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उड़ान तेरी, क्षितिज भी तेरा: कामकाजी महिलाओं की असली चुनौती
महिलाओं की शिक्षा और कामकाजी भागीदारी केवल मजबूरी नहीं, अधिकार और आत्मसंतुष्टि है। सामाजिक-पारिवारिक सोच बदले बिना बराबरी संभव नहीं।
Working Women in India: हमारे देश में महिलाओं का प्रतिशत कामकाजी क्षेत्रों में बढ़ता जा रहा है पर अधिकतर उनका काम अनौपचारिक क्षेत्र में होता है। कुछ दिन पूर्व दक्षिण भारत के एक मंत्री का यह बयान चर्चा में आया था जिसमें उन्होंने साफ-साफ कहा था कि दक्षिण भारत में महिलाओं को शिक्षा के लिए भेजा जाता है जबकि उत्तर भारत में महिलाओं को खाना बनाने और विवाह करके घर को संभालने के लिए कहा जाता है। भले ही हम उनके इस बयान की कितनी भी आलोचना कर लें और उसे दक्षिण भारत और उत्तर भारत के बीच भेदभाव तरीके से देखने वाला बताएं पर यह बात 100% नहीं भी हो तो भी एक बड़े प्रतिशत में सच है। उत्तर भारत में महिलाओं का शैक्षणिक और कामकाजी प्रतिशत दक्षिण भारत की तुलना में बहुत कम है जो कि इस अंतर को साफ दिखाता है। केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक आदि राज्यों में महिलाओं को सुरक्षित और सम्मानजनक आजीविका प्रदान करने को लेकर विशेष कार्य किया जा रहे हैं जबकि उत्तर भारत आज भी इस तरह की योजनाओं को मूर्त रूप प्रदान करने में पीछे ही रहा है।
जो समाज या क्षेत्र पुरुष सत्तात्मक मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, वहां महिलाओं- पुरुषों में यह भेद बढ़ता ही जा रहा है। परिवार, समाज और सभी रिश्तों को यह स्वीकार करना ही होगा कि कहीं किसी महिला का काम करना उसकी उसकी मजबूरी, विकल्प या आर्थिक परतंत्रता से भी अधिक उसका अधिकार व उसकी मानसिक संतुष्टि है। इस मानसिकता को बदल देने के लिए सामाजिक मानसिकता में बदलाव लाना जरूरी है। समाज की छोड़ भी दे तो भी परिवारजन और सबसे मुख्य बात किसी भी महिला के पति या पुरुष साथी पर निर्भर होता है कि वह महिला कार्य क्षेत्र में उतर पा रही है या नहीं और अगर उतरी है तो पुरुष और समाज की उसके ऊपर कितनी जिम्मेदारी है और पुरुष उसके कार्य में कितना हस्तक्षेप या अधिकार रखता है। हमारे देश में आज भी यह स्थिति कठिन बनी हुई है, यह हम सब जानते हैं ।
पुरुष वर्ग महिला को भले ही सुरक्षित रखने या उसकी अपनी समझ से आगे बढ़ाने या उसके काम को ठीक रखना दिखाने के लिए उसके साथ बड़ा ही कठोर और अपमानित सा व्यवहार करता है, उसको लगता है कि यह करने से वह यह जताता है कि उसे उसका कितना ख्याल है और वह उसकी कितनी चिंता करता है। जबकि महिला की स्थिति क्या होती है यह पुरुष वर्ग सोच ही नहीं पाता है कि जब एक महिला अशांत होती है, तब क्या होता है। एक महिला ही क्यों, कोई भी चाहे वह पुरुष हो, चाहे वह विद्यार्थी हो जब अशांत होते हैं तब उन्हें लगता है यह आकाश इस महासागर में समा जाए। ऐसा लगता है कि जैसे अंधेरा छितर-बिखर जा रहा है हमारे आसपास। लगता है मानो कि कितना विषाक्त हो उठा है यह वायुमंडल और छोड़ दिया गया हो आकाश में उन्मुक्त उड़ने वाले पंछी को समुद्र के पानी में तैरने के लिए। तब उसे लगता है कि उसके पास न तो आकाश है और न ही समुद्र। न हवा जिसमें वह जी सकता है और न ही वह पानी में तैर सकता है क्योंकि वह तो पक्षी है, जिसे मछली बनने को कहा जा रहा है।
हम यह सच स्वीकार करने को तैयार ही नहीं होते कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं और कमियां हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि अपेक्षाओं के कारण हम उस व्यक्ति की विशेषताओं को अनदेखा कर दें, उसे नकार दें। किसी की भी पूर्णतः उसकी उपलब्धियों में नहीं बल्कि उसके धैर्य में और उसकी सहजता में होती है। जब सकारात्मकता खत्म हो जाए और उसके जीवन में शिकायतें , नकारात्मक भावना जगह लें लें तो तनाव, उलझन, डर, संदेह जैसी भावनाएं किसी को भी प्रभावित कर सकती हैं, यहां तक की किसी भी रिश्ते के बीच समस्याएं भी पैदा कर सकती हैं। चाहे वह पति-पत्नी के बीच का रिश्ता हो, चाहे वह माता-पिता और विद्यार्थी या बच्चों के बीच का रिश्ता हो। जब तक जुड़वा की भावना नहीं होती किसी भी रिश्ते में तब तक समस्याओं से निपटने के लिए ,उन्हें सुलझाने की क्षमता भी खत्म हो जाती है या कम हो जाती है।
सामने वाले की भावनाएं समझे बिना ही उस पर अपनी भावनाएं डाल देने से किसी भी रिश्ते में भ्रम की स्थिति पैदा होती है और ऐसे रिश्ते अधिक लंबे समय तक साथ नहीं चल पाए और उनमें एक समय के बाद थकावट आने लगती है। दरअसल धैर्य की आवश्यकता होती है जो कि किसी भी रिश्ते को संतुलित और असरदार बनाती है। ओवर कम्युनिकेशन और अंडर कम्युनिकेशन दोनों ही किसी भी रिश्ते के लिए खतरे का संकेत होते हैं। किसी भी रिश्ते में सहजता बनाए रखना आवश्यक है। अन्यथा इनमें दूरी आ सकती है और जब तक यह बात हम नहीं समझते हैं, तब तक हम महिलाओं के आगे बढ़ने की या उनके प्रति प्रगतिवादी वाली सोच रखने की बात भी नहीं कर सकते हैं।
जब तक एक विद्यार्थी को उसके पढ़ने के अनुकूल माहौल नहीं मिलता, वह सकारात्मकता नहीं मिलती तब तक हम उससे किसी भी बेहतर प्रतिक्रिया अपेक्षा कैसे कर सकते हैं। इसी तरह से एक महिला को जब तक घर के अंदर एक अच्छा वातावरण नहीं मिलता, तब हम कैसे उससे घर के बाहर जाकर एक कामकाजी होने की या सारी उपलब्धियां से पूर्ण होने की अपेक्षा कर सकते हैं। दरअसल किसी भी पुरुष का अपना अहम् और उसके अंदर का डर उसको महिला पर हावी होने के लिए कहता है। यही वजह है कि वहां भावनाएं टकराती हैं और महिला और पुरुष के बीच एक खाई जैसी स्थिति आ जाती है। इसीलिए शैक्षणिक योग्यता को बढ़ाने के साथ-साथ उस शैक्षणिक योग्यता का पूरा सदुपयोग करना जरूरी है, तभी महिला और पुरुष के बीच की इस खाई को भरा जा सकता है। उसे यह कहने की जरूरत है कि यह उड़ान भी तुम्हारी है और यह क्षितिज भी तुम्हारा है तभी वह अपने आप को आत्मविश्वास और स्वतंत्र अनुभव करके अपने लिए कुछ कर सकेगी।
एक महिला जब अपने लिए कुछ करती है तो वह सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए करती है। और हमेशा हम उससे ही क्यों अपेक्षा करें कि वह परिवार को संभाल कर आगे बढ़े। एक पुरुष भी परिवार का उतना ही बड़ा हिस्सा होता है, जितना की एक महिला। उसका दायित्व भी उतना ही अधिक होता है परिवार के प्रति जितना की महिला का। अगर एक पुरुष बाहर से ऑर्थोपार्जन करके आता है तो एक महिला घर को जोड़े रखती है और यह सब की अपनी -अपनी विशेषता है तो इन विशेषताओं का एक दूसरे की विशेषताओं का सम्मान करके ही आगे बढ़कर इस तरह की विषमताओं को खत्म किया जा सकता है। कहते हैं न जितनी गर्मी पड़ती है शिरीष पर उतने ही ज्यादा सुंदर फूल आते हैं। अब यह महिलाओं पर है कि वह इस आग में तपकर किस तरह से कुंदन बनकर बाहर निकलतीं हैं और इस क्षितिज को अपना बनाती हैं। वैसे ही जैसे एक हवाई जहाज आकाश में ऊपर उठता जाता है, वैसे -वैसे वह हल्का होता जाता है। वह अधिक साफ और सुंदर तरीके से दुनिया को देखता है।


