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Mendhak Mandir Information: जहां मेढक पर विराजे हैं शिव
Mendhak Mandir Ka Itihas: उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी स्थित अनोखे मेढक मंदिर की रोचक कहानी जानिए, जहां मेढक की पीठ पर विराजमान हैं भगवान शिव।
Lakhimpur Kheri Famous Temple Mendhak Mandir
Mendhak Mandir Information: देश में तमाम तीर्थस्थान और देवस्थान करोड़ों सनातनधर्मियों की आस्था का केंद्र होने के साथ ही अपनी भव्यता के कारण प्रख्यात हैं। रामलला की जन्मभूमि पर बन रहा मंदिर अपनी भव्यता लेकर पूर्ण होने को है तो काशी विश्वनाथ धाम ने विश्व की पुरातन नगरी को एक नूतन स्वरूप दे दिया है। इन सबके बीच कुछ ऐसे भी देवस्थान हैं, जो सदियों से भक्तों को आकर्षणपाश में बांधे हुए हैं। इन्हीं में से एक है लखीमपुर, उत्तर प्रदेश का मेढक मंदिर। मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर स्थित कस्बा ओयल में बना मेढक मंदिर ऐसा अनूठा मंदिर है, जहां नंदीजी की मूर्ति खड़ी मुद्रा में है, जबकि बाकी शिवमंदिरों में नंदी बैठे रहते हैं। इस मंदिर की पूरे देश में अलग पहचान इसलिए भी है क्योंकि यह पूरा मंदिर मेढक की पीठ पर बना है, जिसके मुख के पास मगरमच्छ की आकृति बनी है। मंदिर के चारों ओर बने गुंबदों में भूलभुलैया की तरह सीढ़ियां बनी हैं, जो अब बंद हैं। मंदिर में स्थापित नर्मदेश्वर का प्रतिदिन श्रृंगार होता है। एक खास बात और है कि यह पूरा मंदिर हवनकुंड की परिधि के ऊपर बना हुआ है, जिसके ऊपर नर्मदेश्वर महाराज की स्थापना की गई है।
अद्भुत है रंग परिवर्तन
इस मंदिर का निर्माण 250 वर्ष से भी पहले तत्कालीन ओयल स्टेट के राजा बख्श सिंह ने करवाया था। जानकार बताते हैं कि उस वक्त राजा ने युद्ध में जीते हुए धन के सदुपयोग और राज्य में सुख, शांति व समृद्धि के लिए इसका निर्माण करवाया था। जनश्रुति यह भी है कि उस वक्त अकाल से बचने के लिए किसी तांत्रिक की सलाह पर इसका निर्माण करवाया गया था। यह प्राचीन शिवमंदिर विशाल मेढक की मूर्ति की पीठ पर बना है। इस मेढक का मुंह उत्तर दिशा में, धड़ दक्षिण में तथा पूरब और पश्चिम में इसके पैर दिखाई देते हैं। मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित जल नलिकाओं के माध्यम से मेढक के मुंह से निकलता है। वाराणसी के विद्वानों और कपिला के तांत्रिकों की देखरेख में इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। मेढक की आकृति के ऊपर 15 फीट ऊंचे चबूतरे पर बने मुख्य मंदिर के चबूतरे का निर्माण श्रीयंत्र के अनुसार है। मंदिर के गर्भगृह में सहस्त्र कमल की पंखुड़ियों से युक्त अर्घे पर नर्मदा से लाया गया दिव्य शिवलिंग स्थापित है। यहां प्रतिदिन कस्बे के साथ आसपास के गांवों से लेकर शहरों तक के लोग पूजन-अर्चन को आते हैं व महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर सुबह सर्वप्रथम यहां के राजा विष्णु नारायण दत्त सिंह का परिवार पूजन-अर्चन कर नर्मदेश्वर का आशीर्वाद लेता है, जिसके बाद शिवभक्तों के लिए कपाट खोल दिए जाते हैं। सावन माह में यहां पर कांवड़ियों का तांता लगा रहता है। मंदिर के पुजारी शांति तिवारी ने बताया, “मैं करीब 16 वर्ष से मंदिर में पूजन-अर्चन कर रहा हूं। इसकी कई विशेषताएं हैं। इसमें स्थापित शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। उक्त स्थापित शिवलिंग नर्मदा नदी से आया था, इसलिए शिवलिंग को नर्मदेश्वर महाराज का नाम दिया गया।”
मनमोहक है स्थापत्य कला
पूरे मंदिर पर राजस्थानी स्थापत्य कला प्रदर्शित की गई है, जो कि अपने में विशेष है। पूरा मंदिर मंडूक यंत्र पर आधारित है। मंदिर के सबसे ऊपर लगा छत्र पूर्व में सूर्य की किरणों की दिशा में घूमता रहता था, वह अब क्षतिग्रस्त हो गया है। इतिहासकारों के मुताबिक, मंदिर की बाहरी दीवारों पर उत्कीर्ण शव-साधना करती मूर्तियां इसके तांत्रिक मंदिर होने का प्रमाण हैं। ओयल शैव संप्रदाय का प्रमुख केंद्र था। यहां के शासक भगवान शिव के उपासक थे। यह क्षेत्र 11वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी तक चाहमान शासकों के अधीन रहा। चाहमान वंश के राजा बख्श सिंह ने इस अद्भुत मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर की वास्तु-परिकल्पना कपिला के एक महान तांत्रिक ने की थी। तंत्रवाद पर आधारित इस मंदिर की वास्तु-संरचना अपनी विशेष शैली के कारण मन मोह लेती है। मेढक मंदिर में सावन, महाशिवरात्रि के अलावा दीपावली पर भी भक्त बड़ी संख्या में दर्शन के लिए आते हैं।
(साभार ‘दैनिक जागरण’)।


