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UP News: पंचायत चुनाव से पहले बड़ा विवाद! ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर कोर्ट की टिप्पणी
UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पंचायत चुनाव तक मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के यूपी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने सरकार से 3 जून तक जवाब मांगा है।
UP News: उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को लेकर राज्य सरकार के एक फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सवाल उठाए हैं। अदालत ने सरकार से पूछा है कि पंचायत चुनाव होने तक मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाए रखने का फैसला किस आधार पर लिया गया है। कोर्ट ने राज्य सरकार को इस मामले में अपना पक्ष स्पष्ट करने के लिए कहा है।
क्या है पूरा मामला?
राज्य सरकार ने 25 मई को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश के तहत प्रदेश के वर्तमान ग्राम प्रधानों को पंचायत चुनाव संपन्न होने और नए प्रधानों के पदभार ग्रहण करने तक ग्राम पंचायतों का प्रशासक नियुक्त किया गया है। सरकार के इस फैसले के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें प्रशासक बनाना कानून की भावना के अनुरूप नहीं है।
हाईकोर्ट में हुई सुनवाई
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति शेखर बी. सर्राफ और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की अवकाशकालीन पीठ ने की। यह याचिका अधिवक्ता ओम प्रकाश प्रजापति की ओर से दाखिल की गई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह 3 जून को अपना पक्ष रखे और बताए कि यह निर्णय किन नियमों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर लिया गया है।
याचिका में क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ता का कहना है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम के अनुसार ग्राम प्रधान का कार्यकाल शपथ ग्रहण की तारीख से अधिकतम पांच वर्ष तक ही होता है। ऐसे में कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसी व्यक्ति को प्रशासक बनाना उसके कार्यकाल को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने जैसा है। याचिका में कहा गया है कि यह व्यवस्था कानून की मंशा के विपरीत दिखाई देती है और इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
पहले कैसे होती थी व्यवस्था?
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि पहले जब किसी कारणवश पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाते थे, तब ग्राम पंचायतों के संचालन के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। आमतौर पर एडीओ पंचायत या अन्य सक्षम सरकारी अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया जाता था, ताकि पंचायतों का कामकाज प्रभावित न हो। याचिका में मांग की गई है कि इस बार भी यही व्यवस्था अपनाई जानी चाहिए।
अब सरकार के जवाब का इंतजार
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब सभी की नजर राज्य सरकार के जवाब पर टिकी हुई है। सरकार को अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का फैसला कानूनी रूप से कितना उचित है। मामले की अगली सुनवाई 3 जून को होगी। माना जा रहा है कि इस सुनवाई में आने वाला फैसला प्रदेश की पंचायत व्यवस्था और आगामी पंचायत चुनावों की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।


