वाराणसी कैथी गांव के मारकंडेय महादेव, जहां यमराज भी हार मान गए

वाराणसी–गाजीपुर सीमा के कैथी गांव स्थित मारकंडेय महादेव मंदिर का पौराणिक महत्व, जहां कथा अनुसार यमराज ने शिव के सामने पराजय स्वीकार की; यहीं गंगा–गोमती संगम भी होता है।

Rajnish Mishra
Published on: 7 Dec 2025 5:10 PM IST
Ghazipur Markandeya Mahadev Dham (Image Social Media)
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Ghazipur Markandeya Mahadev Dham (Image Social Media)

गाजीपुर । उत्तर प्रदेश का वाराणसी नगरी काशी जिसे मोच्छ नगरी भी कहा जाता है । इसी मोच्छ नगरी में एक बार यमराज को भगवान भोले नाथ की कृपा से किसी के प्राण लिए बगैर जाना पड़ा था । तभी तो काशी नगरी सनातन धर्म में इतना महत्वपूर्ण है, हम बात कर रहे हैं काशी नगरी के प्रवेश द्वार कैथी ग्राम सभा की जो वाराणसी व गाजीपुर के सीमा पर पड़ता है । यही से काशीनगरी वाराणसी यानी की मोच्छ नगरी का प्रवेश द्वार आरंभ हो जाता है तो लहुरीकाशी गाजीपुर जनपद का भी सीमा प्रारंभ हो जाता है । अब सवाल ये है की हम इतनी बड़ी धार्मिक नगरी के एक गांव कैथी की चर्चा क्यों कर रहे हैं । तो बताते चलें की कैथी गांव जहां यमराज को भी हार का सामना करना पड़ा था तो इस गांव के बगैर वाराणसी की बात करना व्यर्थ है ।

कैथी गांव में विराजमान हैं मारकंडेय महादेव

गाजीपुर जनपद मुख्यालय से करीब साठ किलोमीटर व वाराणसी से करीब बीस किलोमीटर की दुरी जो वाराणसी गाजीपुर मुख्यमार्ग से करीब छः किलोमीटर दूर कैथी ग्राम सभा है जहां पौराणिक स्थल मारकंडेय महादेव का विशालकाय स्थान है । जहां महाभारत काल के समय पांडव भी अपनी अज्ञातवास काट चुके हैं ।


पुराणों के अनुसार यमराज भी कैथी गांव स्थित भगवान भोले नाथ के दरबार आकर हार चुके हैं । कहां जाता है की भगवान भोले नाथ का नामकरण किया गया है । अब सवाल ये उठता है की मारकंडेय कौन थे यमराज यहां कैसे हारे इन सब सवालों के जबाब हम जानेंगे। इन्हीं सब सवालों के जबाब पाने के लिए न्यूज़ ट्रेक की टीम वाराणसी के कैथी गांव पहुंची थी ।

कौन थे मारकंडेय

जब हमारी टीम मारकंडेय महादेव मंदिर पहुंची तो वहां हमारी मुलाकात मंदिर के पुजारी गौरव गिरी व उनके गुरु से इन लोगों ने हमारी टीम से बात करतें हुए कहा की इस स्थान पर शिवलिंग कब से है इसका कोई जवाब नहीं है । इनका नामकरण मारकंडेय ऋषि के नाम रखा गया है । इन लोगों ने बताया की मारकंडेय ऋषि मृकंड ऋषि के पुत्र थे जीनकी उम्र अल्पायु थी जो बारह वर्ष था । इन्हीं के नाम पर भगवान भोलेनाथ को मारकंडेय महादेव कहा जाता है । यही पर यमराज का सामना भगवान शिव से हुआ था ।


कथाओं के अनुसार मृकंड ऋषि निसंतान थे उन्होंने अपनी पत्नी से कहां की मैं पुत्र प्राप्ति हेतु तपस्या करने जा रहा हूं । मृकंड ऋषि तपस्या करने ब्रम्हा जी के पास गये जहां उन्होंने कहा की पुत्र तुम्हारी मनोकामना यहां पुर्ण नहीं हो सकती बिष्णु जी के पास जावों तब मृकंड ऋषि वहा भी गये बिष्णु जी ने उन्हें भगवान शिव के पास भेजा। जब मृकंड ऋषि भगवान शिव के पास पहुंचे तो शिव ने कहा की आप को कैसा पुत्र चाहिए अल्पायु या पुर्ण आयु मृकंड ऋषि ने पुछा की भगवन अल्पायु व पुर्ण आयु आप क्यों कह रहे हैं । जिसका जबाब देते हुए शिव ने कहां की अल्पायु पुत्र जो होगा वो बहुत तेजस्वी होगा। तब मृकंड ऋषि ने अल्पायु पुत्र की कामना की इस पर शिवजी ने कहां की जाओ आप तपस्या करो आप पुत्र रत्न होगा । तब मृकंड ऋषि ने तपस्या करने के लिए आदि गंगा के तट पर जो यहां से मात्र पांच सौ मिटर की दुरी पर है । यही बैठ कर मृकंड ऋषि ने तपस्या कर मारकंडेय जी को प्राप्त किया था । मंदिर के पुजारी ने बताया की मृकंड ऋषि का निवासस्थान भिमीसाड़ जो सितापुर जिले में पड़ता है ।

हरिवंश पुराण का जप करायें थे मृकंड ऋषि

मंदिर के पुजारी गौरव गिरी ने बताया की अठारह पुराणों में एक पुराण हरिवंश पुराण भी है । जब मृकंड ऋषि आदि गंगा के तट पर तपस्या कर रहे थे तभी उनको एक भविष्यवाणी हुई की यहां से कुछ दुरी पर भगवान शिव विराजमान हैं वहां पर आप हरिवंश पुराण का जाप करें तो आप को भगवान शिव के द्वारा दिया हुआ आशिर्वाद प्राप्त होगा।


इसी के उपरांत मृकंड ऋषि ने अठारह हजार ऋषियों के साथ हरिवंश पुराण का जप किया था । कहां जाता है की इस स्थान पर जो कोई भी कामना करता है उस व्यक्ति की कामना पुर्ण हो जाता है , पुजारी ने बताया की यहां पर जिन लोगों के संतान नहीं है वो लोग इस स्थान पर हरिवंश पुराण का जप करायें है । तब पुत्र रत्न प्राप्त हो जाता है ।

भगवान शिव से यमराज का हुआ था सामना

किंवदंती है की जब मारकंडेय ऋषि आठ वर्ष के हुए तो उनके पिता मृकंड ऋषि को चिंता होने लगी वो रात दिन यही सोचते थे की अब मारकंडेय को चार वर्ष ही धरती पर रहना है । ये चिंता देख मारकंडेय ने कहां की पिता जी आप किस बात की चिंता कर रहे हैं । इस उन्होंने कहा की पुत्र तुम भगवान शिव की कृपा से मुझे प्राप्त हुए हो लेकिन तुम्हारी आयु मात्र 12, वर्ष है जिसमें आठ वर्ष बित गये है । तब मारकंडेय ने कहां की पिता जी जब मैं शिव कृपा से आ सकता हूं तो उन्हीं कृपा से क्या मैं अपनी अल्पायु समाप्त नहीं कर सकता इतना कहने के बाद मारकंडेय शिव के पास पहुंच तपस्या करने लगे जब मारकंडेय का उम्र 12 वर्ष पुर्ण हुआ तो यमराज ने अपने दुत को भेजा कहां की जा मारकंडेय की उम्र पुर्ण हो चुका है लेकर आ । जैसे यमराज का दुत मारकंडेय को लेने पहुंचा तो भगवान शिव कृपा से दुर वापस चला गया । जिसे देख यमराज क्रोधित हो स्वयंम मारकंडेय को लेने पहुंचे यमराज को देख मारकंडेय रोने लगे व चन्द्रशेखर, चंद्रशेखर पुकारने लगे । अपने भक्तों को देख भगवान शिव ने प्रगट हो यमराज से पुछा की तुम कौन हो तो यमराज ने कहां भगवान मैं काल हूं इस पर भगवान भोलेनाथ कहां की तुम काल हो तो मैं महाकाल हूं, तुम यहां कैसे आये हो तब यमराज ने कहां भगवान आप ही बारह वर्ष का अल्पायु दिये है जो आज पुर्ण हो गया है । तब भगवान ने कहां की अपना वहीं खाता में देखें वारह वर्ष मैं कहां हूं जिसमें सतजुग त्रेता, द्वापरयुग व कलयुग को मिला कर एक वर्ष होता है ब्रम्हा जब एक पलक गिरता है तो विष्णु का एक घड़ी होता है । इन सबको मिलाकर जब बारह वर्ष पुरा होगा तब बारह साल उम्र होगा।

इसी स्थान पर गंगा गोमती का होता है संगम

पुराणों के अनुसार मारकंडेय महादेव मंदिर से करीब एक किलोमीटर की दुरी पर गोमती नदी जिसे पुराणों में आदि गंगा कहां गया है । वो निकलती है मंदिर के पुजारी ने बताया की आज जो गंगा जी को आप लोग इस स्थान पर देख रहे हैं । वो भागीरथ जी के द्वारा यहां लाई गई है । जिनका संगम आदि गंगा यानी गोमती नदी से करीब एक किलोमीटर की दुरी पर हुआ है ।

कंटकबन जहां पर पांडवों ने बिताया अज्ञातवास

कथाओं के अनुसार आज से करीब पांच हजार साल पहले कैथी गांव का नाम कंटकबन था । जहां पर पांडव भी बनवास के समय अपना समय यही बिताया था । ग्रामीणों के अनुसार कंटकबन राजा दुव्यदास के द्वारा बसाया गया था । आज भी खेती गांव के सिवानों में बबुल का पेड़ या कांटेदार पौधे मौजूद हैं ।

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