Artificial Intelligence Impact: किस ओर जा रहा है हमारा समाज

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी विकास के दौर में बदलते सामाजिक मूल्यों, बढ़ते अकेलेपन, संवेदनहीनता और मानवीय रिश्तों के संकट पर आधारित एक चिंतनशील लेख।

Anshu Sarda Anvi
Published on: 21 Feb 2026 9:40 PM IST
Artificial Intelligence Impact
X

Artificial Intelligence Impact (Image Credit-Social Media)

Artificial Intelligence Impact: इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में हमारे देश ने ए आई इंपैक्ट समिट, 2026 का आयोजन किया। जिसे केवल एक तकनीकी प्रगति के रूप में नहीं बल्कि सार्थक तरीके से ए आई का उपयोग कर लाभ उठाने वाले परिवर्तन के रूप में देखा गया। यह तीन मूलभूत स्तंभों पर आधारित है, जिन्हें सूत्र कहा गया। पहला पीपुल्स सूत्र यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानव प्रगति की शक्ति के रूप में देखना। दूसरा प्लेनेट सूत्र यानी तकनीकी प्रगति को ग्रह के प्रबंधन के रूप में रखना। तीसरा प्रगति सूत्र यानी संसाधनों के लोकतंत्रीकरण और स्वास्थ्य, शिक्षा, शासन व कृषि जैसे क्षेत्रों में सामाजिक -आर्थिक प्रगति के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रयोग पर बल देना। सब कुछ सुनने में, पढ़ने में कितना रोमांचकारी लग रहा है कि हम भविष्य में तकनीक को लेकर कितने आगे बढ़ रहे हैं, हमारा भविष्य अब और अधिक सुलभ, सहज और सुरक्षित होता जाएगा। पर यहीं दूसरी ओर जब हम खबरें पढ़ते हैं कि बेंगलुरु के रिटायर्ड इसरो कर्मचारी द्वारा अपनी पत्नी की हत्या यह कहते हुए कर दी गई कि उनकी मौत के बाद उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा। उनकी इकलौती बेटी अमेरिका में रहती है। जब पढ़ते हैं कि रील बनाने और तेज रफ्तार ड्राइविंग के चक्कर में एक नाबालिग द्वारा अपनी गाड़ी से मोटरसाइकिल सवार एक 23 वर्षीय युवक को दुर्घटनाग्रस्त कर दिया गया हुई , जिसमें मौके पर ही उस युवक की जान चली गई। जब हम पढ़ते हैं कि एक नशे के आदी युवक ने अपनी एम बी ए गर्लफ्रेंड को पहले मार दिया, फिर अपनी विकृत मानसिकता में उसके मृत शरीर के साथ भी हैवानियत करता रहा और पूछने पर उत्तर देता रहा कि हो गया बस यूं ही।

आखिर किस दिशा में जा रहा है देश का समाज? प्रोसेस्ड फूड के इस दौर में हमारी संवेदनाएं भी प्रोसेस्ड हो चली हैं। जिस तरह से घरों से आंगन अब गायब हो रहे हैं , हो चुके हैं उसी तरह से हमारे जीवन से भावनाएं भी अब लुप्त होने लगी हैं। कोई फर्क नहीं पड़ता है हमें कि हम अपनी स्वाभाविकता, अपने प्रकृति प्रदत्त मानवीय भाव, अपनी निश्चल हंसी, अपना करुण विलाप सब कुछ पीछे छोड़तें जा रहे हैं। हमसे परफेक्ट होने की उम्मीद हमें अपने दु:ख- दर्द, सुख, हंसी से दूर करती जा रही है। मनुष्य सोशल मीडिया पर होकर भी अकेला है। इमोजी पोस्ट करके भी हमारे अंदर का अकेलापन किसी भी इमोजी के माध्यम से नहीं दिखाया जा सकता है। हम मानसिक अवसाद में जाते जा रहे हैं। हमारे पास बहुत सारी सुविधाएं हैं पर अपनी बात को बांटने के लिए कोई भी नहीं है। मजबूत बने रहने और मजबूत दिखते रहने की इस अपेक्षा ने हमें अपनी ही भावनाओं की उपेक्षा करने पर मजबूर कर दिया है। हम अपने ही मन की हलचलों को नजरअंदाज करना सीख रहे हैं। अगर हम उन्हें अपने किसी प्रियजन को साझा भी करते हैं तो हमसे यही उम्मीद की जाती है कि हम उन पर काबू रखें। हम अपने भविष्य को प्रतीकों के हवाले करते जा रहे हैं जबकि उसके अर्थो से हम चूक रहे हैं। हमारी नई पीढ़ी गाड़ी चलाना तो सीख रही है बल्कि कम उम्र में, नाबालिग उम्र में ही सीख ले रही है। अच्छी बात है कि फास्ट फॉरवर्ड के युग में वह जी रही है लेकिन अपनी तेज गति में वे मानवीय सूझबूझ, बुद्धिमत्ता और छोटी-छोटी खुशियों तथा ‌ मानव जिंदगी के महत्व को भूल रही है। वह यह भूल जा रही है कि उसकी एक गलती किसी मां के इकलौते संसार को खत्म कर देगी, कभी न खत्म होने वाले इंतजार में बदल देगी और उसके अपने भविष्य को भी धूमिल कर देगी। पर तेज गति तो अब हमारा स्वभाव बन चुकी है।

इस तकनीकी विकास के अंधे पहाड़ का कद दिनों-दिन ऊंचा तो होता जा रहा है। पर इससे क्या हम अकेलेपन का , दूसरों के साथ बातचीत का, परिवार के सदस्यों के साथ का कोई विकल्प तलाश कर पाएंगे? महंगे मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, डिशवॉशर मशीन, वाशिंग मशीनों, रोबोट वाली इस यांत्रिक दुनिया में अब हम इस बात से परेशान हो उठे हैं कि हमारे बाद हमारे पति या पत्नी को कौन संभालेगा क्योंकि अब हम परिवार के बीच अपनी मजबूरी के कारण नहीं रह रहे हैं। हमने उनसे अलग होने का रास्ता चुना है जो उस समय के अनुसार एक बेहतर निर्णय रहा होगा। पर जैसे-जैसे भविष्य वर्तमान बनता है और वर्तमान अतीत बनने जाने लगता है वैसे-वैसे इस तरह की प्रक्रियाएं हमारे लिए मुश्किलें पैदा करने लग जाती हैं।

जो प्रवासी भारतीय दूसरे देशों में जा बसे हैं या परिवार के वे सदस्य भी जो अपने निजी कारणों से, आर्थिक प्रगति के लिए दूसरे शहरों में जा बसे हैं उनमें आवश्यक नहीं कि सभी अपने परिवार को इतना महत्व दें कि उनके सुख-दुख में सम्मिलित होने आएं। कोई कुछ पैसे भेजकर इतिश्री कर लेता है तो कोई वह भी नहीं करता है। पर जो पीढ़ी बिना ए आई के युग के पहले बड़ी हुई है, उनमें कुछ संवेदनाएं अभी भी बरकरार हैं। वे अपने परिवार के सदस्यों के अकेलेपन को समझते भी हैं और उससे निपटने के लिए हर संभव कोशिशें भी करते हैं। मां के जाने के बाद अकेले रह गए पिता या पिता के जाने के बाद अकेली रह गई मां के लिए मानवीय विवेक के साथ अपने प्रयास करते भीं हैं। पर यह बात तो तय है कि तकनीक की प्रभावी उपस्थिति ने जहां नई संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं, वहीं समाज को, उसकी सोच को, उसके अनुभवों को, उसके रिश्तों को, उसके दैनिक व्यवहार को बड़ी तेजी से बदल दिया है और यह बदलाव व अनुभव जहां स्वतंत्रता दिला रहा है वहीं डिजिटल अकेलेपन, आभासी मित्रता, संवेदनाओं के साथ टकराव, भागती जिंदगी, काम करने के बदलते स्वरूपों ,अनुभव, पीड़ा, करुणा, खुशी को सिर्फ एक डेटा बना दे रहा है ।

अब अपनी पहचान के लिए बेतुकेपन की, उन्मुक्त हंसी की, एक-दूसरे के साथ शोर की, मानवीय वातावरण की नहीं बल्कि अभिव्यक्तियों को शांत कर, आक्रमणकारी स्वीकृति की आवश्यकता हो गई है। मनुष्य बदल रहा है, समाज बदल रहा है पर किस ओर जा रहे हैं, यह किसी को नहीं पता।

‌‌प्रसिद्ध ‌पटकथा लेखक प्रसून जोशी की तकनीक, रचनात्मकता और इंसानी संवेदना पर एक प्रभावशाली कविता -

'वो कहते हैं कलम मौन हो जाएगी,

कूचिया और रंग एक दूसरे से नहीं मिलेंगे

स्वर कंठ की गुफाओं से निकल कर आभासी दुनिया में बस जाएंगे

कृतियां स्वयंभू हो जाएंगी, रचनाएं स्वयं ही गर्भ धारण करेंगी

वो कहते हैं सृजन स्वत: ही होगा, दृश्य और दर्शन का अंतर मिट जाएगा

ध्वनि स्वयं को उत्पन कर स्वयं को ही सुनेगी

तब हम तुम क्या कर रहे होंगे?

हम तुम साक्षी बन जाएंगे, हम तुम साक्षी बन जाएंगे

जो किसी स्रोत से फूटी धारा को कल -कल चलचल बहते देख रहे होंगे।'

अंशु सारडा अन्वि

Anshu Sarda Anvi
ABOUT THE AUTHOR

Anshu Sarda Anvi

Next Story