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चमारी की पैरवी से मुस्कराया चमरहा, दलित सूचक नाम से मुक्ति की आस
जालौन के चमारी गांव में पुस्तकालय उद्घाटन के बाद गांव के जातिसूचक नाम को लेकर बहस छिड़ी, नाम बदलने की मांग को लेकर मुख्यमंत्री को पत्र भेजा गया।
Banda News: चर्चित पत्रकारों में शुमार सौरभ द्विवेदी इन दिनों अपने गांव चमारी को लेकर चर्चा में हैं। उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की काल्पी तहसील के चमारी में महिला दिवस पर मां की मौजूदगी में सौरभ के पुस्तकालय का लोकार्पण देखते बना। समारोह में जुटीं हस्तियों के रोचक प्रेरक प्रसंगों की धूम रही। जबकि सौरभ ने बुंदेलखंड को ऐसे ही 100 पुस्तकालय देने का संकल्प व्यक्त कर सभी को गुदगुदाया। लेकिन सौरभ को अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनके गांव चमारी का नाम उन पर तंज का सबब बनेगा। सोशल मीडिया में सौरभ को यह कहकर आड़े हाथों लिया जा रहा है कि 'लब्धप्रतिष्ठित पत्रकार ने गांव का दलित सूचक नाम बदलवाने के लिए कुछ नहीं किया।' शायद उन्हें सूझा ही नहीं। पूर्व IPS देवी सिंह अशोक ने चमारी गांव का नाम बदलने के लिए CM योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर चर्चा को बल दिया है। डा. लालजी निर्मल जैसे दलित चितेरे भी एक्टिव हो गए हैं। इसका हश्र जो हो, लेकिन चमारी की पैरवी ने बांदा जिले के चमरहा गांव को मुस्कराने की वजह दी है। शायद वाया चमारी चमरहा को भी दलित सूचक नाम से मुक्ति मिल जाए!
पुस्तकालय के भव्य लोकार्पण से चमारी की चर्चा का नया एंगल
देश राग संस्थान के तत्वावधान में माता प्रसाद पुस्तकालय के लोकार्पण में मेजबान सौरभ द्विवेदी और उनकी पत्नी के बीच उनकी मां आकर्षण का केंद्र रहीं। जबकि बतौर मेहमान पत्रकार रहे राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश, उत्तर प्रदेश के डिप्टी CM ब्रजेश पाठक, नोबल विजेता कैलाश सत्यार्थी, शिक्षाविद विकास दिव्य कीर्ति, अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे, चर्चित कवि कुमार विश्वास, हास्य कलाकार और कहानीकार जाकिर खान, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा, पत्रकार पंकज झा और MLA प्रतीक भूषण सिंह, राकेश गोस्वामी व प्रकाश द्विवेदी समेत विभिन्न क्षेत्रों के जाने-माने लोगों ने समारोह की शोभा बढ़ाई। सबने पुस्तकालय का महत्व रेखांकित किया। रोचक प्रेरक प्रसंग साझा किए। पत्रकार सौरभ ने मां की त्याग तपस्या का जिक्र कर सभी का आभार व्यक्त किया। बुंदेलखंड को 100 पुस्तकालयों के तोहफे के ऐलान में भी कोई कंजूसी नहीं की। इस सबके चलते चमारी की चर्चा चल निकली। लेकिन अगले ही दिन चर्चा को नया एंगल मिला और पत्रकार सौरभ लोगों के निशाने पर आ गए।
चमारी नाम भावनाओं पर प्रहार, बदलाव से सामाजिक समरसता को मजबूती
पत्रकार डा. अतुल मोहन सिंह ने FB में चमारी गांव का दलित सूचक नाम परिवर्तन जरूरी बताते हुए तंज किया, "इसी गांव के लब्धप्रतिष्ठित पत्रकार सौरभ द्विवेदी को यह नाम कभी नहीं चुभा।" यह भी जोड़ा कि गांधी और अंबेडकर में एक अंतर यह भी था कि गांधी ने दलित दर्द नहीं झेला। अंबेडकर ने जिया था। साथ ही बताया कि पूर्व IPS देवी सिंह अशोक ने चमारी का नाम बदलने के लिए CM को पत्र लिखा है। पत्र भी साझा किया। दलितों को चुभने वाले नाम बदलाव के लिए डा. लालजी निर्मल की CM से मुलाकात की तैयारियों का भी जिक्र किया। पूर्व IPS अशोक ने अपने संगठन BSS (बहुजन सशक्तिकरण संघ) की ओर से CM को लिखे पत्र में चमारी गांव के नाम को जातिसूचक और आपत्तिजनक बताते हुए नाम परिवर्तन की मांग बुलंद की है। उनका मानना है कि इससे एक बड़े वर्ग की भावनाएं आहत होती हैं। संवेदनशीलता और न्यायप्रियता का तकाजा है कि चमारी का सम्मानजनक, प्रेरणादायक और सर्वमान्य नामकरण किया जाए। इससे सामाजिक समरसता को बल मिलेगा। इधर, सोशल मीडिया में चमारी के बहाने सौरभ द्विवेदी पर निशाना साधने का दायरा और चौड़ा हुआ है।
चमरहा की मुस्कान के बीच असमंजस में चमरौड़ी, MLA पर सवाल
देखना होगा, चमारी का जातिसूचक नाम बदलने की मांग का शासन कितना संज्ञान लेता है। लेता भी है या नहीं। लेकिन नाम परिवर्तन की इस पैरवी ने बांदा जिले के जातिसूचक नाम वाले चमरहा गांव को मुस्कुराने का मौका दिया है। शायद वाया चमारी चमरहा को भी जातिसूचक नाम से मुक्ति मिल जाए। लेकिन बांदा शहर का चमरौड़ी इलाका असमंजस में है। इलाकाई लोग कहते हैं कि चमारी नाम जब उसके वाशिंदे चर्चित पत्रकार सौरभ द्विवेदी को नहीं चुभा तो उनके मेहमान रहे बांदा सदर MLA प्रकाश द्विवेदी को भी चमरौड़ी नाम चुभने में संदेह है। संभव है इधर उनका ध्यान ही न गया हो, लेकिन अब जब चमारी के जातिसूचक नाम परिवर्तन की मांग उछली है तब इस ओर प्रकाश द्विवेदी के ध्यानाकर्षण की उम्मीद तो की ही जा सकती है। चमरहा और चमरौड़ी को जातिसूचक नामों से मुक्त कराने की कोई तो सार्थक पहल होनी ही चाहिए।


