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Exam System Crisis: जब परीक्षा व्यवस्था स्वयं परीक्षा में असफल होने लगे?
Exam System Crisis: पेपर लीक, तकनीकी खामियों और जवाबदेही के अभाव ने परीक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। अब सुधार केवल तकनीकी नहीं, नैतिक भी होने चाहिए।
जब परीक्षा व्यवस्था स्वयं परीक्षा में असफल होने लगे? (Photo- Social Media)
Exam System Crisis: रात के दो बजे हैं। देश के किसी छोटे शहर में एक विद्यार्थी अभी भी जाग रहा है। मेज पर खुली हुई पुस्तकें हैं, दीवार पर समय-सारिणी चिपकी है और मोबाइल फोन महीनों से लगभग निष्क्रिय पड़ा है। घर के बाकी सदस्य सो चुके हैं, पर उसकी आँखों में नींद नहीं, भविष्य है। वह अकेला नहीं है।
भारत में हर वर्ष लगभग चार करोड़ विद्यार्थी विभिन्न बोर्ड, प्रवेश और प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठते हैं। केवल सीबीएसई बोर्ड परीक्षाओं में 40 लाख से अधिक और नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा में 20 लाख से अधिक विद्यार्थी भाग लेते हैं। इन संख्याओं के पीछे केवल आँकड़े नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की आकांक्षाएँ, त्याग और संघर्ष छिपे हुए हैं। इसीलिए भारत में परीक्षा कभी केवल परीक्षा नहीं रही। यह योग्यता और अवसर के बीच का सबसे महत्वपूर्ण पुल रही है। लेकिन आज यही पुल दरकता हुआ दिखाई दे रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं का रद्द होना, तकनीकी विफलताएँ, मूल्यांकन संबंधी विवाद और परीक्षा प्रबंधन पर उठते प्रश्न यह संकेत दे रहे हैं कि समस्या किसी एक संस्था या एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। हम एक गहरे संस्थागत संकट के सामने खड़े हैं,विश्वास के संकट के सामने। स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह रही कि उसने शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से सामाजिक गतिशीलता का रास्ता बनाया।
किसी गाँव का साधारण छात्र डॉक्टर बन सकता है। किसी किसान की बेटी प्रशासनिक अधिकारी बन सकती है। किसी मजदूर का बेटा राष्ट्रीय संस्थानों तक पहुँच सकता है। इस व्यवस्था की सफलता का आधार केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि विश्वास है।
यदि किसी परीक्षा में बैठा विद्यार्थी यह मानता है कि उसकी मेहनत ही सफलता का निर्धारण करेगी, तब वह वर्षों तक संघर्ष करता है। लेकिन यदि उसे यह लगने लगे कि परिणाम योग्यता से अधिक व्यवस्था की कमजोरियों पर निर्भर हैं, तो पूरी प्रणाली का नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है।
यही कारण है कि परीक्षा प्रणाली पर संकट केवल शिक्षा का संकट नहीं होता; वह सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अवसर का संकट भी बन जाता है। पिछले दशक में सरकारों ने डिजिटल तकनीक को पारदर्शिता का पर्याय मान लिया है। ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल मूल्यांकन, कंप्यूटर आधारित परीक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण को आधुनिकता की पहचान माना गया।
लेकिन एक मूल प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है,क्या तकनीक स्वयं भरोसा पैदा करती है? नहीं! तकनीक केवल एक उपकरण है। उसका चरित्र उस व्यवस्था से तय होता है जो उसे संचालित करती है।
यदि टेंडर प्रक्रिया अपारदर्शी हो, यदि साइबर सुरक्षा की स्वतंत्र जाँच न हो, यदि शिकायतों को गंभीरता से न लिया जाए और यदि तकनीकी परियोजनाओं की निगरानी केवल कागजों पर हो, तो अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर भी अविश्वास पैदा कर सकता है।
सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली को लेकर उत्पन्न विवाद इसी व्यापक समस्या की ओर संकेत करता है। प्रश्न केवल तकनीकी नहीं हैं। प्रश्न यह हैं कि इतने बड़े पैमाने पर लागू होने वाली प्रणाली के लिए निगरानी तंत्र कितना सक्षम था, जोखिम मूल्यांकन कितना गहन था और जवाबदेही कितनी स्पष्ट थी।
जब एक छात्र व्यवस्था से बड़ा दिखाई देने लगे तो क्या ही कहा जाए
हाल के घटनाक्रम का सबसे असाधारण पक्ष यह नहीं कि विवाद हुआ। असाधारण पक्ष यह है कि अनेक प्रश्न एक छात्र द्वारा सार्वजनिक रूप से उठाए गए।
यह घटना प्रतीकात्मक है। यह बताती है कि सूचना के इस युग में नागरिक अधिक जागरूक हो रहा है, लेकिन साथ ही यह भी बताती है कि संस्थागत सतर्कता कहीं न कहीं कमजोर पड़ी है। सवाल यह नहीं कि किसी छात्र ने प्रश्न क्यों उठाया।
सवाल यह है कि वे प्रश्न पहले किसी निगरानी समिति, किसी तकनीकी ऑडिट या किसी प्रशासनिक समीक्षा में क्यों नहीं उठे? जब व्यवस्था के बाहर खड़ा व्यक्ति व्यवस्था के भीतर बैठे लोगों से अधिक सजग दिखाई देने लगे, तब समस्या व्यक्ति की नहीं, प्रणाली की होती है।
भारत में चिकित्सा शिक्षा केवल एक पेशा नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक सुरक्षा का माध्यम भी मानी जाती है। यही कारण है कि लाखों विद्यार्थी वर्षों तक नीट की तैयारी करते हैं।
कोचिंग उद्योग का आकार अब हजारों करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है। अनेक परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा बच्चों की तैयारी पर खर्च करते हैं। कुछ विद्यार्थी घर छोड़कर कोटा, दिल्ली, पटना, प्रयागराज और हैदराबाद जैसे शिक्षा केंद्रों में वर्षों तक रहते हैं।
ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो उसका प्रभाव केवल परिणामों पर नहीं पड़ता। उसका प्रभाव मनोविज्ञान पर पड़ता है। एक छात्र अपनी मेहनत पर संदेह नहीं करता, लेकिन वह व्यवस्था पर संदेह करना शुरू कर देता है। और किसी भी राष्ट्र के लिए इससे अधिक खतरनाक स्थिति नहीं हो सकती।
प्रशासनिक विफलता की चार परतें
इन घटनाओं को केवल तकनीकी त्रुटि मान लेना वास्तविक समस्या से आँखें मूँद लेना होगा।
पहली समस्या है, जमीनी वास्तविकता से दूरी। निर्णय अक्सर उन कमरों में लिए जाते हैं जहाँ आँकड़े पहुँचते हैं, अनुभव नहीं।
दूसरी समस्या है,अनुपालन संस्कृति। हमारे यहाँ यह देखने की प्रवृत्ति अधिक है कि नियमों का पालन हुआ या नहीं; यह देखने की प्रवृत्ति कम है कि परिणाम सही निकला या नहीं।
तीसरी समस्या है, तकनीकी निर्भरता। अनेक प्रशासनिक अधिकारी उत्कृष्ट नीति-निर्माता होते हैं, लेकिन साइबर सुरक्षा, डिजिटल संरचना और डेटा गवर्नेंस की जटिलताओं को समझने के लिए उन्हें विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता है।
चौथी और सबसे गंभीर समस्या है,जवाबदेही का अभाव।
जब सफलता का श्रेय संस्थाएँ लेती हैं, तो विफलता की जिम्मेदारी भी संस्थाओं को ही लेनी चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे यहाँ अक्सर इसका उल्टा होता है।
परीक्षा उद्योग का बढ़ता आकार और घटता विश्वास
भारत का परीक्षा तंत्र अब एक विशाल आर्थिक संरचना भी बन चुका है। आवेदन शुल्क, परीक्षा एजेंसियाँ, कोचिंग उद्योग, डिजिटल प्लेटफॉर्म, मूल्यांकन प्रणालियाँ और तकनीकी वेंडर,सभी मिलकर हजारों करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था का निर्माण करते हैं। लेकिन किसी भी व्यवस्था की वास्तविक पूँजी पैसा नहीं होती। उसकी वास्तविक पूँजी विश्वास होता है। बैंकिंग व्यवस्था विश्वास पर चलती है। न्याय व्यवस्था विश्वास पर चलती है। लोकतंत्र विश्वास पर चलता है। और परीक्षा व्यवस्था भी विश्वास पर ही चलती है। जिस दिन यह विश्वास कमजोर पड़ जाता है, उसी दिन पूरी संरचना भीतर से खोखली होने लगती है।
सुधार केवल तकनीकी नहीं, नैतिक भी होने चाहिए
आज आवश्यकता केवल नई तकनीक लाने की नहीं है। आवश्यकता है कि प्रत्येक राष्ट्रीय परीक्षा के लिए स्वतंत्र साइबर ऑडिट अनिवार्य हो। प्रत्येक तकनीकी अनुबंध सार्वजनिक समीक्षा के लिए उपलब्ध हो।
प्रमुख परीक्षाओं की सुरक्षा व्यवस्था का समय-समय पर बाहरी विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण किया जाए। और सबसे महत्वपूर्ण,विफलताओं के लिए स्पष्ट व्यक्तिगत जवाबदेही निर्धारित की जाए। लोकतंत्र में विश्वास घोषणाओं से नहीं लौटता।
विश्वास पारदर्शिता और जवाबदेही से लौटता है। भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। आने वाले वर्षों में यही युवा शक्ति भारत की आर्थिक, वैज्ञानिक और सामाजिक प्रगति का आधार बनेगी।
लेकिन कोई भी राष्ट्र केवल युवाओं की संख्या से महान नहीं बनता। वह युवाओं के विश्वास से महान बनता है। यदि एक विद्यार्थी यह विश्वास खो देता है कि उसकी मेहनत का सम्मान होगा, तो राष्ट्र अपनी सबसे मूल्यवान पूँजी खो देता है। इसलिए आज प्रश्न केवल सीबीएसई, नीट या किसी एक परीक्षा का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी युवा पीढ़ी को यह भरोसा दिला पा रहा है कि योग्यता का सम्मान होगा, मेहनत का मूल्य मिलेगा और व्यवस्था निष्पक्ष रहेगी?
यदि उत्तर 'हाँ' है, तो सुधारों को तत्काल और कठोर होना होगा। यदि उत्तर 'नहीं' है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि संकट परीक्षा का नहीं, व्यवस्था का है। और जब व्यवस्था स्वयं परीक्षा में असफल होने लगे, तब उत्तरपुस्तिका विद्यार्थियों की नहीं, व्यवस्था की जाँची जानी चाहिए।
(लेखिका पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार समिति की सदस्य हैं।)


