भारत-यूएई 2 घंटे की ऐतिहासिक वार्ता, रक्षा समझौते से बदला वैश्विक संतुलन

भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने, व्यापार में विविधता लाने और डॉलर पर निर्भरता घटाने को लेकर 2 घंटे की उच्चस्तरीय अचानक बैठक हुई, जिसने क्षेत्रीय भू-राजनीति को नई दिशा दी।

Yogesh Mohan
Published on: 25 Jan 2026 3:31 PM IST (Updated on: 25 Jan 2026 3:35 PM IST)
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India UAE: भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी चाणक्य नीति के अनुरूप, भविष्य का पूर्व आंकलन करके सही रणनीति तथा योजना बनाकर ही लक्ष्य तक पहुँचने की कला में निपुण हैं। उनकी कूटनीतिक कार्यप्रणाली से न केवल भारत, अपितु विश्व के समस्त राजनीतिज्ञ स्तब्ध हो जाते हैं।

यद्यपि किसी भी राष्ट्रध्यक्ष की यात्रा की घोषणा पूर्व में ही कर दी जाती है तदानुसार ही विदेश मंत्रालय के द्वारा, उनके स्वागत-सत्कार हेतु तैयारियाँ आरम्भ कर दी जाती हैं। अभी दिनांक 19 जनवरी, 2026 को सांय 4.30 बजे संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मौहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान का मात्र 2 घंटे के लिए अकस्मात् भारत आगमन समस्त जनता के लिए अप्रत्याशित तथा आश्चर्यचकित करने वाला था।

अभी कुछ समय पूर्व ही पाकिस्तान और सउदी अरब की रक्षा संधि सम्पन्न हुई, जिसके अन्तर्गत टर्की के साथ भी संधि होने की सम्भावना है। यदि ऐसा होता है तो भारत के भविष्य के लिए अवश्य ही एक विकट स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। इस प्रकार की रक्षा संधि के माध्यम से शिया मुस्लिम देश, नाटो देशों के सदृश एकत्रित होकर भारत के विरुद्ध अपना एक संघठन बनाना चाहते हैं। इस संघठन के माध्यम से, चीन भी भारत पर अपना अन्तराष्ट्रीय दबाव बनाना चाहता है, ऐसा करने पर पाकिस्तान को, अमेरिका का भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग अवश्य ही प्राप्त होगा। इस प्रकार की अप्रत्याषित स्थिति भारत के भविष्य के लिए, अत्यधिक गंभीर होगी।

माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी को इस सम्भावित संकट का पूर्व संज्ञान है, इसीलिए उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात के साथ रक्षा व सुरक्षा सहयोग के समझौता-ज्ञापन को स्वीकार किया है। इस ज्ञापन को करने में संयुक्त अरब अमीरात की भी एक अपेक्षा निहित है कि वह अमेरिका पर अपनी निर्भरता को न्यूनतम करना चाहता है।

संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति की इस यात्रा का दूसरा प्रमुख उद्देश्य यह है कि वह केवल तेल आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर न रहकर, भारत के साथ अन्य उपयोगी वस्तुओं के भी व्यापार में वृद्धि करना चाहता है क्योंकि अरब देशों का यह मानना है कि विश्व के सभी देशों की तेल पर आत्मनिर्भरता, सौर ऊर्जा के कारण शनै-शनै कम होती जायेगी। इसी के साथ-साथ अब प्रत्येक देश तेल के स्थान पर दूसरे प्राकृतिक स्रोतो की ओर आकर्षित हो रहा है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु संयुक्त अरब अमीरात की एक कम्पनी भारत में कम्प्यूटिंग संस्था की स्थापना में अपना सहयोग प्रदान करेगी। वर्तमान वैश्विक आवश्यकताओं के अनुसार, अमीरात नित् नवीन क्षेत्रों में निवेश करने की आकांक्षा रखता हैं। अमीरात एक धनाढ्य देश है, यदि उसका रूझान भारत में निवेश की ओर हो जाता है तो, इस समझौता-ज्ञापन का भारत को अवश्य ही लाभ प्राप्त होगा।

इसी प्रकार, मोदी जी के द्वारा एक अन्य महत्वपूर्ण कूटनीतिक निर्णय यह लिया गया कि ‘फर्स्ट अबुधाबी बैंक‘ भी गुजरात की ‘गिर‘ सिटी में अपनी एक शाखा खोलने का इच्छुक था, जिसकी अनुमति प्रधानमंत्री मोदी जी के द्वारा सहर्ष दे दी गई। मोदी जी ने भविष्य का पूर्व आंकलन करके,

इस महत्वपूर्ण निर्णय को लिया। ऐसा सम्भव होने के पश्चात दोनों देशों के मध्य रुपये व दिरहम में व्यापार होने से दोनों देशों की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होगी और अमेरिकी डालर पर निर्भरता भी कम होगी। भारत और संयुक्त अरब अमीरात की परस्पर मित्रता की चर्चा, अन्य इस्लामी देशों में होना स्वाभाविक है, क्योंकि इस यात्रा का प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष प्रभाव पाकिस्तान पर अवश्य ही पड़ेगा। मुस्लिम देशों का पाकिस्तान की तरफ रूझान पर भी, काफी हद तक अंकुश लग सकता है और प्रत्युत्तर स्वरूप मुस्लिम देशों में परस्पर कटुता उत्पन्न होना, भारत के सुखद भविष्य के लिए नितान्त आवश्यक हैं। इस कूटनीति के अन्तर्गत उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात से मैत्रीय संबंधों की स्थापना की है, जोकि देशहित में एक श्रेष्ठ पहल है।

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