यूपी पुलिस पर फूटा सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा! पूछा- क्यों खेल रहे हैं लुका-छिपी का खेल? जानें डिटेल्स

Noida Hate Crime Case: नोएडा में साल 2021 में हुए कथित घृणा अपराध के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने पुलिस की ओर से दाखिल किए गए अनुपालन हलफनामे पर नाराजगी जताते हुए सीधे सवाल दागा कि आखिर जांच अधिकारी अदालत के साथ “लुका-छिपी” का खेल क्यों खेल रहा है।

Aditya Kumar Verma
Published on: 21 April 2026 11:03 PM IST
Noida Hate Crime Case
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Noida Hate Crime Case: नोएडा में साल 2021 में हुए कथित घृणा अपराध के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने पुलिस की ओर से दाखिल किए गए अनुपालन हलफनामे पर नाराजगी जताते हुए सीधे सवाल दागा कि आखिर जांच अधिकारी अदालत के साथ “लुका-छिपी” का खेल क्यों खेल रहा है। कोर्ट के इस तेवर से साफ है कि वह इस मामले में किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।

धारा 153-बी पर उठा सवाल, कोर्ट ने मांगा जवाब

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज से पूछा कि इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 153-बी क्यों नहीं जोड़ी गई। कोर्ट ने याद दिलाया कि 16 फरवरी को विधि अधिकारी ने खुद माना था कि शिकायत में ऐसे आरोप हैं, जिनसे धारा 153-बी और 295-ए के तहत अपराध बनता है और एफआईआर दर्ज होनी चाहिए थी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला 4 जुलाई 2021 को नोएडा में हुई एक घटना से जुड़ा है, जिसमें कुछ लोगों पर एक वरिष्ठ नागरिक के साथ दुर्व्यवहार और यातना देने का आरोप है। पीड़ित ने निष्पक्ष जांच और सुनवाई की मांग को लेकर याचिका दाखिल की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है।

धारा 295-ए उन मामलों से जुड़ी है, जिनमें किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य किए जाते हैं, जैसे धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करना।

पुलिस को मिली जांच की अनुमति

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के. एम. नटराज ने अदालत को बताया कि निचली अदालत ने पुलिस को आगे की जांच की अनुमति दे दी है और आवश्यक धाराएं जोड़ी जाएंगी।

हालांकि याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि एफआईआर में धारा 153-बी और 295-ए जोड़ी जानी चाहिए थी, लेकिन धारा 153-बी को फिर से हटा दिया गया है।

‘लुका-छिपी का खेल’ क्यों, कोर्ट ने लगाई फटकार?

कोर्ट ने सख्त लहजे में पूछा कि जांच अधिकारी अदालत के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है। साथ ही यह भी जानना चाहा कि धारा 153-बी को क्यों नहीं जोड़ा गया।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को भरोसा दिलाया कि पुलिस इस धारा को जोड़ देगी, लेकिन इसके बावजूद कोर्ट ने कहा कि वह दाखिल अनुपालन हलफनामे से संतुष्ट नहीं है।

19 मई को अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने जांच अधिकारी को तलब करने की इच्छा भी जताई, लेकिन सरकार के अनुरोध पर दो सप्ताह का समय देते हुए पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा।

मामले की अगली सुनवाई 19 मई को तय की गई है। कोर्ट ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि अधिकारियों को निर्देश दें, वरना वे मुसीबत में पड़ सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि उन्हें अधिकारियों को बुलाकर फटकार लगाने में कोई आनंद नहीं आता, लेकिन जरूरत पड़ी तो ऐसा किया जाएगा।

इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पूरी गंभीरता से नजर बनाए हुए है और किसी भी तरह की ढिलाई पर कड़ी कार्रवाई के संकेत दे चुका है।

Aditya Kumar Verma
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आदित्य कुमार वर्मा उत्तर प्रदेश के पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 8 वर्षों से अधिक का अनुभव प्राप्त है। उन्होंने भारतीय राजनीति, अपराध, स्वास्थ्य और मानवीय सरोकारों से जुड़ी खबरों की व्यापक रिपोर्टिंग की है। उनके पास मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री है और वे रिपोर्टर, एंकर तथा सब-एडिटर जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। साथ ही वो उत्तर प्रदेश की राजनीति, शासन-प्रशासन और नौकरशाही व्यवस्था की गहरी समझ रखते हैं। पत्रकारिता के अलावा उन्हें पुस्तकों का अध्ययन, लेखन, कविता-लेखन और पाठ और यात्राएं करना विशेष रूप से पसंद है। विभिन्न संस्कृतियों और समाजों को करीब से जानने-समझने की उनकी रुचि ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है, जिसका सकारात्मक प्रभाव उनकी लेखन शैली और रिपोर्टिंग में भी देखने को मिलता है।

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