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Middle East War Crisis : भारतीय अन्नदाता पर गहराते संकट के बादल और आत्मनिर्भरता की चुनौती
Middle East War Crisis : खाद, ईंधन और विदेशी आयात पर निर्भरता: क्या भारत दोहराएगा 1971 जैसा संयम?
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Middle East War Crisis : 28 फरवरी 2026 को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के साथ ईरान, इजराइल और ट्रम्प, के मध्य आरम्भ हुए (मिडिल ईस्ट युद्ध) युद्ध पर अस्थायी तौर पर (15 दिन का) विराम लग गया है। उपरोक्त तीनों देश, सम्पूर्ण विश्व की समस्याओं को दृष्टिगत करते हुए, ईरान की शर्तों पर, युद्ध विराम हेतु सहमत हो गये, जिससे भारत के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व को आंशिक राहत मिली है। इस अल्पकालीन युद्ध विराम के दौरान हमें निश्चिंत नहीं होना है, अपितु आगामी सम्भावित कठिनाईयों के प्रति सचेत होकर, आत्मनिर्भरता के साथ उनका सामना करने हेतु अग्रसर होना होगा, क्योंकि जब तक इस युद्ध पर स्थायी विराम नहीं लगता, तब तक सम्पूर्ण विश्व पर संकट के बादल मंडराते रहेंगे।
सम्पूर्ण विश्व में किसान को अन्नदाता के रूप में, पहचाना जाता है क्योंकि यदि किसी देश में किसान फसल उगाना छोड़ दे तो उस देश में अकाल पड़ जाएगा। भारतीय किसान की स्थिति, विश्व के अन्य देशों के किसान की अपेक्षा दयनीय है। भारतीय किसान को मात्र एक सेवक का स्थान प्राप्त है जबकि अन्य देशों के किसानों को, समाज में एक उच्च स्थान प्राप्त है। मध्य पूर्व एशिया युद्ध के कारण अब भारतीय किसान गम्भीर संकट का सामना कर रहा है।
उर्वरक और पेट्रोलियम का सवाल
भारत का किसान, कृषि उत्पादन हेतु आवश्यक संसाधन यथा- उर्वरक एवं पेट्रोलियम पदार्थोें की पूर्ति हेतु विदेशी आयात पर निर्भर करता है। इस समय भारत में, जहाँ एक ओर इन वस्तुओं की आपूर्ति की समस्या उत्पन्न हुई है, वहीं दूसरी ओर इनकी कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हो रही है। आज किसान को खेती हेतु, यूरिया तथा डाई की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। इनकी कीमते हमेशा से ही अधिक रहीं हैं, इसीलिए किसानों को, इन्हें सरकार द्वारा निर्धारित दामों से अधिक पर खरीदने हेतु विवश होना पड़ता था। भारत में यूरिया की अधिकांश पूर्ति सउदी अरब, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से होती है, परन्तु वर्तमान में युद्ध की विभीषिका के कारण, उपरोक्त देशों से इसकी कितनी पूर्ति सम्भव हो पायेगी, यह कहना कठिन है। भारतीय यूरिया उत्पादक कारखानों में, गैस की आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति पर भी वर्तमान में प्रश्न चिह्न लगा हुआ है। ऐसे में उत्पादन लागत में वृद्धि होने पर भारतीय किसान के लिए, अनाज व सब्जी की कीमत पर नियन्त्रण करना अत्यधिक कठिन होगा। ऐसी परिस्थिति में जहाँ एक ओर, किसान पर कृषि उत्पादन का संकट उत्पन्न होगा, वहीं दूसरी ओर जनता पर भी आर्थिक संकट उत्पन्न होगा।
आवश्यकता है कि डालर की अपेक्षा रूपये की कीमत की गिरावट को रोका जाए अन्यथा आयातित वस्तुओ की कीमतों में निरन्तर वृद्धि होती जाएगी। वर्तमान अनिश्चितता के समय में यह कहना अत्यधिक कठिन है कि भारतीय बाजारों में आयातित वस्तुओं को ऊँचे दामों पर विक्रय करना सम्भव होगा अथवा नहीं।
लाल बहादुर शास्त्री के प्रयास
भारत सरकार, इस विकट स्थिति पर नियन्त्रण हेतु हर सम्भव प्रयास करेगी। परन्तु जब वस्तु की उपलब्धता ही नहीं होगी तो सरकार के लिए भी कुछ कर पाना सम्भव नहीं होगा। वर्तमान स्थिति, वर्ष 1971 में हुए हिन्दुस्तान - पाकिस्तान के युद्ध का स्मरण कराती है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने देश की जनता से, अनाज की कमीं को नियत्रित करने हेतु तथा होटल में खाद्य पदार्थों की बर्बादी को रोकने हेतु, एक दिन का उपवास करने की अपील की थी। उनकी अपील को भारत की जनता ने देशहित में सहर्ष स्वीकार किया और एक दिन के लिए व्रत रखकर उस संकट का सामना किया। ऐसी सम्भावना है कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के द्वारा भी सम्भावित विकट परिस्थिति में इसी प्रकार की कोई अपील देश की जनता से की जाए। सम्पूर्ण देश के नागरिक उनकी अपील को सहर्ष स्वीकार करेंगे, क्योंकि अतीत में भी हम भारतीय संकट की घड़ी में सदैव ही अपने प्रधानमंत्री के साथ रहें हैं।


