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Women Voters in India: मजबूत वोटर पर कमजोर निर्णायक भूमिका में महिलाएं
Women Voters in Assembly Elections 2026: असम विधानसभा चुनाव में महिला मतदाता संख्या मजबूत होने के बावजूद उम्मीदवार और प्रतिनिधित्व में उनकी भागीदारी बेहद कम है, जो राजनीति में लैंगिक असमानता को उजागर करता है।
Women Political Participation India (Image Credit-Social Media)
Women Voters in India: देश के लोकतंत्र में सहभागिता दो तरह से संभव होती है। एक तो मतदान करके और दूसरा सत्ता में आकर। सरकार के किसी भी स्तर पर निर्णय लेने की भूमिका में आकर, कानून बनाने में भागीदारी करके या सहयोगात्मक रूप से निर्णय लेकर। हमारे देश के संविधान ने अपने निर्माण के समय से ही महिला और पुरुष दोनों को समान नागरिक अधिकार व कर्तव्य वाला मानते हुए मताधिकार का और चुनाव लड़कर राजनीति में आने का अधिकार दिया है। लेकिन क्या यह वाकई जमीनी स्तर पर भी ऐसा ही है? क्या देश के नागरिकों के राजनीति में आने के रास्तों का, अधिकारों का लैंगिक वर्गीकरण नहीं किया जा चुका है ? किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव होना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी होते हैं। देश का मतदाता और मतदाता सूची उन चुनावों की मजबूत रीढ़। ये वही मतदाता हैं जो अपनी रोजी-रोटी छोड़कर, ट्रेन या सड़क परिवहन से सफर करके घंटों कतारों में खड़े रहकर अपना मत प्रयोग करते हैं। इस तरह से देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक गणतंत्र व्यवस्था से भी जुड़ते हैं और उन्होंने ही इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए और बचाए रखा है।
इस समय देश के पांच राज्यों केरल, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव और 6 राज्यों में उपचुनाव की प्रक्रिया चल रही हैं। सभी राज्यों में अलग-अलग दलों की अलग-अलग स्थिति है। कोई दल एक राज्य में अपने गठबंधन के साथ मजबूत स्थिति में है तो दूसरे राज्य में कमजोर स्थिति में। असम के विधानसभा चुनाव की जब हम बात करते हैं तो महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत पुरुष उम्मीदवारों की अनुपात में 10 फ़ीसदी भी नहीं है। जबकि वर्तमान 126 सदस्य विधानसभा में मात्र 6 महिला विधायकों की उपस्थिति राजनीति में उनकी सक्रियता के कम अनुपात को दर्शाती है। यह संख्या पिछली विधानसभाओं की तुलना में न्यूनतम है और पूरे देश के अन्य राज्यों की विधानसभाओं की तुलना में भी सबसे कम। क्या मताधिकार का हक मात्र होने से ही लोकतंत्र में महिलाओं की सहभागिता सुनिश्चित हो जाती है? अभी हाल ही में निर्वाचन आयोग द्वारा असम की मतदाता सूची प्रकाशित की गई, जिसके अनुसार राज्य के सभी 126 विधानसभा क्षेत्रों के लिए मतदाताओं की कुल संख्या 2 करोड़ 49 लाख 58 हजार 139 है। जिसमें एक करोड़ 24 लाख 82 हजार 213 पुरुष मतदाता और एक करोड़ 24 लाख 75 हजार 588 महिला मतदाता व 343 थर्ड जेंडर मतदाता हैं। यानी महिला और पुरुष मतदाताओं की संख्या लगभग समान है। लेकिन चुनावों में खड़े कुल 722 उम्मीदवारों में मात्र 59 महिला उम्मीदवार चुनाव में खड़ी हैं, यानी कुल उम्मीदवारों का लगभग 8 फ़ीसदी है। भाजपा ने 6 और कांग्रेस ने 9 महिला उम्मीदवारों को विधानसभा चुनाव का टिकट दिया है।
असम का इतिहास देंखे तो हम पाते हैं कि असम की महिलाओं ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर विभिन्न सामाजिक- राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई है। लेकिन इनमें से किसी भी महिला ने प्रदेश के नीति निर्धारक पदों पर अपना स्थान पक्का नहीं किया। 1951- 52 में असम विधानसभा चुनाव में मात्र एक महिला विधायक थीं, उषा बरठाकुर जो कि सामागुड़ी विधान सभा क्षेत्र से विधायक थीं। 2011 में गठित 13 वीं विधानसभा में 981 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, जिसमें से 85 महिलाएं थीं। उसमें से 15 महिलाओं ने जीत दर्ज की। उसके बाद महिला उम्मीदवारों की संख्या भले ही घटी या बढ़ी हो पर महिला विधायकों की संख्या में लगातार गिरावट आई है ।
महिला मतदाताओं की संख्या में वृद्धि के बावजूद, उम्मीदवारों और निर्वाचित सदस्यों में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी कम बना हुआ है। असम की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री सैयदा अनवरा तैमूर (1980-81) रही हैं। इसके अलावा प्रमिला रानी ब्रह्मा, अनंता निओग (छ: बार विधायक), विजया चक्रवर्ती और सुष्मिता देव, रत्ना सिंह प्रमुख महिला नेता रही हैं।
इस बार के चुनावों के परिणामों से पता चलेगा कि इस प्रवृत्ति में कोई सकारात्मक बदलाव आता है या नहीं। आखिर इसका क्या कारण है? दरअसल देश और प्रदेशों की राजनीति की प्रकृति और सोच वर्तमान में बहुत ही आक्रामक और कीचड़ उछालने वाली हो गई है। चुनावी प्रतिद्वंदिता में महिलाओं पर चरित्र संबंधी आरोप या व्यक्तिगत आरोप लगाना विरोधी पार्टियों का एक सबसे आसान सा हथियार बन जाता है, जिससे महिलाएं और उनके परिवारजन बचना चाहते हैं। इसलिए वे राजनीति के क्षेत्र में आने से हिचकिचाती हैं । कहीं -कहीं पर महिलाएं पद पर या विधायकी पर आती हैं। लेकिन उनके ऊपर परिवार के पुरुषों का या पार्टी के पुरुषों का इतना अधिक दबाव होता है कि वे मात्र मुखौटा बनकर रह जाती हैं, जिससे वे वास्तव में अगर कुछ सकारात्मक काम करना भी चाहती हैं तो भी उन्हें वह खुलापन नहीं मिलता है। इस राजनीति के दलदल में वे भी पुरुषों के समान ही फंसती चली जाती हैं या फंसा दी जाती हैं। इन समझौतों से उनका आत्म-सम्मान और राजनीतिक कद दोनों पर आंच आती है।
असम की सामाजिक जड़ों में पितृसत्तात्मक समाज गहरी पैठ रखता है, जो कि महिलाओं को अपनी परंपरागत भूमिका तक सीमित रहने को बाध्य करता है। विभिन्न पार्टियां भी सीटों को हारने के डर से महिला उम्मीदवारों को मैदान में नहीं उतारती हैं। बशर्तें कि जब तक वह मजबूत दमखम और रसूख वाली न हो। पार्टियां उन्हें 'जीतने योग्य' नहीं या हारने वाली सीटों से खड़ा करती हैं। राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को अधिक टिकट देना ही इस असंतुलन को दूर कर सकता है। चुनाव के दौरान होने वाली हिंसा, डराना-धमकाना और ऑनलाइन दुर्व्यवहार भी महिलाओं को राजनीति से दूर रखता है। आर्थिक कारण भी महिलाओं को चुनाव में भाग लेने में बड़ा कारण होते हैं। लैंगिक समानता की संस्कृति को बढ़ावा देना होगा जिसमें शिक्षा एक महत्वपूर्ण कारक बन सकती है।
प्रदेश में यद्यपि महिला मतदाता अधिक हैं, फिर भी टिकट वितरण में पार्टियों द्वारा महिलाओं की अनदेखी की गई है। महिलाओं के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं जैसे कि अरुणोदय और उज्ज्वला योजना ने महिलाओं में मताधिकार के प्रयोग को बढ़ावा दिया है। पर सामाजिक और पुरुष-प्रधान राजनीतिक ढांचे के कारण महिलाएं विधानसभा सीटों के लिए चुनाव लड़ने में कतराती हैं। असम में महिलाओं की राजनीतिक स्थिति का यह विरोधाभास है कि वे 'वोटर' के रूप में बहुत मजबूत हैं। लेकिन 'नेता' के रूप में विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी नगण्य है। 2026 के विधानसभा चुनाव में भी महिलाओं की भागीदारी कम रहने की रिपोर्टें इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं। चुनाव परिणाम के बाद पता चलेगा कि महिला उम्मीदवारों की जीत -हार का ऊंट किस करवट बैठता है।
( लेखिका प्रख्यात स्तंभकार हैं।)


