Nishkalank Mahadev Temple: समुद्र के बीच में स्थित अदभुत शिव मंदिर

Nishkalank Mahadev Temple: गुजरात के भावनगर के पास समुद्र के बीच स्थित निष्कलंक महादेव मंदिर एक रहस्यमयी शिव धाम है, जो ज्वार-भाटा के साथ दिखाई देता और डूब जाता है। जानिए इसका इतिहास, मान्यता और दर्शन का सही समय।

Sarojini Sriharsha
Published on: 19 Jan 2026 2:03 PM IST
Nishkalank Mahadev Temple
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Nishkalank Mahadev Temple (Image Credit-Social Media)

Nishkalank Mahadev Temple: भारत देश में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो अपने अनोखे कारणों से विश्व विख्यात है। इन्हीं में से एक है गुजरात राज्य के भावनगर शहर के निकट कोलियाक तट पर स्थित निष्कलंक शिव मंदिर। यह मंदिर अरब सागर के अंदर करीब एक किमी अंदर स्थित है और उच्च ज्वार के दौरान दिन में कई घंटों तक समुद्र में डूबा रहता है और ज्वार कम होने के बाद यह मंदिर दिखाई देता है। जलमग्न मंदिर के दौरान केवल ध्वज और एक स्तंभ ही दिखाई देते हैं। इस मंदिर में श्रद्धालु नंगे पैर चलकर दर्शन करने जाते हैं। मंदिर पहुंचने पर श्रद्धालु सर्वप्रथम पांडव तालाब नामक पोखरी में हाथ-पैर धोकर या स्नान करके फिर मंदिर के दर्शन करते हैं।


भारत देश में कुल 5 गुप्त तीर्थ मंदिर हैं जिनमें से 3 प्रकट और 2 अप्रकट हैं। तीन प्रकट गुप्त मंदिर रुपेश्वर , श्री स्तंभेश्वर और निष्कलंक महादेव के नाम से जाने जाते हैं। अमावस्या और पूर्णिमा के दिनों में ज्वार-भाटा ज्यादा सक्रिय रहने के कारण श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए बहुत देर इंतजार करना पड़ता है। इसलिए मंदिर जाने से पहले समुद्र के उच्च और निम्न ज्वार-भाटे का समय अवश्य जान लेना आवश्यक होता है। इस मंदिर का रहस्य वास्तव में आधुनिक इंजीनियरों और विशेषज्ञों के लिए अभी भी खोज का विषय बना हुआ है।

इस मंदिर में एक वर्गाकार चबूतरे पर पांच अलग-अलग स्वयंभू शिवलिंग स्थापित हैं और प्रत्येक लिंग की ओर मुख किए नंदी की प्रतिमा विराजमान है। ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध के समाप्ति के बाद पांडवों ने अपने पापों के प्रायश्चित के लिए पांच स्वयंभू शिवलिंग स्थापित किए थे जिनमें से यह भी एक है।

यहां की एक लोक मान्यता के अनुसार लोग अपने परिजनों की चिता कि राख शिवलिंग पर लगाकार जल में प्रवाहित करते हैं जिससे उस मृत आत्म को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में भगवान शिव को भक्त राख, दूध, दही और नारियल अर्पित करते हैं।

मंदिर निर्माण की कथा :


इस रहस्यमयी मंदिर की कहानी महाभारत काल से जुड़ी है। दरअसल महाभारत के दौरान कौरवों के संहार के बाद पांडव अपने परिजनों का संहार कर पाप का अनुभव कर रहे थे, इसी पाप से मुक्ति के लिए उन्होंने कृष्ण से प्रार्थना की और प्रायश्चित का उपाय पूछा। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें एक काला ध्वज और गाय देकर भगवान शिव की उपासना करने को कहा। उन्होंने कहा कि जब उनके पाप माफ हो जाएंगे तब ध्वज और गाय दोनों सफेद रंग के हो जाएंगे। कई वर्षों तक उन दोनों चीजों के साथ यात्रा कर पांडव अलग अलग जगहों पर गए लेकिन ध्वज और गाय के रंग में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आखिर में जब पांडव गुजरात के कोलिया तट पर पहुंचे और शिव की आराधना की जहां उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव लिंग रूप में प्रकट हुए और गाय तथा ध्वज दोनों सफेद रंग के हो गए। यहां भगवान शिव ने पांडव के पांचों भाइयों को लिंग के रूप में अलग अलग दर्शन दिए इसलिए इस जगह पांच शिवलिंग के साथ नंदी विराजमान हैं। इसके बाद यहां प्रकट इस शिवलिंग का नाम निष्कलंक महादेव रखा गया । निष्कलंक शब्द का अर्थ होता है पाप-मुक्त होना। ऐसा माना जाता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन करने से भक्त सभी पाप से मुक्त हो जाते हैं। सदियों तक यह मंदिर समुद्र के अंदर गुप्त रूप से लहरों के बीच स्थित था और बाद में यह दिन ढलने के बाद ज्वार कम होने से प्रकट होने लगा। जलमग्न के दौरान सिर्फ ध्वज और स्तंभ दिखाई देता है।

मंदिर परिसर में उत्सव :


इस मंदिर में महाशिवरात्रि, अमावस्या और पूर्णिमा जैसे अवसरों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। इस जगह भाद्रपद अमावस्या पर ‘भादरवी’ नामक एक प्रसिद्ध मेला का आयोजन होता है। इस मौके पर भावनगर के महाराजा द्वारा मंदिर में झंडा फहराया जाता है और दुबारा यह झंडा एक साल बाद अगले उत्सव के दौरान बदला जाता है।

कैसे पहुंचें ?

  • हवाई मार्ग से यहां पहुंचने के लिए गुजरात का भावनगर हवाई अड्डा निकटतम हवाई अड्डा है। यहां से यह मंदिर करीब 3.5 किमी दूरी पर स्थित है। यह हवाई अड्डा देश के सभी प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
  • रेल मार्ग से पहुंचने के लिए ट्रेन से आप अहमदाबाद आकर भावनगर आ सकते हैं। मुंबई से लगातार यहां के लिए ट्रेन चलती हैं, इस तरह मुंबई से भी यहां पहुंचने का विकल्प अपना सकते हैं।
  • सड़क मार्ग से गुजरात आकर यहां से भावनगर तक पहुंचने के लिए बस , टैक्सी का चुनाव कर सकते हैं। राजकोट , अहमदाबाद, वडोदरा और पालीताना से यहां आसानी से पहुंच सकते हैं।

अक्टूबर से मार्च तक का समय यहां आने के लिए अच्छा रहता है, लेकिन ज्वार भाटा का समय पता लगाकर इस दौरान इस मंदिर का दर्शन करने जा सकते हैं।

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