं लड़कियों का एक प्रतिशत विभिन्न प्रोफेशनों जैसे मेडिकल, इंजीनियरिंग, चार्टर्ड अकाउंटेंट, शिक्षक, प्रोफेसर आदि में आगे बढ़ता गया और आज विभिन्न क्षेत्रों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत है।
तब से अब तक देश की मीडिया में भी बहुत बदलाव आ चुका है और उस समय की शांत, सहज, सरल भाषा में समाचारों को प्रस्तुत करने वाली महिला एंकरों में भी अब धीरे-धीरे करके बहुत बदलाव आ चुके हैं। उन महिला एंकरों कि सादगी भरी पोशाक भी अब बदल कर आधुनिक हो गई है। उनमें अब आक्रामकता आ गई है, वे अब जिरह-बहस करने लगी हैं। वे सिर्फ प्रस्तोता के रूप में नहीं बल्कि कार्यक्रमों का संचालन करने वाली हो गई हैं। इधर-उधर के प्रश्न करती हैं, दूसरों को उतना ही स्पेस देतीं हैं कि कोई उन पर हावी न हो और उन्हें किस तरह से अपनी बात को रखना है, यह वे अच्छी तरह से जानती भी हैं। अब न्यूज़ रूम में जो सहभागिता पुरुष और महिला कर्मियों की 90 और 10% के अनुपात में हुआ करतीं थीं , उस पारंपरिक पुरुष प्रधान क्षेत्र में महिलाएं अब 50- 50% के अनुपात पर आ गईं हैं। फिर भी उन समर्पित महिला पत्रकारों या एंकरों का प्रतिशत कम है, जिनकी अपनी एक आईडियोलॉजी हो या वे अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका या निर्णय लेने वाली भूमिका रखतीं हों।
जब हम दूरदर्शन के उस समय की बात करते हैं, जब
अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं के समाचार महिला प्रस्तोता पढ़ा करतीं थीं और रविवार को मूक-बधिरों के लिए भी विशेष समाचार पढ़ा करतीं थीं। उस समय में गीतांजलि अय्यर अंग्रेजी की प्रथम प्रस्तोता रहीं। प्रतिमा पुरी दूरदर्शन की पहली समाचार प्रस्तोता मानीं जाती हैं, जो अपनी मधुर और दृढ़ आवाज में देश भर के घर-घर में सुनीं जातीं थीं। नीति रविंद्रन अंग्रेजी में समाचार पढ़तीं थीं और अपने शुद्ध उच्चारण के चलते इलीट क्लास में काफी पसंद की जातीं थीं। उषा अल्बुकर्क , रिनी साइमन खन्ना दूरदर्शन पर अंग्रेजी समाचार प्रस्तुत करतीं थीं। हिंदी भाषा की प्रमुख समाचार वाचिकाओं में शोभना जगदीश, नीलम शर्मा, सरला माहेश्वरी, मीनू तलवार, मंजरी जोशी, अविनाश कौर सरीन अपनी बड़ी सी बिंदी, सादगी और साड़ी पहनने के अंदाज तथा चेहरे के चमक के साथ एवं बालों में गुलाब लगाए सलमा सुल्तान आदि अपनी भाषा की शुद्धता और बेहतरीन प्रस्तुतीकरण के कारण लाखों लोगों द्वारा पसंद कीं जातीं थीं। वे बिना चिल्लाए, शांत भाव से समाचार पढ़ती थीं और उन्होंने पत्रकारिता में विश्वसनीयता स्थापित की। तब दूरदर्शन के समाचार न केवल सटीक जानकारी का स्रोत थे, बल्कि समाचार वाचकों को सम्मान के साथ पसंद भी किया जाता था। उन समाचार एंकरों की अपनी कोई आइडियोलोजी भले ही न रही हो, पर यह वह समय था जब लड़कियां, महिलाएं अपने भाई, पिता या पति के सहारे के बिना चलने का साहस कर रहीं थीं और अपने लिए एक नई दिशा तलाश कर रहीं थीं। अब भी वे अपने लिए परिवार बना रही हैं, एक नया फैमिली सिस्टम बना रही हैं।
इन लड़कियों, महिलाओं को भी सहजता और सम्मान से देखें। समाचार पढ़ते हुए वे अपना प्रोफेशन कर रही होती हैं। इस मेल गेज से समाज को मुक्त होना होगा, जिस समाज में सब कुछ छुपा कर रखने की प्रवृत्ति है वहां पर इनका खुलापन स्वीकार नहीं किया जा पाता है। लड़कियों, महिलाओं के साथ बराबरी का व्यवहार करें। मीडिया में कई जगहों पर पुरूषों की इस कारण नौकरी भी गई कि उन्होंने लड़कियों या महिलाओं के साथ में अभद्र व्यवहार करने का प्रयास किया। जब लड़कियां पहली बार घर से बाहर निकलतीं हैं तो उन्हें मेल गेज का सामना करना पड़ता है और उनके विषय में अफवाहें भी ज्यादा चलती हैं। लेकिन यह जो पुरुषवादी प्रवृत्ति है वह हमारे समाज के द्वारा ही बनाई हुई है। लड़कियां या महिलाएं अब अपना रास्ता खुद बनाना जानती हैं। वे जानती हैं कि उन्हें कब न कहना है और कब हां कहना है।
आज के आक्रामक और बहस-प्रधान मीडिया परिदृश्य में ऊँची आवाज़, तीखे सवाल और आक्रामक डिबेट आवश्यता बन गए हैं। ऐसे समय में मृणाल पांडे हिंदी दैनिक 'हिंदुस्तान' की पहली महिला मुख्य संपादक बनीं । उसके साथ ही क्षमा शर्मा, रीता चौधरी, अंजना ओम कश्यप, श्वेता सिंह, रूबिका लियाकत, ऋचा अनिरुद्ध,पालकी शर्मा उपाध्याय , निधि राजदान, बरखा दत्त,नलिनी सिंह श्वेता सिंह जैसी बहुत सी महिला पत्रकारों ने अपना स्थान बनाया है। पिछले 30 वर्षों में महिला समाचार एंकरिंग और पत्रकारिता जगत में काफी प्रगति हो चुकी है। महिलाओं की भागीदारी भी मीडिया में बड़ी है, विशेषकर अंग्रेजी मीडिया में। उच्च -मध्यम वर्ग की लड़कियां अच्छी शिक्षा और पारिवारिक सहयोग के कारण आने लगी हैं, जबकि छोटे शहरों में रहने वाली लड़कियों के सपने बड़े होने पर भी उनके पास अभी भी सीमित विकल्प हैं। संसाधनों की सीमितता की बात अब पहले जैसी नहीं रही है। हर आदमी के पास मोबाइल ने उस सीमितता को खत्म किया है बशर्ते कि आपके पास में विषय और सामग्री स्तरीय हो और विविधतापूर्ण प्रस्तुति हो। पहले मीडिया में महिलाएं सबसे सुरक्षित विकल्प यानी डेस्क पर काम करना या समाचार एंकरिंग करना चुनती थीं ।हालांकि वहां पर प्रगति के अवसर सीमित होते थे पर चुंकि उनके अभिलाषाएं भी सीमित थी और उनके विषय भी सीमित थे तो भे फील्ड रिपोर्टिंग नहीं करती थीं। पर अब अंग्रेजी मीडिया में इसका चलन बढ़ चुका है कुछ क्षेत्रीय भाषा के मीडिया समूहों में भी इसका चलन बड़ा है पर हिंदी मीडिया में आज भी उदासीनता है।
असम की प्रिंट मीडिया में समीम सुल्ताना अहमद , सीमा देवी, बैजयंती रानी दास , संगीता बरुआ पिशारोती जिन्हें 2025 में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की पहली महिला अध्यक्ष के रूप में चुना गया है, अस्मिता साहा , सुष्मिता गोस्वामी,अनुभा भोंसले, जिन्होंने पूर्वोत्तर में संघर्ष और हाशिए के समुदायों की रिपोर्टिंग में विशेषज्ञता हासिल की है,चंद्रानी सिन्हा ,नीलम पांडे , गरिमा शर्मा निभा रानी रॉय आदि काम कर रहीं हैं।
असम में महिला पत्रकारों ने एक फोरम बनाया है जिसमें इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया की कई महिलाएं उच्च स्तर पर कार्य कर रही हैं। जबकि असम के हिंदी मीडिया में ऐसा कोई विशेष उल्लेखनीय नाम नहीं है ।
सैटेलाइट टीवी और निजी चैनलों के आने से एंकरिंग में बदलाव आया। अब एंकर सिर्फ खबर पढ़ती नहीं बल्कि रिपोर्टिंग भी करती हैं। महिला पत्रकार 'वॉर रिपोर्टिंग' (युद्ध कवरेज) और 'पॉलिटिकल डिबेट' और आर्थिक मुद्दों पर बहस में भी आगे आईं। बरखा दत्त जैसी पत्रकारों ने फ्रंटलाइन रिपोर्टिंग की नई इबारत लिखी। दरअसल महिला पत्रकार आज भी अपने विषय में अधिक अध्ययन की जहमत नहीं उठाती हैं, आंकड़ों की तो बात ही छोड़ देते हैं। वास्तविक अनुभूति या अनुभव या किसी विषय या दर्द को सचमुच समझ कर लिख पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है, चाहे वह सामाजिक या पारिवारिक रिश्ते हों, प्रतिष्ठा हो या और बहुत कुछ। और यह रिस्क आज भी महिलाएं चाह कर भी नहीं उठा पातीं विशेषकर अगर उनकी स्थिति वैवाहिक हुई तो। इसलिए वे पुरुष पत्रकारों के मुकाबले कम भरोसेमंद हो जातीं हैं। साथ ही महिला एंकरों को अक्सर उम्र और दिखावट को लेकर अधिक जांच का सामना करना पड़ता है। बहुत जरूरी है कि महिलाओं को इस क्षेत्र में भी ऊंचे निर्णय लेने वाले पदों पर स्वीकार किया जाए। उस दौर से आज तक महिलाओं ने अपने लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी है, उसको मान्यता दी जाए।


