मुलायम सिंह यादव 2022: पिता चाहते थे बेटा बने पहलवान, लेकिन मुलायम बने 3 बार मुख्यमंत्री

मुलायम सिंह यादव (mulayam singh yadav biography) ने अपने राजनीतिक जीवन में उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग समाज के सामाजिक स्तर को ऊपर लाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया।

Yogesh Mishra
Published on: 10 Oct 2023 9:43 AM IST (Updated on: 10 Oct 2023 9:43 AM IST)
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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव 

Mulayam Singh Yadav Biography: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव (Former CM Mulayam Singh Yadav) की पहचान एक ऐसे राजनेता के रूप में रही है, जो साधारण किसान परिवार (Mulayam Singh Yadav Farmer Family) से निकलकर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे। चाहे प्रदेश की राजनीति हो या देश की, दोनों ही जगह उनकी बड़ी पहचान रही है। मुलायम सिंह अब तक तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (Mulayam Singh Yadav Teen Baar UP Chief Minister) रहे हैं। एक बार उन्हें देश के रक्षा मंत्री (Mulayam Singh Yadav Defence Minister) के रूप में सेवा देने का भी अवसर मिला है।

मुलायम सिंह का जन्म (Mulayam Singh Yadav Date of Birth) 22 नवम्बर, 1939 को इटावा जिले के सैफई गांव में हुआ था। मुलायम सिंह यादव अपने परिवार (Mulayam Singh Yadav Family) में तीसरे नंबर के बेटे थे। कहा जाता है जब वो पैदा हुए थे तो गांव के पंडित ने कहा था, यह लड़का पढ़ेगा और कुल का नाम रोशन करेगा। हालाँकि उनके पिता मुलायम सिंह को पहलवान (Mulayam Singh Yadav Pahalvan) बनाना चाहते थे।

मुलायम सिंह यादव (फोटो- सोशल मीडिया)

मुलायम सिंह की शुरुआती शिक्षा (Mulayam Singh Yadav Education) गांव के स्कूल में ही हुई। उनका विवाह (Mulayam Singh Yadav Marriage) वर्ष 1957 में मालती देवी(Mulayam Singh Yadav Wife) से हुआ। जिनसे इन्हें पुत्र अखिलेश (Mulayam Singh Yadav Son Akhilesh Yadav) प्राप्त हुए। आगे चलकर उनका संपर्क लोहिया और उनके साथ के लोगों से हुआ, जिसके बाद उन्होंने सियासत की ओर कदम बढ़ाया।

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14 साल की उम्र में गए थे जेल
(Mulayam Singh Yadav Ke Bare Mein)

मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन (Mulayam Singh Yadav Political Life) में उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग समाज के सामाजिक स्तर को ऊपर लाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी सामाजिक चेतना, समझ और फैसलों के कारण आज यूपी की सियासत (UP Politics) में अन्य पिछड़ा वर्ग का महत्वपूर्ण स्थान है।

मुलायम सिंह से जुड़ा एक किस्सा जो उनके राजनीतिक तेवर को दिखाता है। मात्र 14 साल की उम्र में मुलायम सिंह को जेल जाना पड़ा था। तब वह राम मनोहर लोहिया के आह्वान पर 'नहर रेट आंदोलन' (nahar ret aandolan) में शामिल हुए थे और पहली बार जेल गए।

अच्छे पहलवान रह चुके हैं मुलायम

यह बहुत कम लोगों को पता होगा कि मुलायम सिंह यादव बहुत अच्छे पहलवान (Mulayam Singh Yadav Good Wrestler) रह चुके हैं। इनके पिता इन्हें पहलवान बनाना चाहते थे। उनका धोबी पाट दांव बेहद चर्चित रहा है। अपने इस दांव से उन्होंने अपने से बड़े कद के कई पहलवानों को पटखनी दी।

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ठीक वैसे ही जैसे राजनीति के मैदान में भी उन्होंने समय-समय पर अपने विरोधियों को चित किया है। राजनीति में आने से पहले मुलायम सिंह एक स्कूल में पढ़ाया करते थे। तब वो साइकिल से स्कूल जाया करते थे। इसीलिए जब मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी का गठन (Mulayam Singh formed Samajwadi Party) किया तो चुनाव चिह्न साइकिल ही रखा।

मुलायम सिंह यादव (फोटो- सोशल मीडिया)

गुरु की सीट से शुरू किया राजनीतिक सफर

Mulayam Singh Yadav Political Career Starts

कहा जाता है कि मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक गुरु नत्थू सिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती प्रतियोगिता में अपने दांव और चतुराई से प्रभावित किया था। बाद में मुलायम जब राजनीति में आये तो उन्होंने गुरु नत्थू सिंह (Mulayam Singh Yadav Guru Nathu Singh) के परंपरागत विधानसभा क्षेत्र जसवंतनगर से ही अपने राजनीतिक सफर को शुरू किया।

एमएलए का चुनाव भी उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी' (socialist Party) और फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (Praja Socialist Party) से लड़ा था। हर बार उन्हें जीत हासिल हुई। बाद में उन्होंने स्कूल के अध्यापन कार्य से इस्तीफा दे दिया।

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28 साल की उम्र में मिला टिकट
Mulayam Singh Yadav Party Ticket

28 साल की उम्र में 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर पहली बार जसवंतनगर क्षेत्र से विधानसभा सदस्य चुने गए। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी मुलायम सिंह के राजनीतिक गुरु राम मनोहर लोहिया की पार्टी थी। हालांकि, उनके चुनाव जीतने के एक साल बाद ही यानी 1968 में राम मनोहर लोहिया का निधन Ram Manohar Lohia passes away हो गया।

इसके बाद मुलायम सिंह यादव किसानों के सबसे बड़े नेता चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) की पार्टी भारतीय क्रांति दल (Bhartiya Kranti Dal) में शामिल हो गए।

अजित सिंह से टकराव, बनाई नई पार्टी
Nayi Party Lok Dal

वर्ष 1979 में किसान नेता चौधरी चरण सिंह ने स्वयं को जनता पार्टी से अलग कर लिया। तब मुलायम सिंह भी उनके साथ हो लिए। चौधरी साहब ने नई पार्टी लोकदल (Nayi Party Lok Dal) बनाई जिसमें मुलायम शामिल हो गए। यह था साल 1987, जब चौधरी चरण सिंह का देहांत(death of chaudhary charan singh) हो गया।

इसके बाद चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह से उनका टकराव बढ़ता चला गया। नतीजा पार्टी दो धड़ों में बंट गई। 1989 में मुलायम सिंह ने अपने धड़े वाले लोकदल का विलय विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) के जनता दल में कर दिया। इस साल लोकसभा चुनाव के साथ ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी हुए।

1989 में मुलायम सिंह यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री(Mulayam Singh Yadav first time Chief Minister of Uttar Pradesh) बन गए। मुलायम सिंह की यह सरकार ज्यादा नहीं चली। फिर उन्होंने साल 1990 में वी.पी. सिंह का साथ छोड़ पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ समाजवादी जनता पार्टी (सजपा) की नींव रखी।

नेताजी के नेतृत्व में चार बार बनी सपा सरकार

Samajwadi Sarkar

आख़िरकार वर्ष 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी की स्थापना (Samajwadi Party Ka Gathan) की। उत्तर प्रदेश की सियासत (UP Politics) का ये वो दौर था जब जातिगत राजनीति तेज हो चली थी।

मुलायम सिंह ने पिछड़े, ओबीसी और मुस्लिम वोट का एक नया समीकरण (Muslim Votes)तैयार किया, जिसकी काट उस वक्त उनके विरोधियो के पास थी ही नहीं। फलस्वरूप, नेताजी यूपी की सियासत में ध्रुव तारा की भांति चमकने लगे। बाद में इस पार्टी ने प्रदेश में चार बार सरकार बनाई। जिसमें तीन बार नेताजी खुद सीएम रहे।

मुलायम सिंह यादव मुस्लिम वोट की तैयारी में (फोटो- सोशल मीडिया)

लालू के विरोध ने नहीं बनने दिया पीएम

Mulayam Singh Bahujan Samaj Party

वर्ष 1993 में मुलायम सिंह ने कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ मिलकर सरकार बनाई। मुलायम सिंह यादव दूसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री (Mulayam Singh Yadav Second Time Chief Minister of Uttar Pradesh) बने। हालांकि 1995 में यह गठबंधन (Samajwadi BSP Alliance) टूट गया।

इस बीच 90 के दशक के मध्य में जब मिलीजुली सरकारों का दौर आया तो 1996 में मुलायम प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए थे । लालू यादव के विरोध की वजह वो उस पद तक नहीं पहुंच पाए। लेकिन 1996 से 1998 तक वो देश के रक्षा मंत्री रहे।

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पार्टी में अब संरक्षक की भूमिका में मुलायम

मुलायम सिंह यादव ने 2002 में भारतीय जनता पार्टी (Samajwadi Party BJP) के साथ मिलकर बनी मायावती की सरकार (Mayawati Ki Sarkar) को एक साल में ही गिरवा दिया। मुलायम 2003 में खुद मुख्यमंत्री (Mulayam Singh Yadav Chief Minister) बन गए। सपा की ये सरकार 2007 तक चली।

मुलायम सिंह यादव (फोटो- सोशल मीडिया)

समाजवादी पार्टी चौथी बार साल 2012 में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में सफल रही। इस बार नेताजी ने सरकार की बागडोर अपने पुत्र अखिलेश यादव के हाथ में दी। अखिलेश मुख्यंत्री बने। 2016 में अखिलेश यादव के कार्यकाल के दौरान उनके परिवार में राजनीतिक विरासत को लेकर जंग छिड़ गई थी। हालांकि, बाद में सब सामान्य हो गया। मुलायम सिंह यादव फिलहाल समाजवादी पार्टी के संरक्षक हैं और मैनपुरी सीट से सांसद हैं।

जब मुलायम सिंह की टक्कर 'मुलायम' से
Chunavi Maidan Mein

मुलायम सिंह यादव को साल 1989 में पहली बार अपने पिता के नाम सुघर सिंह का सहारा लेना पड़ा था। वजह थी, जसवंतनगर विधानसभा सीट से उन्हीं के नाम वाले एक शख्स ने उन्हें चुनौती दी थी। इसके बाद यही हालत 1992 और 1993 में भी हुआ था , जब मुलायम सिंह के नाम का ही अन्य शख्स उन्हें चुनावी मैदान में टक्कर देने उतरा था।

हालांकि, हर बार नेताजी के सामने वो टिक नहीं पाए। लेकिन राजनीतिक गलियारों में इन खबरों की खूब चर्चा रही। वर्ष 1993 में मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश की तीन विधानसभा सीटों जसवंत नगर, शिकोहाबाद और निधौली कलां से मैदान में उतरे। हद तो तब हो गई जब तीनों ही सीट से नेताजी के खिलाफ मुलायम नाम का उम्मीदवार मैदान में उतरा।

मुलायम सिंह का पॉलिटिकल करियर (Political career of Mulayam Singh) हों या फिर व्यक्तिगत अथवा सार्वजनिक जीवन सब बहुत उतार चढ़ावों से भरा है। मुलायम सिंह काफ़ी लंबे समय तक आर्थिक तंगी के शिकार रहे हैं। हालत यह रही है कि तंगी के कारण इनके पिता उन्हें पढ़ाने की जगह पहलवान बनाना चाहते थे। पर मुलायम सिंह पढ़ने पर आमादा थे। अपनी इस इच्छा को पूरा करने को लिए वह किसी हद तक जाने को तैयार थे।

तभी तो जब उनके पिता ने उनके बड़े भाई को फ़ीस जमा करने के पैसे दिये तब मुलायम सिंह ने उनसे यह कह कर पैसे ले लिए कि वह भाई की फ़ीस जमा कर देंगे। जबकि हुआ उल्टा ही। उन्होंने उन पैसों से स्कूल में अपनी फ़ीस जमा कर दी। जब परीक्षा का समय आया तब सच्चाई उजागर हुई। पर तब तक बहुत देर हो गयी थी।

अब मुलायम सिंह के सामने बड़ी चुनौती ( Big challenge For Mulayam Singh) थी। अच्छे नंबर लाना। मुलायम सिंह इस चुनौती से पार तो पा गये पर पिता का ग़ुस्सा कम नहीं हुआ। अब उनके सामने पिता के ग़ुस्से को शांत करने की चुनौती थी। इसके लिए मुलायम सिंह ने कई रास्ते निकाले पर सबसे सटीक रास्ता उन्हें भी जो समझ में आया वह पहलवानी का ही था।

मुन्ना पहलवान व मुलायम सिंह
Munna Pahalwan Mulayam Singh

इलाक़े में मुन्ना पहलवान का बड़ा रुतबा था। मुन्ना पहलवान (Munna Pahalwan) सैफ़ई के कई लोगों को अलग अलग दंगल में हरा चुका था। मुलायम सिंह के दिमाग़ में आया कि यदि वह मुन्ना पहलवान को दंगल में हरा दें तो पिताजी ख़ुश हो सकते हैं। ऐसे में एक दंगल में मुन्ना पहलवान को अखाड़े पर हाथ उठा कर घुमाया जा रहा था।

इसका मतलब है कि यदि कोई चाहे तो कुश्ती लिखवा सकता है। कोई तैयार नहीं था। मुलायम सिंह भी अखाड़े के पास ही खड़े थे। वह बताते हैं कि हमने सोचा यदि मैं जोड़ लिखवा कर हरा दूँ तो पिताजी ख़ुश हो जायेंगे। सैफई का सम्मान भी लौट आयेगा। पर मुन्ना पहलवान बहुत हलीम सहीम था।

मुलायम सिंह उसकी तुलना में क़द काठी में बहुत कमजोर थे। पर उनके हौसले बुलंद थे। बहुत विचार करने का समय नहीं था। मुलायम सिंह ने आगे बढ़कर कुश्ती माँग ली। मुलायम सिंह भी कम महत्वपूर्ण पहलवान नहीं थे। पर मुन्ना की शोहरत व क़द काठी से बहुत ऊपर थी। अखाड़े पर दोनों पहलवानों ने हाथ आज़माना शुरू किया।

मुलायम सिंह यादव (फोटो- सोशल मीडिया)

मुन्ना ने मुलायम सिंह पर दो दांव मारे पर मुलायम सिंह बच निकलने में कामयाब हुए। मुलायम सिंह धोबिया पछाड़ दांव के माहिर हैं। पर यह दांव मारने के लिए उसका पकड़ में आना ज़रूरी होता है। मुन्ना पकड़ में आने को तैयार नहीं था। पर मुलायम सिंह लपक कर उसकी पीठ पर सवार हो गये। थोड़ी ही देर में उन्होंने मुन्ना को चित्त कर दिया। बस अखाड़े पर पैसा बरसने लगा।

मुलायम सिंह ने बताया कि उन्हें पैसों की ज़रूरत याद आ रही थी। पर पहलवान पैसा ले नहीं सकता। लेकिन मुन्ना को चित करने के बाद सैफई (Saifai Mein Mulayam Singh Yadav) के लोगों ने मुलायम सिंह को कंधे पर उठाया। कंधे पर ही उठाये सैफई पहुँचा दिया। पर मुलायम सिंह बताते हैं कि पिता जी इसके बाद भी ख़ुश नहीं हुए।

जीवन परिचय:
Mulayam Singh Yadav Ka Jeevan Parichay

पिता (Mulayam Singh Yadav Father Name) - सुघर सिंह यादव

माता (Mulayam Singh Yadav Mother Name) - श्रीमूर्ति यादव

पहली पत्नी (Mulayam Singh Yadav First Wife) - मालती देवी (2003 में देहांत)

संतान (Mulayam Singh Yadav Child) - अखिलेश यादव

1960 में मुलायम सिंह यादव राजनीति (Mulayam Singh Yadav Political Career Starts) में आए।

1967 में पहली बार विधानसभा चुनाव (Mulayam Singh Yadav Wins Vidhan Sabha Chunav 1967) जीता।

इसके बाद क्रमशः 1974, 1977, 1985, 1989, 1991, 1993, 1996, 2004 और 2007 में विधायक बने

1976 में विधायक समिति के सदस्य बने

1977 में सहकारी एवं पशुपालन मंत्री बने

1980 में लोकदल के अध्यक्ष चुने गए।

1989 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने

1992 में उत्तर प्रदेश की विधानसभा में विपक्ष के नेता बने।

1993 से 1995 तक यूपी के मुख्यमंत्री (Mulayam Singh Yadav UP Chief Minister) रहे

1996 में उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले से पहली बार सांसद बने।

1996 में ही केंद्र में रक्षा मंत्री बने

2003-07 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री(Mulayam Singh Yadav UP Chief Minister) रहे।

2014 में आजमगढ़ और मैनपुरी से सांसद चुने गए।

2019 में मैनपुरी से सांसद चुने गए।

वर्तमान में नेताजी समाजवादी पार्टी के संरक्षक (Mulayam Singh Yadav Samajwadi Party) की भूमिका में हैं

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Yogesh Mishra

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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