TRENDING TAGS :
पुराने को पीछे छोड़ता और नए को स्वीकारता वसंत
वसंत ऋतु परिवर्तन, त्याग और नए सृजन का प्रतीक है। यह लेख प्रकृति के माध्यम से जीवन में पुराने को छोड़कर नई आशा और ऊर्जा को अपनाने का संदेश देता है।
Spring Season (Image Credit-Social Media)
सखे, वसंत आ चुका है। सर्दियों की राह चलकर धीरे-धीरे ठुमकता, गाता, गुनगुनाता वसंत आ गया है। हालांकि महीने के हिसाब से वसंत आने में अभी देरी है क्योंकि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में इस सर्दी की पहली बर्फबारी अभी हुई है। इसलिए अभी सर्दी का मौसम कुछ समय तक रहने वाला है पर फिर भी तिथि के हिसाब से और प्रकृति में बदलाव से मालूम हो रहा है कि वसंत आ चुका है। इस समय जब हम प्रकृति के बीच खड़े हो कर उसे देखते हैं तो बड़ा ही आनंद मिलता है। चारों ओर सारे पेड़-पौधोे के पत्ते अब अलसाए हुए और पुराने लगने लगें हैं, जैसे कि कोई बड़ी उम्र का बुजुर्ग, जिसके चेहर कीे रौनक खो चली हो। जीने की चाह मन में हो पर शरीर साथ देने से मना कर दे। उनका पीलापन उनकी थकान को नहीं बताता वरन उनके अनुभव की कहानी कहता है। उन पेड़ों को देखकर ऐसा लगता है कि वे कह रहे हैं कि इस पूरे एक साल में मैंने सर्दी, गर्मी, बारिश सभी कुछ सहा है। तेज गर्मी जब अपने पूरे रौद्र रूप में थी, क्या मानव और क्या जानवर सभी त्राहि माम कर रहे थे, तब भी मैंने खुद की पूरी ताकत को समेटकर, थकने के बावजूद अपने आप को कभी हारने नहीं दिया। उस गर्मी ने मुझे जहां ऊर्जा दीे वहीं हालातों से लड़ने की जिजीविषा भी दी। मैंने स्वयं को अपनी जड़ों से जोड़े रखा और खुद को बचाए रखने के साथ-साथ अपनी मुस्कुराहट यानि अपनी हरितिमा के साथ भी कोई समझौता कभी नहीं किया। बल्कि उस गर्मी के प्रचंड रूप ने मुझे और ज्यादा जुझारू बना दिया।
जहां तक बारिश की बात है, वह हम पेड़-पौधों को न केवल तृप्ति प्रदान करती है बल्कि गर्मी से जूझते हुए हमारी शक्ति का जो क्षय होता है, वह उससे भी हमें उबारती है। भीषण गर्मी को झेलते-झेलते हमारे पत्ते जो कुम्हला जाते हैं यह बारिश की बूंदे हमारे लिए संजीवनी बनकर आतीं हैं, जिनके संसर्ग को पाकर हम फिर जी उठते हैं। लेकिन जब बारिश की भी अति हो जाती है, तब हमारे लिए खुद को बचाए रखना बहुत मुश्किल काम हो जाता है। अगर हमारी जड़ें मजबूत नहीे हैं और हम स्वयं को परिस्थितियों में ढालने लायक नहीं बना पाते हैं तो इस बात की प्रबल संभावनाऐं होतीं हैं कि हम बिखर जाऐें, टूट जाऐं। पर यह हमारी खासियत है कि हम बगैर लड़े हार नहीं मानते हैं। हम स्वयं को बनाए और बचाए रखने की पूरी कोशिश करतें हैं। बारिश की बूंदें जब हमारे पत्तों पर पड़तीं हैं, तो गर्मी के दिनों की धूल-मिट्टी से गंदे हुए हम बहुत ही सुख का अनुभव करतें हैं और फिर से एक नए संघर्ष के लिए खुद को तैयार कर पाते हैं। वे पौधें जो कोमल होतें हैं, उनके लिए बाढ़ की स्थिति भयावह होती है, उस स्थिति में स्वयं को बचाए रखना उनके लिए जीवन-मृत्यु का प्रश्न हो जाता है।
सर्दियों का मौसम भी हमारे लिए कुछ मुश्किलें लेकर आता है। सर्दियों में जब ठंड बहुत पड़ती है और तापमान नीचे को गिरता है तब हमारे लिए धूप की कमी के कारणप्रकाश-संष्लेषण की क्रिया में मुश्किलें आती है, जिससे हमें पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है। पर्याप्त पोषण के अभाव में हमारे पत्ते पीले पड़ जाते हैं और हमारी सुंदरता भी खत्म होने लगती है। कुछ फूलों को खिलने के लिए सर्दियों की नरम धूप की आवश्यकता होती है तो कुछ को गर्मियों का तेज। किन्हीं पौधों को सर्दियों की बारिश चाहिए तो किन्हीं को गर्मियों वाली बारिश। सर्दियों में ठिठुरतें पौधों को जब तक सूरज की ऊष्मा प्राप्त नहीं होती, वे न तो खुल पातें हैं और न हीं खिल पातें हैं। और इसी कारण सर्दियों का अंतआते-आते हमारे पत्तों में पतझड़ आ जाता है। अतः पतझड़ में पत्तों का गिरना एक स्वभाविक प्रक्रिया है।
दुनिया के अलग-अलग देशों में भी वसंत ऋतु का स्वागत अलग-अलग परंपराओं के साथ किया जाता है। भारत, बांग्लादेश और नेपाल में वसंतोत्सव के अलावा चीन में चंद्र नववर्ष, जापान में चेरी ब्लॉसम उत्सव, स्पेन में लास फालस, मेक्सिको में वसंत विषुव और स्वीडन में वालबोर्ग मनाया जाता है। हमारे देश में वसंत ऋतु पर हर काल के साहित्यकारों ने अपनी -अपनी रचनाएं लिखी हैं। ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर आज तक के साहित्यकारों ने अपनी -अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकृति की सौंदर्य-चेतना का वर्णन किया है। पीली लहराती सरसों, कोयल का मीठा स्वर, छिटक-छिटक कर आती सूरज की रोशनी और ऋतुराज वसंत का आगमन यह इस समय को बहुत ही खास बनाता है।
महाकवि कालिदास जिन्हें प्रकृति का कवि कहा जाता है, अपने पहले खंडकाव्य ऋतुसंहार के छठे सर्ग में वसंत का विस्तृत और मदमस्त वर्णन किया है। उन्होंने अभिज्ञान शाकुंतलम, कुमार संभव में भी वसंत उत्सव को श्रृंगार रस, सौंदर्य, प्रकृति और प्रेम का एक अद्भुत संगम बताया है और प्रकृति के मानवीकरण द्वारा काम और प्रेम का घनिष्ठ संबंध स्थापित किया गया है। ऋतुसंहार में वह चिर वसंत में विरही यक्ष की व्यथा लिखते हैं-
'द्रुमा सपुष्पा: सलिलं सपदम,
स्त्रीय सकामा: पवन: सुगंधी:।
सुखा: प्रदोषा: दिवसाश्च रम्या:,
सर्व प्रिये चारुतरं वसंते।।'
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंध 'वसंत आ गया है' में वह प्रकृति में आ रहे ऋतु परिवर्तन और मानव मन पर उसके प्रभाव को रेखांकित करते हैं। तो सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का वसंत विद्रोह और सृजन का संदेश लेकर आई है, जो पुरानी जड़ताओं को तोड़ता है। बाबा नागार्जुन का वसंत प्रकृति की विविधता और उमंग का प्रतीक है-
"किसिम-किसिम की गंधों-स्वादों वाली॥
ये मंजरियाँ तरुण आम की।
डाल-डाल टहनी-टहनी पर झूम रही हैं॥"
मलिक मोहम्मद जायसी की नायिका नागमती का प्रियतम विरह वसंत के आगमन से और अधिक कष्टकारी बन रहा है। बिना प्रिय के वसंत ऋतु में खिलती सरसों और पलाश, कचनार, अनार, गुलाब अच्छे नहीं लगते हैं बल्कि वेदना के दर्द को और बढ़ा देते हैं। राजस्थान के लोकगीतों में भी वसंत के विरह का अनूठा स्थान है। जब लज्जा स्वरूप महिलाएं प्रिय के परदेश जाने को लेकर अपनी विरह किसी से नहीं कह पाती थी तो गीतों के माध्यम से ही गाकर कह देतीं थीं। बहुत सारे कवियों, रचनाकारों सूरदास, जयदेव, सुमित्रानंदन पंत, अमीर खुसरो, केदारनाथ अग्रवाल सबने वसंत पर अपनी-अपनी साहित्य रचना की है और प्रकृति के सौंदर्य को लिखा है।
पेड़ों के गिरते पीले पत्ते याद दिलाते हैं कि जब तक पुराना अपना स्थान नहीं छोड़ेंगे, तब तक नए को स्थान मिलना कैसे संभव होगा। नई ऊर्जा के लिए, नए कलेवर के लिए, नई आशा के संचार के लिए नए पत्तों का आगमन आवश्यक है और यही प्रकृति का नियम भी है। इसलिए वसंत का आगमन बहुत महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है एक पौधे के जीवन में। पेड़ में नई-नई कोमल पत्तियों का
आना प्रकृति के जननी स्वरूप का प्रतीक होती हैं। ये पत्तियां मन में एक आशा का संचार करतीं हैं, जीवन के होने और उसकी जीवंतता की परिचायक ये पत्तियां नए सृजन का अहसास करातीं हैं। और भारतीय साहित्य की रचनाओं और प्रकृति का यह बिखरा हुआ सौंदर्य याद दिलाता है कि पुराने को जाना होता है और नए को आना होता है। नाउम्मीदी पीछे रह जाती है और आशा का पथ हमेशा खुला होता है। तो प्रिय सखे, आगे बढ़ने के लिए कुछ पीछे छोड़ना होता है, पुराने से अलग होना होता है और नए को स्वीकार करना होता है, तभी जीवन में वसंत का आगमन होता है।


