International Women’s Day: संघर्ष से शोषण तक महिलाओं की स्थिति पर सवाल

International Women’s Day: शिकागो की ऐतिहासिक हड़ताल से लेकर आज के दौर तक महिलाओं की स्थिति, अपराध, राजनीति और समाज में उनकी वास्तविक भागीदारी पर सवाल।

Arun Srivastava
Published on: 7 March 2026 3:30 PM IST
International Women’s Day: संघर्ष से शोषण तक महिलाओं की स्थिति पर सवाल
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International Women’s Day: आज़ से सैकड़ों साल पहले अमेरिका में कपड़ा एवं गारमेंट्स उद्योग में कार्यरत महिलाओं ने काम के घंटे सहित खुद को समान अधिकार, समाज में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार के अवसरों में सुधार को लेकर आठ मार्च 1857 को हड़ताल की थी। आज़ एक सौ साल से अधिक हो रहे क्या उन्हें "वो" मिला जिसके लिए तमाम सामाजिक बंधनों को तोड़कर उन्होंने तत्कालीन समाज/सरकार को संदेश दिया था कि, " हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है"। अब समय आ गया है उसकी समीक्षा करने का।

फ़िलहाल हम विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े अपने देश भारत पर ही 'एक नज़र' डालें। आदिम युग को छोड़कर कर आधी आबादी कभी आज़ाद नहीं रही। यहां की आधी आबादी का बचपन पिता और भाई की कथित देखरेख में बीतता था तो शादी के बाद पति की दास्तां में। शादी के पहले से उसके कान में पिघले कांच की तरह यह बात डाली जाती थी कि, पति का घर ही उसका असली घर है, पिता के घर से डोली उठती है तो पति के घर से अर्थी, वह पति (परमेश्वर) के चरणों की दासी है, वह पराया धन होती हैं, पति परमेश्वर होता है आदि-आदि और बुढ़ापे में अपने ही पुत्र पर निर्भर होना पड़ता है क्योंकि पैतृक संपत्ति में पत्नी का कोई वैधानिक हक नहीं होता।

बहुत पीछे न भी जाएं, अपनी ही पिछली पीढ़ी में नारी की स्थिति का अवलोकन करें तो मिलता है कि, तब स्टोव के फटने से महिलाओं की मौत होती थी उसके पहले पति के न रहने पर वह ज़लती आग में झोंक (सती प्रथा) दी जाती थी। अब दहेज न मिलने पर जला दी जाती है। पहले बलात्कार की शिकार महिलाएं कुएं में कूद कर ज़ान दे देती थीं पर आज़ बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी जाती है मतलब 'न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी'।

और आज़ के पूंजीवादी व्यवस्था में वह "बिकाऊ माल" बन गई है। फिल्मों, धारावाहिकों व विज्ञापनों में वह अपने जिस्म की नुमाइश करने को मज़बूर है। कोई भी फिल्म, धारावाहिक व विज्ञापन नहीं जिसमें उसे सती-सावित्री के रूप में दिखाया गया हो। यहां तक की टायर के विज्ञापन में भी उसे अर्धनग्न अवस्था में देखा जा सकता है। शैम्पू-साबुन के विज्ञापनों में तो ऐसे पेश किया जाता है कि जैसा वो कपड़ा पहनना भी नहीं चाहती। वैसे भी आज के पूंजीवादी समाज में दो तरह की महिलाएं देखने को मिलतीं हैं। एक वो जिनके पास पहनने को कपड़ा नहीं तो दूसरी वो जो कपड़ा पहनना ही नहीं चाहतीं।

वर्ष 2025 की रिपोर्टों के अनुसार, विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े अपने देश भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की स्थिति बहुत ही चिंताजनक है।​वैश्विक सूचकांक 'विमेन पीस एंड सिक्योरिटी इंडेक्स 2023-24' के अनुसार, 177 देशों में भारत 128वें स्थान पर है। 'नेशनल एनुअल रिपोर्ट एंड इंडेक्स ऑन विमेंस सेफ्टी' (2025) ने भारत को 65 फीसद का राष्ट्रीय सुरक्षा स्कोर दिया है। इस सर्वे में लगभग 40 फीसद महिलाओं ने खुद को 'असुरक्षित' या 'बहुत असुरक्षित' महसूस करने की बात कही है। ​​नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों के अनुसार बलात्कार के सर्वाधिक मामले राजस्थान में दर्ज किए गए हैं, इसके बाद मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का स्थान आता है।​महानगरों में दिल्ली में बलात्कार की घटनाएं सबसे अधिक दर्ज की जाती हैं। ​बलात्कार के बाद हत्या एक गंभीर चुनौती हैं।​2017 से 2022 के बीच लगभग 1,551 ऐसे मामले दर्ज किए गए जहां बलात्कार के बाद पीड़िता की हत्या कर दी गई।

​औसतन, भारत में हर साल लगभग 250 से 280 मामले 'बलात्कार के बाद हत्या के दर्ज होते हैं।

कमोबेश यही स्थिति राजनीति में भी आधी आबादी की है। वामपंथी पार्टियों को छोड़ सक्रिय या यूं कहें कि चुनावी राजनीति में नेताओं की पत्नियां, बेटियां,बहुएं व रखैलों की पौ-बारह है। पति रूपी नेता की मृत्यु के बाद एक तरह से उसकी कुर्सी पर उनका जन्मसिद्ध अधिकार होता है। पंकजा मुंडे, पूनम महाजन, बांसुरी स्वराज आदि इसके उदाहरण मात्र हैं। उत्तराखंड में विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष प्रकाश पंत की पत्नी जो कि शिक्षा विभाग में कार्यरत थीं को इस्तीफा दिलवा कर चुनाव लड़वाया गया तो हरवंश कपूर की ब्याहता भी उनकी सीट पर चुनाव लड़ीं, तो बसपा के मोहन राकेश के निधन पर उनकी पत्नी ने मोर्चा संभाला। यूपी में ब्रह्म दत्त द्विवेदी की मौत के बाद उनकी पत्नी प्रभा दत्त ने उनकी जगह को 'शोभायमान' किया तो महाराष्ट्र में अजीत पवार के निधन के कुछ ही दिनों बाद उनकी को शपथ दिलाई गई।

ग्लोबल जेंडर गैप में 148 देशों में विश्व गुरु भारत 131वें स्थान पर है। शिक्षा के क्षेत्र में हमने थोड़ा सुधार किया है। प्राथमिक शिक्षा में नामांकन 97 फीसद हो गया है। महिला आरक्षण का भारी भरकम नाम (नारी वंदध...) के बावजूद संसद में भारत की भागीदारी अब भी 13.08 फीसद ही है। ऐसे में खेल की तुलना करना बेमानी होगी। ओलंपिक में हम एक "छंटाक" सोना के लिए तरस जाते हैं।

अंत एक कहावत से। 12 साल में 'घूर' के दिन भी फिरते हैं पर हमारे यहां आधी आबादी के दिन एक दिन के लिए ही सही हर साल फिरते हैं। ताज़ा मामला एपस्टीन फाइल का है। उसके तहखाने से रोज़ाना नये नये खुलासे हो रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाइयां हो रहीं हैं पर मदर ऑफ डेमोक्रेसी में घटाघोप सन्नाटा पसरा है। एक जानकारी के अनुसार भारत में हर साल 345 लड़कियां/महिलाएं गायब होती हैं इनसे से न जाने कितनी जेफ्री एपस्टीन के हरम में पहुंचायीं गई होंगी फिर सबकी जुबान तालू से चिपकी हुई है।

अरुण श्रीवास्तव देहरादून

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