Shimla Agreement 1972: आपसी बातचीत से विवादों का हल निकालें

Shimla Agreement 1972 History: इस लेख में शिमला समझौते की अहमियत, भारत-पाकिस्तान के बीच शांति, आपसी बातचीत से विवादों के समाधान और विदेशी हस्तक्षेप से मुक्त संबंधों पर विस्तार से चर्चा की गई है।

Newstrack Network
Published on: 7 Jun 2026 4:21 PM IST
Shimla Agreement 1972 History
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Shimla Agreement 1972 History

Shimla Agreement 1972 History: श्रीमान, सबसे पहले मैं शिमला समझौते का समर्थन करने वाले दलों का धन्यवाद करता हूं और साथ ही यह भी अनुभव करता हूं कि इस करार का विरोध करके जनसंघ बिल्कुल अकेला पड़ गया है। शिमला करार का समर्थन केवल हमारे देश में ही नहीं हुआ है, बल्कि विश्व के प्रायः हर भाग में इसकी प्रशंसा हुई है। इसे शांति स्थापित करने का एक अद्भुत मानदंड माना गया है। यहां तक कि जो देश हमारे साथ स्पष्ट रूप से अथवा परोक्ष रूप से भी सहानुभूति नहीं रखते थे, भले ही इसका कारण उनकी कम जानकारी या अन्य कोई बात रही हो, उन देशों ने भी मुक्त कंठ से कहा है कि सशस्त्र युद्ध के छह महीनों के भीतर, युद्ध जीतने के बाद भी भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं अपने दुश्मन को अपने यहां बुलाकर केवल कुछ ही दिनों में शांति स्थापित करने के लिए यह अद्भुत शिमला समझौता पेश किया है। समूचे विश्व ने इस समझौते का समर्थन किया है।

इसी करार के तुरंत बाद मुझे अफ्रीका तथा दो यूरोपीय देशों और काहिरा का दौरा करने का अवसर मिला। मुझे हर जगह बड़े उत्साह के साथ यही कहा गया कि शिमला समझौता करके भारत ने एक महान बुद्धिमानी का कार्य किया है और विश्व को यह दिखा दिया है कि भारतवासी जहां उठकर लड़ना जानते हैं, विजय प्राप्त करना जानते हैं, वहीं शांति स्थापना के लिए भी अधिक उत्साहित होते हैं। यहां सदन में भी दो दिन की चर्चा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में भी इस करार को विशाल समर्थन प्राप्त हुआ है।


इस करार में पहली बात तो यह है कि दोनों पक्ष अपने सभी मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीकों से हल करेंगे। दूसरे, आपसी बातचीत द्वारा हल करेंगे।

तीसरे, कोई भी पक्ष स्थिति में किसी प्रकार का कोई एकपक्षीय परिवर्तन नहीं करेगा। चौथे, कोई भी पक्ष दोनों पक्षों के मध्य मैत्रीभाव और शांतिपूर्ण संबंधों को बिगाड़ने के लिए किए गए किसी भी प्रयास को रोकेगा। पांचवें, कोई भी पक्ष किसी दूसरे के भीतरी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। और फिर सेनाओं की वापसी के बारे में भी, यह पूर्णतया एकमुश्त करार है, क्योंकि भारतीय और पाकिस्तानी सेनाएं अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की ओर वापस आ जाएंगी तथा जम्मू व कश्मीर में वास्तविक नियंत्रण रेखा का सम्मान किया जाएगा। इस प्रकार इस करार में अनेक बातें एकमुश्त हैं। परंतु कुछ मित्र इस बात को समझ ही नहीं पा रहे हैं। हमने किसी एक या दो बातों को ही नहीं लिया है, बल्कि समस्त समस्याओं का हल ढूंढने का प्रयास किया है और हम उन पर परस्पर सहमत हो गए हैं। इस बात पर सारा राष्ट्र सहमत है कि भारत शांति चाहता है। हमारे आलोचक भी यह कहने का साहस नहीं कर सकते कि भारत शांति नहीं चाहता। हमारे प्रधानमंत्री ने यह बात कई बार स्पष्ट तौर पर कही है कि शिखर सम्मेलन में हम विजेता के रूप में नहीं जा रहे, बल्कि शांति के लिए जा रहे हैं।


शांति स्थापित होना पाकिस्तान के हित में भी है। श्री भुट्टो ने पाकिस्तान की राष्ट्रीय सभा में कहा है कि हमें अतीत में की गई अपनी भूलों को भूल जाना चाहिए। हमें ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत के अनुसार चलना चाहिए। इस समझौते का यह उद्देश्य भी है कि हम बिना विदेशी हस्तक्षेप के आपसी बातचीत से अपने विवादों को हल करें।

* राजनेता व विदेश मंत्री के एक अगस्त, 1972 को लोकसभा में दिए भाषण के संपादित अंश।

(साभार ‘अमर उजाला’)

स्वर्ण सिंह

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