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Political Analysis: भारतीय राजनीति के 100 वर्ष, संघ स्वीकार्य और वामपंथ का उन्मूलन — एक विश्लेषण
Political Analysis: हिंदुत्व की लहर, वामपंथ का सिमटना और नए राजनीतिक समीकरणों का दावा
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Political Analysis: भारत के इस बार के पांच राज्यों के चुनाव परिणाम अद्भुत बताए जा रहे हैं। इन परिणामों में भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में भारतीयता का एक ऐतिहासिक प्रभाव उभर कर सामने आने का दावा किया जा रहा है। खासकर दक्षिण भारत में तमिलनाडु से स्टालिन की पराजय और विजय की पार्टी का उभार भी अद्भुत बताया जा रहा है। जिस केरल ने भारत में पहली वामपंथी सरकार दी थी, आज उसके इस किले का ढह जाना भी ऐतिहासिक बताया जा रहा है। असम के परिणामों को भी कुछ विश्लेषकों द्वारा सनातन हिंदुत्व की सुनामी कहा जा रहा है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संचालित राजनीतिक विचारधारा के प्रसार और वामपंथी राजनीति के संकुचन की यह 100 वर्षों की यात्रा कई संदेश लेकर सामने आने का दावा किया जा रहा है। इन चुनावों से पहले ही देश के गृहमंत्री Amit Shah द्वारा संसद में यह कहा गया था कि भारत वामपंथ से समर्थित नक्सल समस्या से काफी हद तक मुक्त हो चुका है। वामपंथ समर्थित नक्सली हिंसा के कम होने को कुछ विश्लेषक वामपंथी राजनीति के कमजोर पड़ने से जोड़कर देख रहे हैं।
यहां कुछ ऐसे तथ्य सामने रखे जा रहे हैं जिन पर दृष्टि डालना आवश्यक है। यह तथ्य है कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना 26 दिसंबर 1925 को कानपुर (उत्तर प्रदेश) में हुई थी। इस प्रमुख वामपंथी दल की स्थापना बंगाल के ही M. N. Roy द्वारा की गई थी और इसके पहले महासचिव S. V. Ghate थे। इस प्रकार, 2025 में पार्टी ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे किए हैं। इसकी विचारधारात्मक शुरुआत 1920 में ताशकंद से मानी जाती है, जबकि औपचारिक गठन 1925 में कानपुर में हुआ था।
इसी प्रकार भारत में पहली कम्युनिस्ट सरकार 1957 में केरल में बनी थी। E. M. S. Namboodiripad के नेतृत्व में CPI ने चुनाव जीतकर सरकार बनाई, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली कम्युनिस्ट सरकारों में से एक माना जाता है। इस सरकार द्वारा भूमि सुधार और शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक लाए गए थे। वर्ष 1959 में केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 356 के तहत इस सरकार को बर्खास्त किया गया था, जिसे 'विमोचन समरम' के संदर्भ में देखा जाता है।
अब बात नक्सलवाद की करें तो भारत में नक्सलवाद एक हिंसक वामपंथी उग्रवाद के रूप में देखा गया है, जिसकी शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी। Charu Majumdar और Kanu Sanyal के नेतृत्व में यह आंदोलन शुरू हुआ था। यह विचारधारा माओवाद से प्रेरित रही है। कुछ सरकारी आंकड़ों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि 2014 के बाद नक्सली घटनाओं में कमी आई है और सरकार की रणनीतियों के चलते इसे काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया है। मार्च 2026 तक इसके समाप्त होने का भी दावा किया गया है।
वामपंथ की राजनीति के साथ ही नक्सली हिंसा के कमजोर पड़ने को कुछ विश्लेषक भारतीय राजनीति में एक बड़े वैचारिक बदलाव के रूप में देख रहे हैं। इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री Narendra Modi और गृहमंत्री अमित शाह की नीतियों की चर्चा भी की जा रही है।
तमिलनाडु के विजय
तमिलनाडु की राजनीति में इस बार फिल्म अभिनेता Vijay के उभार को लेकर भी काफी चर्चा है। यह कहा जा रहा है कि उन्होंने अपनी पार्टी तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) के साथ राजनीति में प्रभावशाली एंट्री की है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी पार्टी ने पारंपरिक दलों को चुनौती दी है। हालांकि, इन दावों को लेकर विभिन्न राजनीतिक दृष्टिकोण भी सामने आ रहे हैं।


