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Iran US War Analysis: ईरान का साहस - ट्रम्प की बंदर घुड़की
Iran US War Analysis: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध पर विश्लेषण, जिसमें डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों, धमकियों और वैश्विक प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
Iran US War Analysis (Image Credit-Social Media)
Trump Iran Conflict: अमेरिका, इजराइल व ईरान के मध्य युद्ध को प्रारम्भ हुए बीस दिन से अधिक हो चुके हैं और अभी तक कोई समाधान नहीं हो सका है। युद्ध यथावत हो रहा है। जैसे-जैसे इस युद्ध का विस्तार होता जा रहा है, वैसे-वैसे ईरानी जनता के प्रति, सम्पूर्ण विश्व में सहानूभति का भाव बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का यह भ्रम कि ईरान के हथियार, इस दीर्घकालिक युद्ध में शीघ्र ही समाप्त हो जायेंगे, एक दुःस्वप्न सिद्ध होता जा रहा है। वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्तान के मध्य हुआ युद्ध, इस युद्ध के माध्यम से हमें स्मरण हो रहा है। उस समय भी अमेरिका ने भारत को भयभीत करने हेतु अपनी सेना का 7वां बेड़ा, बंगाल की खाड़ी में लाकर खड़ा कर दिया था। हम भारतीयों की सशस्त्र सेनाओं ने, अमेरिका एवं पाकिस्तान की कूटनीति को असफल सिद्ध करते हुए, बांग्लादेश को केवल स्वतंत्र ही नहीं कराया वरन् पाकिस्तान के 93 हजार कैदियों को बंधक बनाकर भारत भी ले आये। ऐसा करके हमने विश्व के समक्ष अपनी शक्ति का अहसास कराया। भारत के सदृश ही, आज ईरान भी अमेरिका के अहंकार को खण्डित करने का पूर्ण प्रयास कर रहा है। आज अमेरिका अपनी कायरतापूर्ण, गीदड़ भबकी अर्थात् धमकियों से ईरान को भयभीत करने का प्रयास कर रहा है। ईरान, अमेरिका की धमकियों से विचलित हुए बिना, उसको और भी अधिक घातक हमलों से, उसी की भाषा में प्रत्युत्तर दे रहा है।
वास्तविकता यह है कि ईरान ने ट्रम्प की झूठी शेखी को विश्व के समक्ष प्रकट कर दिया है। अभी जहाँ एक ओर, ट्रम्प ने ईरान के ऊर्जा संयत्रों पर भी हमला करने की धमकी दी, वहीं दूसरी ओर ईरान ने भी 4200 किलोमीटर दूर स्थित अमेरिका के बेस कैंप, डिमोना में मिसाईल से हमला करके अमेरिका को यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान, अमेरिका से कम शक्तिशाली नहीं है। ट्रम्प, विश्व के समक्ष अपनी यह छवि प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं कि ईरान भयभीत होकर, समझौते हेतु बातचीत करना चाहता है। जबकि ईरान ने स्पष्ट किया है कि उसकी अमेरिका से किसी भी प्रकार की, कोई बातचीत नहीं चल रही है। दोनों देशों के वक्तव्यों के विरोधाभास से यह स्पष्ट है कि ट्रम्प, इस विषय में स्वयं की छवि को धूमिल होने से बचाने का प्रयास कर रहे हैं। इसी कारण आज ट्रम्प की लोकप्रियता, न्यूनतम स्तर पर पहुँच चुकी है।
अमेरिका के डिमोना शहर और ईरान के विविध केन्द्रों पर यूरेनियम व पेट्रोलियम के अथाह भंडार हैं। यदि दोनों देशों के इन स्थानों पर, इस युद्ध के दौरान, किसी के द्वारा भी हमला किया जाता है और यदि परमाणु विकीरण होना आरम्भ हो जाता है तो, उसकी विनाशलीला से न केवल मध्य पूर्व ही, अपितु, भारत को भी प्रभावित होने से रोका नहीं जा सकता। दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान के नागासाकी व हिरोशिमा पर जो परमाणु बम गिराये थे, वो आज के परमाणु बम से कम शक्तिशाली थे, परन्तु उनका भी दुष्प्रभाव, आज तक दोनों शहरों को भुगतना पड़ रहा है।
ट्रम्प ने अपनी शक्ति के दंभ में, इजराइल के समर्थन में ईरान पर जो हमला किया, यह उनकी अपरिपक्वता का प्रमाण है, जिसने सम्पूर्ण विश्व के समक्ष प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संकट उत्पन्न कर दिया है। इस युद्ध ने इजराइल और ईरान के विनाश की पटकथा तो लिख ही दी है, परन्तु क्या अमेरिका इसकी विभीषिका से स्वयं की रक्षा कर पायेगा, इसमें संदेह है। सम्भवतया, ट्रम्प के इस मूर्खतापूर्ण निर्णय को आगामी नेतृत्व दीर्घ समय तक विस्मृत नहीं कर पायेगा। जब तक इस युद्ध का अंत होगा, तब तक कितने देशों का सर्वनाश होगा और कितने देश विनाश की ओर अग्रसर हो रहे होंगे, यह भविष्य ही निश्चित करेगा, परन्तु अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए यह उक्ति, सर्वथा उपयुक्त है कि - ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि‘।
( लेखक प्रख्यात शिक्षाविद् हैं।)


