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सरकारी स्कूलों में अखबार अनिवार्य, बदलेगी विद्यार्थियों की पढ़ने की आदत
उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकार के फैसले से सरकारी स्कूलों में अखबार शिक्षा का हिस्सा बनेगा, जिससे भाषा ज्ञान, सोचने की क्षमता और पढ़ने की आदत विकसित होगी।
School Newspaper( Image Social Media
यह बीते सप्ताह की बात है जब उत्तर प्रदेश और राजस्थान की सरकारों ने सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। अब प्रत्येक विद्यालय में एक हिंदी और एक अंग्रेजी का अखबार मंगाया जाएगा। यह कहा गया है कि विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना के बाद विद्यार्थियों के लिए 10 मिनट का समय अखबार पढ़ने के लिए दिया जाएग, जिनमें से उन्हें हर रोज 5 नए या कठिन शब्दों को बताना होगा जो कि विद्यालय के नोटिस बोर्ड पर लगाए जाएंगे। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि विद्यालयों में वर्ग पहेली व सुडोकू को हल करने जैसी प्रतियोगिताएं भी करवानी होंगी। कुल मिलाकर कहानी इतनी है कि इन दोनों राज्यों के सरकारी विद्यालयों में अखबार अब शिक्षा पद्धति का एक हिस्सा माना जाएगा। अगर यह कदम वाकई सफल हो जाता है तब इस अखबार पढ़ने वाले मॉडल को अवश्य ही अन्य राज्यों को भी लागू करना चाहिए। यह कदम निश्चित तौर पर अखबार की दुनिया में एक परिवर्तनकारी कदम लेकर आएगा।
कोविड-19 के पहले तक अखबार कोई पढ़ें या ना पढ़ें या कम पढ़े हर घर में आना आवश्यक था, चाहे वह किसी भी भाषा का हो। यह घर की सुबह पहले की इस तरह की जरूरत थी जैसे कि सुबह-सुबह गेट पर आने वाला दूध वाला। घरों में या व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में एक से अधिक अखबार भी आते थे और सुबह-सुबह के नित्य कर्म के समान यह अखबार पढ़ना भी एक आवश्यक काम था कि चाय के साथ उसे पढ़ा जाए। दोस्तों की मंडली मॉर्निंग वॉक पर जब मिलती तो अखबार के खास मुद्दों पर चर्चा करती। बच्चों को जहां बच्चों के कोने या बाल स्तंभ का इंतजार रहता है वहीं घर की महिलाएं भी अखबार में फैशन, रेसिपी, ब्यूटी टिप्स जैसे कॉलम ढूंढती और युवा रोजगार, कैरियर से संबंधित समाचारों को टिक लगाते थे। विवाह योग्य युवक-युवतियों के लिए विवाह विज्ञापनों पर नजर रहती थी। और घर के बड़ों से अखबार कब खाली हो तो औरों के पढ़ने के हिस्से में आए, इसका इंतजार रहता था। विद्यालयों में असेंबली के समय जिस भी कक्षा की असेंबली का टर्न होता था, वह उस दिन की मुख्य खबरें बताया करती थी। इस तरह से बड़ों के साथ-साथ बच्चों को भी अखबार को पलटने की आदत थी। वे अखबार के माध्यम से देश- दुनिया की न केवल खबरें जानते थे बल्कि उसके माध्यम से उनमें आलोचनात्मक सोच भी विकसित होती थी। वे वाद-विवाद प्रतियोगिता या सामान्य ज्ञान की परीक्षाओं में भी तर्क, तथ्य और समाचारों व घटनाओं से लैस रहते थे क्योंकि वे समसामयिक घटनाओं को पढ़ने की प्रक्रिया से रोज दो-चार हुआ करते थे।
अखबार न सिर्फ अखबार हुआ करते थे, वे गलत के प्रति प्रतिरोध का स्वर भी हुआ करते थे। कई जाने-माने संपादकों और पत्रकारों को पढ़ना कितने ही विद्यार्थियों के मन में पत्रकारिता के प्रति करियर को लेकर अमिट छाप छोड़ गया होगा। टी.वी. आने पर भी अखबारों की सत्ता भंग नहीं हुई थी बल्कि वे समाचारों के एक विश्वासपात्र स्रोत तो बने ही रहे। पर धीरे-धीरे समय बदला जितने ज्यादा हाथों में मोबाइल आता चला गया, उतना ही लोग अखबार से थोड़ा दूर होते चले गए। लेकिन सबसे अधिक अखबार उद्योग को ठोकर मारी कोरोना ने। यह एक ऐसा नया संकट लेकर आया जिससे अखबार उद्योग वापस अपनी पटरी पर लौट ही नहीं पाया। अखबार आज भी छपते हैं पर उनके पढ़ने वाले पहले की तुलना में निश्चित तौर पर कम हो गए हैं। लोगों के घरों में अखबार आता है पर वह उसे पढ़ते तक नहीं है बल्कि घर के अन्य कामों में उसका प्रयोग कर लेते हैं। कितने ही लोग अखबार को ई-पेपर के रूप में पढ़ लेते हैं। अधिकांशत युवा पीढ़ी तो उससे भी पल्ला झाड़ ले लेती है। बच्चों में पढ़ने की आदत तो लगभग खत्म सी ही हो गई है। अखबार पढ़ने के फैसले से बच्चों के स्क्रीन टाइम में कमी होगी ऐसा कहना मुश्किल है और यह आवश्यक भी नहीं। बल्कि इस फैसले को इस तरह से लेना चाहिए यह बच्चों में भाषा का सुधार करेगी, उनके व्याकरण को दुरुस्त करेगी, वे किन्हीं खास मुद्दों पर बातचीत, मंथन करना सीख पाएंगे और सबसे बढ़कर है कि अखबार जो कि डिजिटल दुनिया के आगे घुटने टिकता नजर आ रहा है, उसकी स्थिति में भी सुधार होगा, ऐसी उम्मीद करनी चाहिए।
डिजिटल संसाधनों के लगातार बढ़ते प्रयोग के कारण विद्यार्थियों की दिमागी सेहत पर भी गहरा असर पड़ रहा है, जिससे उनमें एकाग्रता की कमी, नींद में कमी, याद रखने में कमी, लिखने की गलतियां, व्याकरणीय अशुद्धियां आदि बढ़ गई हैं। अखबार की जगह कभी भी डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नहीं ले सकता, दोनों का अपना अलग-अलग रास्ता है। हमारे देश में अखबारों को आए लगभग 245 साल हो चुके हैं । इन दो शताब्दियों से ज्यादा के समय में अखबारों ने अपने आप में बहुत बदलाव किए हैं। अब उन्हें बच्चों की रुचि के अनुरूप सामग्री को बढ़ाने पर भी जोड़ देना होगा। पाठकों के बीच लोकप्रियता हासिल करने के लिए सनसनीखेज खबरों को परोसने के बदले उन्हें सही खबरों को देना होगा। संपादकों को भी अपनी सक्रिय भागीदारी रखनी होगी। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि अखबार में सभी तरह के आयु वर्ग के लोगों के हिसाब की सामग्री भी जाए और प्रासंगिक जनहित की खबरें जरूर प्रमुखता से दी जाएं। और विशेष कर उनमें किसी भी तरह की भाषाई त्रुटियां न हों। विद्यार्थियों को यह समझाना होगा कि अखबार पढ़ना मात्र सूचनाओं को, समाचारों को जानना नहीं बल्कि एकाग्रचित्ता और धैर्य व सहनशक्ति को भी बढ़ाने वाला होता है। अपने शैक्षिक पाठ्यक्रम से इतर कुछ पढ़ना उनकों अलग विषयों और दुनिया से रूबरू करा पाएगा। अखबारों में छपी हुई सामग्री को पढ़ने से धीरे-धीरे पढ़ा जाता है। इससे विद्यार्थी उस विषय को ठीक से समझते भी हैं और उन्हें इसको समझने के लिए समय भी मिलता है। कई विद्यालयों में शिक्षकों को यह शिकायत होती है कि प्रबंधन अखबारों को नहीं मंगाते हैं और अगर अखबार आते भी हैं तो विद्यार्थी उसे पढ़ने में रुचि नहीं लेते हैं। विद्यार्थियों में यह रूचि किस प्रकार से जागृत की जाए, यह शिक्षकों को करना होगा।
पहले के समय में स्क्रैपबुक बनवाई जाती थी, विद्यालय में ग्रीष्मकालीन अवकाश के गृह कार्यों में, जिसके लिए बहुत सारे अखबार अलटने- पलटने पड़ते थे। अब तो बच्चे सब कुछ चैट जीपीटी पर छोड़कर निश्चिंत हो गए हैं और अपना गृह कार्य कर लेते हैं, ढूंढने की तो मेहनत ही नहीं करनी पड़ती। अखबार पढ़ने से मानवीय संबंधों को जानने का बीज पड़ता है, संवेदना जागृत होती है और जमीन से जुड़े रहकर आगे बढ़ाने में भी अखबार का एक बड़ा योगदान होता है। ऐसे में उम्मीद करेंगे कि अखबार पढ़ना मात्र टांय-टांय फिस्स स्कीम न होकर देश के विद्यार्थियों का भविष्य गढ़ने में सहायक होगी। सभी निजी विद्यालयों को भी स्वत: इस तरह के नवाचार से खुद को जोड़ लेना चाहिए। आशा है कि भले ही यह परिवर्तन धीरे-धीरे होगा, एक लंबा समय लेगा क्योंकि यह बिल्कुल भी आसान नहीं है, पर यह होगा जरूर।


