सवर्ण असंतोष और भाजपा की राजनीति पर उठते सवाल

यूजीसी, शंकराचार्य विवाद व सामाजिक मुद्दों के बीच सवर्ण असंतोष और भाजपा के पारंपरिक जनाधार पर संभावित राजनीतिक असर को लेकर उठते सवाल।

Naved Shikoh
Published on: 22 Feb 2026 7:12 PM IST
BJP’s Social Coalition Under Strain
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BJP’s Social Coalition Under Strain (Photo_ Social Media).jpg

जड़ बिना वृक्ष, सवर्ण बिन भाजपा अस्तित्वहीन !

यूजीसी,शंकराचार्य विवाद और बटुक अपमान जैसे तमाम मामलों ने बटने-कटने की घिनोनी साजिश रच दी है। समाज में वैमनस्यता फैलाने की साज़िश का जिम्मेदार कौन है ? इसमें भाजपा सरकारों की क्या कमी और लापरवाही है ? भाजपा और हिन्दू समाज को इसका कितना नुकसान होगा ये आशंका साफ नजर आने लगी है। ऐसी चिंगारियां दिखने लगी हैं जो समाज को बांटने की आग लगाना चाहती हैं। लगातार एक के बाद एक जातियों के बटवारे के मुद्दे पैदा हो रहे हैं, कभी अगड़ों और पिछड़ों को लड़वाने के तो कभी ब्राह्मण-ठाकुर दूरियां पैदा करने का माहौल !

यदि ये सब नहीं संभाला गया तो इसका सीधे असर राजनीतिक नफा-नुकसान की तस्वीर पेश करेगा। खासकर यूपी के 2027 विधानसभा चुनाव में पीडीए की राजनीति चमकेगी और भाजपा द्वारा जातियों को जोड़कर हिन्दुत्व एकता की सफलता का राजनीतिक लाभ विफलता की ओर फिसल सकता है।

इतिहास गवाह है कि हिन्दू समाज कि एकजुटता से भाजपा मजबूत हुई है और मंडल कमंडल की राजनीति में मंडल भारी पड़ा है।

तीन-चार दशक पहले राम मंदिर आंदोलन से लेकर मोदी-योगी युग में पिछड़ों-दलितों का विश्वास जीत कर ही भाजपा ने सत्ता हासिल की हैं लेकिन भाजपा के साथ सवर्ण हर दौर में रहा है। खासकर भाजपा के दुर्दिन में साथ देने वाला एकमात्र सवर्ण ही था। लेकिन मौजूदा दौर में गैर सवर्णो को अपना बनाए रखने के लिए निरंतर सवर्णों को नजरंदाज किया जा रहा है। जाति जनगणना से लेकर यूजीसी तक अगड़ों के चेहरे पर शिकन साफ नजर आने लगी है।

इतिहास गवाह है ब्राह्मण,ठाकुर, कायस्थ ,वैश्य समाज ने एकजुट होकर भाजपा को जिताने के लिए जब-जब अपना जोश दिखाया तब-तब दलित और पिछड़ा वर्ग भी हिन्दुत्व व राष्ट्रवाद की गाड़ी को रफ्तार देने के पहिए बन गया। इंजन की शक्ति के बिना पहिए गाड़ी को रफ्तार नहीं दे सकते हैं।

सवर्ण वर्ग की संख्या भले ही कम हो लेकिन ये दांत की तरह है, बत्तीस दांतों में एक-दो दांत भी टूटें तो सब दांत कमजोर पड़ जाएंगे। भाजपा इस मुगालते में ना रहे कि पिछड़ी जातियों और दलित समाज का दिल जीत कर पर्याप्त जनसमर्थन हासिल किया जा सकता है। सवर्ण भाजपा को लेकर ढीला पड़ा तो पार्टी का संपूर्ण जनाधार ढीला पड़ जाएगा।

आम नागरिक इन बातों को समझते हैं तो पार्टी के चाणक्य ये बात नहीं समझ पा रहे हो ऐसा सम्भव नहीं है। तो फिर यूजीसी से लेकर शंकराचार्य, बटुकों के साथ दुर्व्यवहार जैसे मुद्दे क्यों गर्म होने दिए जा रहे हैं ?

क्या यहां ये कहावत चरितार्थ हो रही है- "विनाश काले विपरीत बुद्धि" ।

उत्तर प्रदेश जहां से भाजपा ने हिन्दुत्व की ताकत को जन्म दिया, बरसों से अपने पैर जमाए जातियों की राजनीति को हाशिए पर डाला, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नारा- बटोगे तो कटोगे ने ना सिर्फ यूपी में बल्कि देश के तमाम राज्यों में चुनावी सफलता दिलवाई। उस योगी के यूपी में कभी ब्राह्मण -क्षत्रिय तो कभी अगड़ा-पिछड़ा की राजनीतिक साजिशों की आहट कैसे सुनाई पड़ रही है ? केंद्र सरकार ने यूजीसी का विवाद पैदा करने से पहले अपनी जड़ों के बारे में क्यों नहीं सोचा ?

माना सियासत में जीत के लिए जनाधार का पूरा गिलास भरना जरूरी होता है, लेकिन भाजपा के गिलास का पेंदा (अपर कास्ट) ही कमजोर हो जाए तो गिलास भरा नहीं जा सकता।

क्या दलितों के बिना ब्राह्मण और मुस्लिम समाज के जनाधार से बसपा चुनावी सफलता हासिल कर सकती है !

मुस्लिम समाज के समर्थन के बगैर सपा की जीत की कल्पना भी करना मुश्किल है। भाजपा को ये समझ लेना चाहिए कि वो भले ही दलितों -पिछड़ों का दिल जीतने में जान लगा दे पर सवर्ण समाज के बिना भाजपा अस्तित्वहीन हो जाएगी !

बिना आधार के कुछ संभव नहीं। नींव के बिना इमारत नहीं खड़ी की जा सकती। बिना पेंदे के कोई बर्तन उपयोग में नहीं लाया जा सकता, जड़ के बिना पेड़ नहीं और बिना सवर्ण के भाजपा चुनावी वैतरणी नहीं पार सकती।

लोकसभा 2024 में यूपी में भाजपा की हार का ये ही कारण नही था कि दलित और पिछड़े वर्ग का एक हिस्सा सपा-कांग्रेस के साथ आ गया था, बल्कि सच ये था कि कुछ लोकसभा क्षेत्रों में क्षत्रिय तक नाराज़ दिखा इसलिए आधार खिसकता देख भाजपा का कुछ दलित-पिछड़ा भी इंडिया गठबंधन की तरह शिफ्ट हो गया। भाजपा का पेंदा यानी आधार अपर कास्ट है और छेद वाले कटोरे में कुछ डालना मूर्खता समझी जाती है।

भाजपा दो रास्तों पर कैसे चल सकती है ? यूजीसी के सख्त नियम हो या जाति जनगणना, इन फैसलों के साथ अपर कास्ट का भाजपा से पहले जैसा विश्वास का रिश्ता कैसे बना रहेगा?

किसी शायर ने कहा है-

चांद तारों को ज़मीं पर कैसे ला पाओगे तुम,

जुगनुओं को रौशनी में कैसे चमकाओगे तुम,

या हया अपनाओ या फिर बेहया हो जाओ तुम,

आंखों से आंखें मिलाकर कैसे शरमाओगे तुम।

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