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विश्वविद्यालयों का इनोवेशन ही भारत की प्रगति की कुंजी
योगेश मोहन का मत: विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग, तकनीक हस्तांतरण और शोध निवेश बढ़ाकर ही भारत विकसित व उन्नत राष्ट्र बन सकता है
Universities innovation process (Photo: Social Media)
किसी भी देश की प्रगति, उसके विश्वविद्यालयों के द्वारा किये गए इनोवेशन से आंकी जाती है। आज चीन का, विश्व के सिरमौर पद पर शोभित होने का मुख्य कारण, उसके द्वारा विश्वविद्यालयों को पूर्ण सहायता प्रदान करना है। वहाँ जो विश्वविद्यालय इनोवेशन में आगे आता है, उसको मुक्त कंठ से पूर्ण सहायता प्रदान की जाती है। आज चीन के विश्वविद्यालय, सम्पूर्ण विश्व में उच्च स्थान रखते हैं।
भारत की कम्पनियां टेक्नोलॉजी को आयात करने में विश्वास रखती है क्योंकि वह सस्ती पड़ती है। उन्हें यह समझने में देर लगती है कि कोई भी देश, अपनी उन्नत टेक्नोलॉजी कभी नहीं देगा। वह दूसरे देश को अपनी सेकेण्ड अथवा थर्ड ग्रेड टेक्नोलॉजी ही देता है और एडवांस टेक्नोलॉजी अपने पास रखता है। इसी कारण औद्योगिक उत्पादन में भारत, विश्व में जनसंख्या में सबसे आगे होने के बाद भी विश्व में 5वें पायदान पर है। आज चीन, अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे छोटे देश हमसे आगे हैं। इन सब देशों की प्रगति में इनके विश्वविद्यालयों की बहुत बड़ी भूमिका है।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि उसके विश्वविद्यालय स्थानीय और राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान पर केन्द्रित अनुसंधान करें। कृषि, स्वास्थ्य, ऊर्जा, पर्यावरण, जल प्रबंधन, डिजिटल प्रौद्योगिकी और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित तकनीकी समाधान, देश की जमीनी आवश्यकताओं से सीधे जुड़े होते हैं। जब यह अनुसंधान प्रयोगशालाओं तक सीमित न रहकर उद्योगों और समाज तक पहुँचता है, तब उसका वास्तविक प्रभाव दिखाई देता है।
भारत की प्रगति केवल आर्थिक ऑकड़ों, औद्योगिक उत्पादन या बुनियादी ढाँचे के विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बौद्धिक और नवाचार क्षमता पर आधारित है जो देश के शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थानों से उत्पन्न होती है। विशेष रूप से. भारतीय विश्वविद्यालयों का नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र (Innovation Ecosystem) भारत को विकसित (Viksit)" और 'उन्नत (Unnat) भारत' की दिशा में ले जाने का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। विश्वविद्यालयों में होने वाला अनुसंधान, नवाचार और तकनीकी विकास, यदि सरकार के सतत् समर्थन और प्रभावी नीतिगत ढाँचे के साथ भारतीय उद्योगों तक पहुँचता है, तो यह न केवल आर्थिक विकास को गति देता है, बल्कि सामाजिक, तकनीकी और वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति को भी सुदृढ़ करता है।
तकनीक हस्तांतरण (Technology Transfer), इस पूरे नवाचार चक्र का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। जब विश्वविद्यालयों में विकसित शोध और तकनीक भारतीय उद्योगों तक पहुँचती है, तब ज्ञान का वास्तविक व्यावसायिक और सामाजिक उपयोग संभव होता है। पेटेंटिंग, बौद्धिक संपदा अधिकार, लाइसेंसिंग और उद्योग साझेदारी के माध्यम से विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच एक मजबूत सेतु निर्मित होता है। इससे उद्योगों को स्वदेशी तकनीक प्राप्त होती है, आयात पर निर्भरता घटती है और उत्पादन की गुणवत्ता एवं प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होती है।
विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग न केवल तकनीक हस्तांतरण को सरल बनाता है, बल्कि विद्यार्थियों को भी वास्तविक औद्योगिक अनुभव प्रदान करता है। इंटर्नशिप, संयुक्त अनुसंधान परियोजनाएँ और उद्योग प्रायोजित प्रयोगशालाएँ छात्रों को रोजगारोन्मुखी कौशल प्रदान करती है। इससे उच्च शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई कम होती है और युवा शक्ति देश के विकास में अधिक प्रभावी भूमिका निभा पाती है। यही युवा शक्ति विकसित और उन्नत भारत की सबसे बड़ी पूँजी है।
हालाँकि, इस दिशा में कुछ चुनौतियों भी मौजूद हैं। कई विश्वविद्यालयों में अनुसंधान अधोसंरचना की कमी, उद्योग सहभागिता का अभाव और नवाचार संस्कृति का सीमित विकास देखने को मिलता है। इन चुनौतियों का समाधान तभी संभव है जब सरकार, विश्वविद्यालय और उद्योग एक साझा दृष्टिकोण के साथ कार्य करें। अनुसंधान में निवेश बढ़ाना, नीति-निर्माण को सरल और पारदर्शी बनाना तथा नवाचार को प्रोत्साहित करने वाला वातावरण तैयार करना अनिवार्य है।
भारत के साथ दूसरी बड़ी समस्या ब्रेन ड्रेन है। भारत से उच्च स्तर का मस्तिष्क, भारत में सम्मान प्राप्त न होने कारण, अमेरिका, जापान, जर्मनी में पहुँच जाता है और वहाँ के विकास में सहयोग प्रदान करता है। इस समस्या से निपटने के लिए यह आवश्यक है कि देश में प्रतिमाओं को आकर्षक अवसर, सम्मानजनक कार्य वातावरण और दीर्घकालिक कैरियर की स्पष्ट संभावनाएँ उपलब्ध कराई जाएँ। इसके लिए विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में विश्वस्तरीय शोध अधोसंरचना, पर्याप्त और सतत् अनुसंधान, अनुदान तथा अकादमिक और पेशेवर स्वतंत्रता सुनिश्चित करनी होगी। सरकार को उद्योग विश्वविद्यालय सहयोग को मजबूत करते हुए शोध आधारित स्टार्ट-अप, नवाचार केंद्र और तकनीक हस्तांतरण की प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, ताकि प्रतिभाशाली युवाओं को अपने ज्ञान और कौशल का व्यावहारिक उपयोग देश में ही करने का अवसर मिले। साथ ही, प्रतिस्पर्धी वेतन, पारदर्शी और योग्यता आधारित पदोन्नति प्रणाली, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के अवसर और बेहतर जीवन स्तर प्रदान कर, भारत को एक ऐसा गतव्य बनाना होगा, जहाँ प्रतिभाएँ न केवल रुकें, बल्कि विदेश गई प्रतिभाएँ भी लौटकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दें।
इस संपूर्ण प्रक्रिया में सरकार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। अनुसंधान नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास के लिए सरकार द्वारा दिया गया वित्तीय, नीतिगत और संरचनात्मक समर्थन विश्वविद्यालयों को सशक्त बनाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है. जिसका उद्देश्य शिक्षा को अनुसंधान उन्मुख, बहुविषयक और नवाचार-आधारित बनाना है। यह नीति विश्वविद्यालयों को अकादमिक स्वतंत्रता, उद्योग-सहयोग और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने का मार्ग प्रशस्त करती है।
सरकार द्वारा विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, जैव प्रौद्योगिकी विभाग, यूजीसी, एआईसीटीई और अन्य एजेंसियों के माध्यम से दिए जाने वाले अनुसंधान अनुदान विश्वविद्यालयों में उन्नत प्रयोगशालाओं, शोध परियोजनाओं और नवाचार केंद्रों की स्थापना को संभव बनाते हैं। इसके साथ-साथ स्टार्टअप इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसी पहलें अनुसंधान आधारित उद्यमिता को बढ़ावा देती हैं। इन पहलों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विश्वविद्यालयों में विकसित तकनीकें केवल अकादमिक उपलब्धि न बनकर, औद्योगिक उत्पाद और सेवाओं के रूप में सामने आएँ।
भारत को विश्व में उच्च स्थान पर होना है तो उसको इनोवेशन का रिस्क तो लेना ही पड़ेगा


