TRENDING TAGS :
Samajwadi Party Strategy: सपा ने बनाया लोकसभा से भी तगड़ा फॉर्मूला! जानें अखिलेश के नए प्लान में Congress कहां?
Samajwadi Party Strategy: सपा अपने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फार्मूले को और मजबूत बनाने के लिए कई छोटे एवं क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर सकती है। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चाओं का दौर तेज है।
फर्जी एनकाउंटर पर अखिलेश यादव का हमला, बोले- भाजपा सरकार डर और दबाव की राजनीति कर रही (Photo- Newstrack)
Samajwadi Party Strategy: अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट के बीच समाजवादी पार्टी ने अपनी चुनावी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बेदखल करने के लिए सपा नेतृत्व एक मजबूत और अभेद्य चक्रव्यूह रचने की कोशिश में है। पार्टी का पूरा फोकस इस बार अपने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को जमीन पर उतारने पर है। इसी रणनीति के तहत सपा के शीर्ष नेता बड़ी खामोशी से प्रदेश के कई छोटे और क्षेत्रीय दलों के साथ सियासी खिचड़ी पका रहे हैं ताकि एक बड़ा और अजेय गठबंधन तैयार किया जा सके।
यूं तो सार्वजनिक मंचों से सपा मुखिया अखिलेश यादव सभी 403 सीटों पर अकेले ताल ठोकने का दावा कर चुके हैं लेकिन हकीकत में बूथ स्तर तक पार्टी को मजबूत करने के साथ-साथ जातियों के क्षत्रपों को साधने की कवायद जोरों पर है। यूपी की सियासत हमेशा से जातीय गुणा-गणित पर टिकी रही है और सपा यह भली-भांति जानती है। इसीलिए उन तमाम छोटे दलों को अपने पाले में लाने की कोशिश हो रही है जिनका किसी खास इलाके या विशेष जाति पर मजबूत प्रभाव है।
सीट शेयरिंग को लेकर Congress के साथ खींचतान
इस पूरे सियासी समीकरण में कांग्रेस के साथ गठबंधन का पेंच भी काफी दिलचस्प है। दोनों ही दल साथ मिलकर चुनाव लड़ने के इच्छुक जरूर नजर आते हैं, लेकिन असल पेंच सीटों के बंटवारे पर फंसा है। सियासी हलकों में चल रही चर्चाओं के मुताबिक कांग्रेस आगामी चुनाव में 100 से 120 सीटों पर अपनी दावेदारी ठोकने के मूड में है, जबकि समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन्हें 50 से ज्यादा सीटें देने के हक में बिल्कुल नहीं दिखाई दे रहा।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो रायबरेली और अमेठी जैसे गिने-चुने इलाकों को छोड़ दिया जाए, तो सूबे में कांग्रेस का जमीनी ढांचा लगभग नदारद है। ऐसे में सपा अपने हिस्से की ज्यादा सीटें कुर्बान करके कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। अगर 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों पर गौर करें, तो सपा और कांग्रेस के गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा सीधे तौर पर कांग्रेस की झोली में गया था। 2019 में महज एक सीट पर सिमटने वाली कांग्रेस ने इस गठबंधन की बदौलत 6 सीटों पर जीत का परचम लहराया था। सपा को लगता है कि उसे कांग्रेस के साथ आने से कोई बहुत बड़ा जादुई फायदा नहीं मिला, इसीलिए 2027 के महासमर में वह अपने सहयोगी को एक सीमित दायरे में ही रखना चाहती है।
पुराने साथियों की टीस और नए सहयोगियों की तलाश
पुराने सहयोगियों के छिटकने के बाद समाजवादी पार्टी अब नए दोस्तों की तलाश में है। गौरतलब है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल (RLD) और ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा(SBSP) ने सपा के साथ मिलकर अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन 2024 आते-आते ये दोनों ही नेता पाला बदलकर एनडीए के कुनबे में शामिल हो गए। इस सियासी झटके से उबरते हुए पार्टी अब नए सिरे से अपना कुनबा बढ़ा रही है।
ताजा राजनीतिक परिदृश्य में समाजवादी पार्टी अपना दल (कमेरावादी), चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी और बाबू सिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी जैसे दलों के साथ पींगे बढ़ा रही है। सपा का मानना है कि छोटे दलों को साथ लेकर चलने से न सिर्फ वोटों का बिखराव रुकेगा, बल्कि कई सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय होने से भी बचाया जा सकेगा।
अखिलेश यादव की यह सधी हुई रणनीति इस बात का स्पष्ट इशारा है कि इस बार वह महज अपने पारंपरिक वोट बैंक के भरोसे नहीं बैठे हैं। वह छोटे-छोटे क्षत्रपों और जातियों को साथ लेकर एक ऐसा व्यापक सामाजिक ताना-बाना बुन रहे हैं, जो आगामी चुनावों में सत्ताधारी दल के सामने एक गंभीर और मजबूत चुनौती पेश कर सके।


