Reading Habits: किताबों के स्वरूप का बदलता संसार

Reading Habits: डिजिटल युग में किताबों के बदलते स्वरूप पर केंद्रित यह लेख पढ़ने की आदतों, पुस्तक मेलों, भौतिक पुस्तकों, ई-बुक्स और लेखन की गुणवत्ता पर गहन विचार प्रस्तुत करता है।

Anshu Sarda Anvi
Published on: 25 Jan 2026 2:53 PM IST
Reading Habits
X

Reading Habits (Image Credit-Social Media)

बीते दिनों गुवाहाटी का पुस्तक मेला समाप्त हुआ है और अब देश की राजधानी नई दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला चल रहा है। क्षेत्रीय पुस्तक मेलों में जहां क्षेत्रीय भाषाओं की विविध विषयों , विधाओं में, साहित्य और साहित्येत्तर पुस्तकें उपलब्ध रहती हैं, वही हिंदी और अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें भी पाठकों को मिल जाती हैं। विश्व पुस्तक मेले में सभी क्षेत्रीय भाषाओं की पुस्तकें , विश्व की अन्य भाषाओं की पुस्तकें तो मिलतीं हीं हैं, हिंदी व अंग्रेजी की पुस्तकें एक बड़ी अच्छी संख्या में मिल जाती हैं, क्योंकि वहां पर उन भाषाओं के प्रकाशक विशेष तौर पर आते हैं। इन पुस्तक मेलों को देखकर ही आशा जागती है कि पुस्तकों का अंत अभी नहीं हुआ है। पुस्तकों का भविष्य अभी भी सुनहरा है क्योंकि पिछले 2000 साल से ये पुस्तकें ही तो हम मानवों की एक अच्छे मित्र और शिक्षक रहीं हैं। यह जरूर देखने वाली बात है कि किस भाषा की पुस्तकें अधिक पढ़ी जा रही हैं। दक्षिण भारत में स्थानीय लोग अपनी भाषा में ही अपने परिवार में और अपने समाज में वार्ता करते हैं, इसलिए बच्चे भी अपनी भाषा और उसके साहित्य को समझतें और पढ़ते हैं। जबकि उत्तर भारत में क्षेत्रीय भाषाएं धीरे-धीरे करके लोप होतीं जा रही हैं और उनका साहित्य भी खत्म होता जा रहा है‌। हमारी नई पीढ़ी का तो आंखें खोलते ही अंग्रेजी भाषा से वास्ता पड़ा है। उनकी मातृभाषा क्षेत्रीय भाषा और हिंदी से सिमटकर अंग्रेजी की तरफ केंद्रित होती जा रही है। अगर वे अपनी मातृभाषा का साहित्य समझते हैं तो वे अवश्य ही या तो अपनी मातृभाषा या अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों को खरीदते होंगे। लेकिन फिर भी हिंदी भाषा की किताबें एक बड़ी संख्या में छप भी रहीं हैं और उनका विमोचन भी हो रहा है।


पर इन्हें पढ़ने वाले कितने लोग हैं? प्रश्न वही जस का तस। दरअसल विमोचित पुस्तकें अपने जानने वालों, मित्रों और रिश्तेदारों में भेजी जाती हैं आखिर छपाई जो गई हैं। पर तकलीफ तब होती है जब इन किताबों को पढ़ने वाला उनका उचित पाठक नहीं मिलता है। कई बार तो यह देखा जाता है कि किताबों का स्तर बहुत ही खराब या औसतन होता है। उनकी सामग्री और व्याकरणीय अशुद्धियां भी इस तरह की होती हैं कि उन्हें पढ़ने की लज्जत खत्म हो जाती है। पर फिर भी उन किताबों का इस तरह से विमोचन, विज्ञापन किया जाता है कि वह स्वत: ही चर्चा के केंद्र में आ जाती हैं। पर खोलने से पता चलता है कि ऊंची दुकान फीका पकवान। पर अब जब किसी दुकान के चर्चे होते हैं तो एक बार तो अवश्य ही चढ़ा जाता है। तो वही हाल इस तरह की तथाकथित चर्चित पुस्तकों का होता है। पर इन सब के कारण अच्छी किताबें जिन्हें पढ़ना चाहिए वे अपने लिए पाठक वर्ग नहीं बना पातीं।

इस डिजिटल दुनिया में किताबें ही वे माध्यम होती हैं जो युवाओं को, हमारी नई पीढ़ी को ठहरकर सोचने और समझने का, सीखने का एक अवसर देतीं हैं। जरूरत है कि किताबों को अलमारी में बंद न रखें बल्कि उन्हें संवाद शैली, सोचने का नजरिया और आत्मविश्वास विकसित करने का माध्यम बनाएं। पर हम सब का ज्यादातर समय अब मोबाइल की स्क्रॉलिंग में चला जाता है। उस पीढ़ी की गृहिणियां भी जो पहले गृहशोभा, गृहलक्ष्मी, मेरी सहेली, सरिता जैसी किताबें पढ़तीं थीं, वह पीढ़ी भी अब विदा लेने लगी है या अब पढ़ने में रुचि नहीं रखतीं। नई पीढ़ी की महिलाएं या तो किसी प्रोफेशन में लगीं हैं और अगर वे गृहिणी हैं भी तो उनका ज्यादातर समय घर को संभालने के बाद किटी पार्टी, रील बनाने, मोबाइल की स्क्रॉलिंग करने, शॉपिंग या पार्लर में चला जाता है। वे अपने इस पठन-पाठन को अपनी पढ़ाई पूरी करने के साथ में ही खत्म कर देतीं हैं। युवाओं के साथ-साथ महिलाओं का भी वर्ग तैयार करना चाहिए कि वे किताबों की ओर अपना झुकाव बनाए रखें।


कितनी बार ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति लिखने के विषय में यह सोचता है कि जब कुछ अच्छा विचार मन में आएगा है, तब लिखा जाएगा। पर ऐसा कभी हो नहीं पाता। सोचते ही रह जाने से कभी भी लिखा नहीं जा सकता। लिखने के लिए स्वयं पर एक दबाव बनाना आवश्यक होता है और सबसे बड़ी बात यह है लिखने की कि अगर लिखने वाले में लिखने के प्रति लगन न हो, उसके प्रति एक जुनून न हो तो वह कभी भी नहीं लिख सकता। क्योंकि जब तक मन में लिखने के प्रति उत्साह नहीं होगा, लगन नहीं होगी तो लिखना संभव कैसे होगा? इसके विपरीत कई लोग ऐसे भी हैं जो आदतन लिखते रहते हैं। उन्हें न तो उसके स्तर से कोई मतलब होता है, न ही उसके संदेश से। किन्हीं की तो भाषा ही इतनी स्तरहीन होती है या उनके पूरे लेखन में समान विषय की पुनरावृत्ति बार-बार नजर आती है कि उसका उचित विश्लेषण ही नहीं किया जा सकता। इस तरह से लेखन के विषयों का दोहरापन उनके लेखन को दिलचस्पी रहित कर देता है। ऐसा लगता है कि मानों उन्हें लिखना है इसलिए वे उसे नित्य कर्म की भांति लिखे जा रहे हैं। जब तक लेखन में कुछ नयापन नहीं होगा, फिल्मों में अभिनेता-अभिनेत्री के टाइप्ड हो जाने वाले चरित्रों की भांति उनकी भी स्थिति होगी। एक बात और किसी भी रचना का अच्छा या बड़ा होना उसमें प्रयुक्त कठिन, बोझिल या आलंकारिक शब्दों से नहीं लगाना चाहिए और न ही सोशल मीडिया के इस युग में उस रचना पर आने वाली लाइक्स और वाह-वाह से।

दरअसल सृजन के इस संसार में लोग उन किताबों और रचनाओं को पढ़ना अधिक पसंद करते हैं, जो उनके जीवन को सीधे जोड़ती हैं। लेकिन एक बुरी रचना या खराब किताब पढ़ने वाले को अन्य किताबों से भी दूर कर देती है। लोगों में इतना धैर्य कहां होता है कि वे हर किताब को खोलकर देख सकें। जब पाठक सही किताब से जुड़ेगा तो वह केवल उसे पढ़ेगा ही नहीं बल्कि अपने भीतर उसे आत्मसात भी करेगा और उसे संजोएगा भी। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम क्या पढ़ रहे हैं। और क्या पढ़ रहे हैं इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि क्या लिखा जा रहा है। सिर्फ लिखकर अपनी किताब को छपवा लेना या उन छपाई हुई किताबों की संख्या से किसी भी लेखक का स्तर तय नहीं होता है। इस तरह से आप अपनी किताबों की संख्या को बढ़ा सकते हैं पर उसके स्तर को नहीं। अपनी रचनाएं भले ही सीमित रखें पर उनके स्तर के साथ किसी भी तरह का समझौता न करें।


आज की पीढ़ी की पढ़ने की आदतों में डिजिटल माध्यम की प्रधानता है, लेकिन भौतिक किताबें अभी भी अपनी जगह बनाए हुए हैं। दरअसल अब अच्छे लेखकों और अच्छे पाठकों में परिवर्तन के साथ-साथ पढ़ने के स्वरूप में भी बदलाव आ गया है। अब पढ़ने का स्वरूप कागज के साथ-साथ स्क्रीन तक पहुंच गया है। कागज पर लिखी किताबें भौतिक रूप से खरीदी-पढ़ी जा रही हैं, उसके साथ-साथ किंडल पर भी पढ़ी जा रही हैं। अब जबकि डिजिटल दुनिया में किताबें खोलकर पढ़ने का प्रतिशत कम होता जा रहा है किंडल पर उपलब्ध रचनाएं किताबों के भविष्य को तकनीक से जोड़ देती हैं। साथ ही आप पाठकों को किताबों से जोड़े रखने के लिए वे मशीनीकृत होकर सुनकर पढ़ने में भी बदलती जा रही है। अब स्वयं लेखक अपनी कहानियों और कविताओं को आवाज के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाने में अधिक उत्सुक है। आवश्यकता है अब किताबें के साथ अधिक प्रयोगात्मक बनने की।

आंकड़े बताते हैं कि युवा पीढ़ी का 70% से अधिक समय स्क्रीन पर (सोशल मीडिया, ई-बुक्स, ब्लॉग्स) बीतता है। जबकि 60-70% पाठक अभी भी भौतिक पुस्तकों को पसंद करते हैं, विशेषकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में। कह सकते हैं कि आज की पीढ़ी हाइब्रिड तरीके से पढ़ती है। मनोरंजन और गहरे अध्ययन के लिए वे भौतिक पुस्तकों को पसंद करती हैं, जबकि समाचार और तात्कालिक जानकारी के लिए तथा किसी प्रकार की अन्य जानकारी के लिए डिजिटल मीडिया का उपयोग करती हैं। हमारे देश में ई-बुक का बाज़ार 17.5% की दर से बढ़ रहा है और 2027 तक आते-आते 13.3 करोड़ से भी अधिक उपयोगकर्ता हो सकते हैं।

पर फिर भी किताबों के कागजी स्वरूप को बचाने की कोशिशें जारी रहनी चाहिए क्योंकि किसी भी वस्तु का भौतिक स्वरूप उसे संवेदना के साथ जोड़ता है। अंत में प्रसिद्ध आलोचक एवं कथाकार ज्ञानरंजन का यह उद्धरण -

'लिखते समय सारा समय ही बहुत कम है, क्योंकि सड़कें अंतहीन लंबी हैं और रास्ते से कभी भी भटका जा सकता है।'

Anshu Sarda Anvi
ABOUT THE AUTHOR

Anshu Sarda Anvi

Next Story