ट्रंप को लेकर जनता आक्रोशित देश ख़ामोश

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के बीच डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों पर वैश्विक आक्रोश बढ़ रहा है। विश्व राजनीति, कूटनीति और शांति प्रयासों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

Naved Shikoh
Published on: 6 March 2026 6:30 PM IST
US Israel Iran war analysis
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US Israel Iran war analysis (Photo: Social Media)

US Israel Iran War Analysis: अमरीका, इजराइल, ईरान और मिडिल ईस्ट में गरजती मिसाइलों की चीखों के बीच चंद शांति की अपीलें महज औपचारिकता तक सीमित हैं। गुटनिरपेक्ष राष्ट्र एकजुट होकर नियमों के विरुद्ध युद्ध को रुकवाने की सख्ती बरतें तो शायद दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की विध्वंसकारी खतरों की आशंकाओं से बच जाए।

यूनाइटेड नेशन और शांति की पैरोकारी की कमजोर तस्वीर भी बता रही हैं कि दुनिया तानाशाही, हिटलरशाही,नफरत, हिंसा, विध्वंस,तबाही, बर्बादी और विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। संयुक्त राष्ट्र संघ, जिनेवा समझौता कहां है ? आसमान से बरसता बेलगाम बारूद का कहर रोकने वाला कोई शांति पसंद महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर या यासिर अराफात नजर नहीं आ रहा। शांति के नोबेल पुरस्कार पाने वाले भी खामोश हैं।

युद्ध के इस महा सीजन में दुनिया के देशों की गिरोह बंदी अभी पूरी तरफ से तय नहीं है। कौन कितना ताकतवर है, कौन किसके साथ है, कौन किसका साथ देने वाला है,सैन्य शक्ति में किसमें कितना दम है,

किस देश का क्या सरकारी फरमान है ! किसकी क्या विदेश नीति है ? बहुत सारी बातें अभी खुल कर तय नहीं हो पाई हैं। ज्यादातर बयान गोल-गोल और अस्पष्ट हैं। विदेश नीतियों के पत्ते खुलकर नहीं सामने आ रहे। मानवता के आदर्शो ,मूल्यों और सिद्धांतों को ताक पर रखकर ज्यादातर देशों की कूटनीति सी एंड वॉच पर अटकी है।

लेकिन एक बात तय है, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को लेकर दुनियाभर की आवाम में गुस्सा बढ़ रहा है। ट्रंप ज़माने भर के चौधरी क्यों बन जाते हैं, युद्ध और अंतरराष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध दुनिया में अशांति फैलाने पर क्यों आमादा हैं ?

ऐसे तमाम तर्कसंगत सवालों के साथ दुनियाभर की आवाम का क्रोध धीरे मुखर होने लगा है। अमेरिका की दादागिरी को सातवें आसमान तक पहुंचाने वाले डोनाल्ड ट्रम्प से अमेरिकन्स भी खासे नाराज दिखे रहे हैं। युद्ध से परहेज़ का वादा करके दूसरी बार सत्ता पाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति की तानाशाही नीतियों से अमरीका पर बार-बार युद्ध थोपने से उनके देश के ही नागरिकों की बड़ी आबादी नाखुश हैं।

भारतीय आवाम पहले ही ट्रंप के ऊल जलूल बयानों और फैसलों से क्रोधित हैं। आपरेशन सिंदूर में सीज फायर करवाने के दावे करने वाले अमरीका के राष्ट्रपति ने टैरिफ के जरिए भारत की अर्थ व्यवस्था को चोट पहुंचाने की साज़िश की हो या रूस से तेल ना लेने का दबाव बनाया हो, पहलगाम हमले में भारतीय नागरिकों को आतंकी साजिशों से बेदर्दी से मारने वाले पाकिस्तान को महान और अपना दोस्त बताने वाले ट्रंप की हर हरकत नाकाबिले बरदाश्त है। देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का राजनीतिक कैरियर खत्म करने की धमकी हो या भारतीय नागरिकों को हथकड़ी बेड़ी डालकर भारत वापस करने का अपमान हो, भारतीय जनता अमरीका के राष्ट्रपति को लेकर आग बबूला है।

महाशक्ति और वर्ड पॉवर समझकर विश्व के अधिकांश देश भले ही अमरीका के खिलाफ खुल कर सामने नहीं आ पा रहे पर भारत सहित दुनिया की आवाम का रुख बता रहा है कि यदि शक्ति का दुरुपयोग ऐसे ही होता रहा तो जनता जनार्दन की शक्ति महाशक्ति की शक्तियों को जीर्ण-शीर्ण कर देगी। जनता के दबाव में दुनिया के राष्ट्रप्रमुखों को ट्रंप के खिलाफ एकजुट होना ही पड़ेगा। ना सिर्फ दुनिया में बल्कि अमरीका की जनता में भी अपने राष्ट्रपति के विरुद्ध आक्रोश दिखाई पड़ने लगा है।

किसी राष्ट्र के राष्ट्रपति को घर मे घुसकर उठा लाने से लेकर किसी देश के सुप्रीम लीडर को घर में घुस कर मार देना, बच्चों के स्कूलों पर मिसाइलें और रिहायशी इलाकों में बम बरसानें की शुरुआत किसने की ?

युद्ध और मानवाधिकारों के विरुद्ध नरसंहार को नहीं रोका जा सका तो ये बात स्वीकार लेना चाहिए कि दुनिया जंगल राज पर चल निकली है ? यानी ताकत के आधार पर कोई किसी को भी चीरफाड़ कर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सबको डरा सकता है। अपनी ताकत का विस्तार कर दुनिया को अपना गुलाम बनकार जंगल राज को वैधानिक बता सकता है।

युद्ध के भी कानून हैं। दुनिया नियमों-कानूनों से चलती है।

बच्चियों के स्कूल पर मिसाइल दाग देना या बम बरसा देना युद्ध तो नहीं ये अमानवीयता की पराकाष्ठा है, नरसंहार है।

लोग कह रहे हैं कि एपस्टीन फाइल की चर्चाओं को इस युद्ध ने रोक दिया, और एपस्टीन फाइल ने कई राष्ट्राध्यक्ष को अमेरिका के खिलाफ बोलने से रोक दिया। लेकिन एपस्टीन फाइल से युद्ध तक छोटी छोटी बच्चियों के साथ जो हुआ उसे व्यक्त करने के लिए अमानवीय, हृदयविदारक, महापाप .. जैसे शब्द भी बौने रखते हैं।

वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को ड्रग तस्करी के एक मामले में गिरफ्तार करना हो, दक्षिणी ईरान में बच्चियों के प्राइमरी स्कूल में करीब पौने दो सौ बच्चियों को मार देना या फिर ईरान के सर्वोच्च नेता और उनके घर के बच्चों, महिलाओं सहित सहित परिवार को मार देना हो, युद्ध और अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि ये सब नियमों, कानूनों और मानवाधिकारों के विरुद्ध हैं।

लेकिन दुनिया की बड़ी संस्थाएं अमरीका के विरुद्ध कोई सख्त कदम नहीं उठा रही हैं।

इजरायल और अमरीका का ईरान में रिजीम बदलने का प्रण तबाही का दायरा बढ़ाता जा रहा है। मिडिल ईष्ट के सम्पन्न खाड़ी देशों में ईरानी हमलों का लॉजिक है। यहां अमरीका के सैन्य अड्डे हैं। इजराइल की चर्चित खुफिया एजेंसी मोसाद यहां से भी ईरान की टोह लेती है। पलटवार में ईरान द्वारा खाड़ी देशों में अमरीका के इन सैन्य अड्डों पर मिसाइलें बरसना क्रिया की प्रतिक्रिया है।

सैन्य अड्डों पर ईरानी प्रतिक्रिया से अमरीका -इजरायल आहत कम है और राहत ज्यादा महसूस कर रहा है।

इन्हें डर इस बात का था कि बड़ी संख्या वाले इस्लामी राष्ट्र एकजुट हो गए और चीन,रूस सहित कुछ और देश इनके साथ खड़े हो गए तो लड़ाई कठिन हो जाएगी। किंतु जब खाड़ी देशों में अमरीका के सैन्य अड्डों पर हमला करके ईरान ने पलटवार किया तो अमरीका-इजराइल ने शिया-सुन्नी बंटवारे और बिखराव का परसेप्शन फैलाने की सुनियोजित रणनीति को आगे बढ़ा दिया। क्योंकि ये सच भी है कि ईरान शिया देश है और संयुक्त अरब अमिरात, सऊदी अरब,कतर इत्यादि पूरी तरह से सुन्नी देश हैं।

दूसरी तरफ अमरीका विरोधी मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने ईरान पर हमलों और आयतुल्ला सय्यद अली खामनेई की हत्या के बाद भारत सहित दुनिया भर में मुस्लिम एकता का दावा किया है। मुस्लिम बुद्धिजीवी कह रहे है कि बहुत पहले तत्कालीन ईराक शासक सद्दाम हुसैन से डराकर अमरीका ने खाड़ी देशों पर अपने सैन्य अड्डे बनाए थे,जिसका दुरुपयोग आज भी किया जा रहा है। कुछ मुस्लिम स्कॉलर्स इस बात की संभावना जताते हैं कि खाड़ी देश मन से आज भी ईरान के साथ हैं और अमरीका-इजरायल द्वारा गाजा/ फलस्तीन या ईरान पर हो रहा जुल्म उन्हें अच्छा नही लगता लेकिन अमरीका के डर और दबाव में अरब देश ईरान या फलस्तीन के समर्थन में खुल कर सामने नहीं आते।

अब सवाल इस बात का है कि यदि तेल पर कब्जे के लिए अमरीका की बरसों पुरानी साजिशों को ट्रंप ने गति दी है तो खाड़ी देशों के राष्ट्राध्यक्ष अमरीका से क्यों डरते हैं ?

किस किस बात का डर और दबाव हैं इनपर !

खाड़ी देशों का हर राष्ट्राध्यक्ष कट्टर धार्मिक हैं, ये इस्लामी कानूनों से देश चलाते हैं। इस्लामी अवधारणा में अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरा जाता। सही रास्ते पर चलकर मारे जाने वाले को शहादत का दर्जा मिलता है। और शहादत को सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है। तो सवाल इस बात का कि आयतुल्ला खामनेई की तरह निडर होकर अमरीका से मुकाबला क्यों नहीं करते सऊदी अरब, यूनाइटेड अरब अमीरात इत्यादि के राष्ट्राध्यक्ष !

इन अरब राष्ट्राध्यक्षों द्वारा डरने अथवा अमेरिकी दोस्ती के तीन ही कारण हो सकते हैं-

ये असली मुसलमान नहीं इसलिए निडर नहीं, इनमें खामनेई की तरह लड़ने और शहीद होने का साहस नहीं। यदि असली मुसलमान नहीं तो मुस्लिम राष्ट्रों की कमान क्यों और कैसे संभाले हैं ?

या फिर शिया मुसलमानों और वहाबी मुसलमानों के बीच सचमुच मसलकी खाई है, वैचारिक मतभेद और द्वेष भावना है। और ये सच है कि अरब के शक्तिशाली वहाबी मुसलमानों/शासकों ने अमरीका-इजरायल के साथ मिलकर इकलौते शिया देश ईरान को मिट्टी में मिला देने, यहां का रिजीम बदलने या दुनियाभर के शियों के सर्वोच्च धर्मगुरु आयतुल्ला सय्यद हसन खामनेई की हत्या करने की साज़िश रची !!!

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